विचार: एकसूत्र में पिरोती त्रिभाषा प्रणाली
समय की मांग है कि हम भाषा को राजनीति और विवाद का विषय बनाने के बजाय उसे संपर्क, सहयोग और सशक्तीकरण के माध्यम के रूप में देखें।
HighLights
सीबीएसई का त्रिभाषा प्रणाली को अनिवार्य करने का निर्णय
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप पहल
भाषा संपर्क, सहयोग और सशक्तीकरण का माध्यम
प्रणय कुमार। वर्तमान शैक्षणिक सत्र से सीबीएसई ने कक्षा छह से तीन भाषाओं की पढ़ाई को अनिवार्यतः लागू करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को किन्हीं दो भारतीय मूल की तथा एक विदेशी भाषा का अध्ययन करना होगा। विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, अतः इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की व्यवस्था की गई है। सत्र 2030-31 तक इसे क्रमशः दसवीं कक्षा तक लागू किया जाएगा। सीबीएसई का यह निर्णय न केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप है, बल्कि 1968 और 1986 की शिक्षा नीतियों में दिए गए भाषा संबंधी सुझावों को भी समाहित एवं समायोजित करने वाला है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिक्षा के क्षेत्र में की जाने वाले हर आवश्यक पहल को अनावश्यक विवादों में घसीटा जाता है। सीबीएसई की इस पहल को भी द्रमुक जैसे दल ‘हिंदी थोपने का प्रयास’ बताकर जनता को भ्रमित करने की कुचेष्टा कर रहे हैं, जबकि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि तीनों भाषाओं का चयन राज्यों, क्षेत्रों और विद्यार्थियों की पसंद के अनुसार होगा। यह व्यवस्था केवल उन विद्यालयों पर लागू होगी, जो सीबीएसई से संबद्ध हैं। अनेक ऐसे विद्यालय हैं, जो पहले से ही विद्यार्थियों को तीसरी भाषा का विकल्प प्रदान करते रहे हैं।
गत वर्ष लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु के कुल 1905 विद्यालयों में से 3.2 प्रतिशत में तीन भाषाएं पढ़ाई जाती रही हैं। जबकि तमिलनाडु में सीबीएसई से संबद्ध विद्यालयों की कुल संख्या ही 1,800 के आसपास है। भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों के लिए एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है। कर्नाटक में शैक्षिक वर्ष 2026 के दौरान राज्य बोर्ड के 93 प्रतिशत छात्रों (8.1 लाख में से 7.5 लाख से अधिक) ने तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को चुना है। दक्षिण भारतीय राज्यों में आमजन पर “हिंदी थोपे जाने” के आरोप की पोल खोलने के लिए यह एक उदाहरण ही पर्याप्त है।
भाषा-भेद के आधार पर उत्तर-दक्षिण को बांटने वाली राजनीति करने वाले नेताओं एवं दलों के मन में सदैव यह डर बना रहता है कि कहीं त्रिभाषा सूत्र के सफल होने से भाषा-भेद की कृत्रिम बुनियाद पर खड़ी उनकी राजनीति कमजोर न पड़ जाए। इसीलिए वे भाषा संबंधी हर पहल का विरोध प्रारंभ कर देते हैं। भाषा को विवाद का विषय बनाना न तो शिक्षा के हित में है और न ही समाज के। वस्तुतः भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अवसर, गतिशीलता और सामाजिक समावेशन का आधार भी है। आज भारत में जहां लाखों प्रवासी श्रमिक एक राज्य से दूसरे राज्य में रोजगार के लिए जाते हैं, वहां उनके बच्चों की शिक्षा में निरंतरता एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
ऐसे में बहुभाषिक शिक्षा व्यवस्था उनके लिए सेतु का कार्य कर सकती है, जिससे वे नए परिवेश में सहज रूप से समायोजित हो सकें। त्रिभाषा प्रणाली न केवल शैक्षिक निरंतरता सुनिश्चित करती है, बल्कि विद्यार्थियों के दृष्टिकोण को भी व्यापक बनाती है। यह उन्हें विविध संस्कृतियों, परंपराओं और विचारों से परिचित कराती है। एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति के संज्ञानात्मक विकास, रचनात्मकता और संप्रेषण कौशल को भी सुदृढ़ करता है। वैसे भी वैश्वीकरण के इस युग में बहुभाषिकता एक महत्वपूर्ण कौशल बन चुकी है।
भारतीय भाषाओं में भेद या संघर्ष नहीं, अपितु विभिन्न स्तरों पर परस्पर गहरी समानताएं विद्यमान हैं। उन समानताओं का वितान भाव, विचार, ध्वनि, पद, वाक्य आदि की व्याकरणगत संरचना से लेकर लोकोक्ति, मुहावरों एवं लोक-कथाओं तक फैला हुआ है। वैविध्य में एकत्व देखने की अद्वितीय भारतीय जीवन-दृष्टि का मूल आधार भी यहां की विभिन्न भाषाएं, उनका समृद्ध साहित्य और उनमें वर्णित तत्व एवं कथ्य ही हैं। तमाम कृत्रिम, कल्पित, प्रचारित भेदभावों के अतिरंजित दावों के बावजूद उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम के मध्य सतत एवं सहज सांस्कृतिक संवाद रहा है। तीर्थों, मेलों, उत्सवों, परंपराओं में उसकी जीवंत अभिव्यक्ति देखने को मिलती रही है।
इतिहास साक्षी है कि इस देश के सच्चे संतों, कवियों, दार्शनिकों, साहित्यकारों ने भाषा, पंथ, प्रांत, जाति आदि के भेदभावों से परे एकता, समन्वय एवं समरसता के सूत्रों को सदैव थामे रखा। भिन्न-भिन्न दर्शन, संप्रदाय, मठ-धाम-तीर्थ, इन सबके मध्य निर्बाध संवाद एवं सतत समन्वय ही हमारी राष्ट्र-दृष्टि और सनातन नीति रही। इस दृष्टि-पथ को भिन्न-भिन्न भाषाएं और उसमें रचे गए साहित्य आलोकित करते रहे। यह इसका प्रमाण है कि भारतीय भाषाएं और विचार परंपराएं स्वभावतः परस्पर जुड़ाव और संवाद की क्षमता रखती हैं।
यह कहना उचित होगा कि सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं। उनमें प्रतिस्पर्धा या संघर्ष का नहीं, बल्कि सहयोग और सहअस्तित्व का भाव निहित है। भाषा का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि संवाद और एकता को सुदृढ़ करना है। समय की मांग है कि हम भाषा को राजनीति और विवाद का विषय बनाने के बजाय उसे संपर्क, सहयोग और सशक्तीकरण के माध्यम के रूप में देखें। त्रिभाषा प्रणाली इसी दिशा में एक सार्थक पहल है, जो न केवल शिक्षा को अधिक समावेशी बनाएगी, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता को भी और अधिक सुदृढ़ करेगी।
(लेखक शिक्षाविद हैं)
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