विचार: आतंक के खिलाफ मजबूत मोर्चा
'प्रहार' भारत की आतंक-रोधी रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, लेकिन इसकी सफलता इसके अमल पर निर्भर करेगी।
HighLights
भारत की आतंकवाद से निपटने की नई रणनीति 'प्रहार'
खुफिया जानकारी और तकनीक पर आधारित है यह रणनीति
आतंकवाद के खतरे को रोकने पर है मुख्य ध्यान
अशोक कुमार। भारत दशकों से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष आतंकवाद का सामना करता आया है। यह लड़ाई हमारे लिए नई नहीं है। आतंकवाद कितना वीभत्स हो सकता है, इसका एक उदाहरण पिछले वर्ष पहलगाम में हुआ आतंकी हमला था, जिसमें लोगों को उनका मजहब पूछकर मारा गया था।
चूंकि पहलगाम हमले की बरसी निकट है, इसलिए हमें आतंकवाद के खतरों को लेकर सचेत रहना होगा। पहले जहां आतंकवाद सीमांत क्षेत्रों और पारंपरिक तरीकों तक सीमित था, वहीं अब यह उच्च तकनीक, इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के सहारे तेजी से फैलने वाला वैश्विक खतरा बन गया है।
आज आतंकी केवल हथियारों के सहारे नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों, गुप्त वित्तीय नेटवर्कों और वैचारिक प्रचार के जरिये भी काम कर रहे हैं। इस बदलते स्वरूप को समझे बिना आतंकवाद से प्रभावी ढंग से निपटना संभव नहीं है। इसी संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक समयानुकूल पहल की है। इसे नाम दिया है 'प्रहार' (यानी प्रोएक्टिव रिस्पांस अगेंस्ट होस्टाइल एक्ट्स)। यह कदम आतंकवाद से निपटने में बाजी पलटने वाला दांव सिद्ध हो सकता है।
भारत ने आतंकवाद से लड़ते हुए कई अनुभव हासिल किए हैं। इस क्रम में माओवाद से निपटने में अपनाई गई 'समाधान' संकल्पना एक उत्कृष्ट उदाहरण है। दृढ़ इच्छाशक्ति, स्पष्ट रणनीति, बेहतर समन्वय और मजबूत खुफिया तंत्र के माध्यम से उग्रवाद को काफी हद तक नियंत्रित किया गया।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यदि नीति स्पष्ट हो और एजेंसियों के बीच तालमेल मजबूत हो, तो जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। हालांकि आतंक से निपटने में आज की चुनौतियां कहीं अधिक विकराल हैं। आतंकवाद मुख्यत: बाहरी ताकतों द्वारा पोषित है। अब बिखरे हुए छोटे-छोटे समूहों, अकेले काम करने वाले व्यक्तियों और आनलाइन नेटवर्क के रूप में भी वह विस्तार ले रहा है। इस तरह यह एक साथ जमीनी, इंटरनेट और वित्तीय तंत्र तीनों स्तरों पर काम करता है। ऐसे में अलग-अलग और असंगठित प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।
प्रहार जैसी संकल्पना इन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह तकनीक, खुफिया जानकारी, कानून व्यवस्था, वित्तीय निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में समन्वयन को सुनिश्चित करती है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है-खतरे को चिह्नित करना, उसे बढ़ने से रोकना और जरूरत पड़ने पर तुरंत और सख्त कार्रवाई करना। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका समग्र दृष्टिकोण है।
आतंकवाद बंदूक या बम का मामला नहीं है, बल्कि यह एक सोच, एक बड़े नेटवर्क और दुश्मन के सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है, इसलिए इसका समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। प्रहार सात मुख्य स्तंभों पर आधारित है, जो इसे एक संतुलित और प्रभावी नीति बनाते हैं।
एक स्तंभ है रोकथाम यानी खुफिया जानकारी के आधार पर समय रहते कार्रवाई। दूसरा स्तंभ है प्रतिक्रिया, जिसमें किसी घटना पर त्वरित एवं समन्वित कार्रवाई। तीसरा स्तंभ है विश्लेषण, जिसमें सटीक जानकारी एवं विश्लेषण के आधार पर निर्णय। चौथा स्तंभ है मानवाधिकार अनुपालन यानी कानून और संविधान के दायरे में रहकर कार्रवाई। पांचवां स्तंभ है आतंकी वित्तीय ढांचे की कमर तोड़ना, ताकि उन तक वित्तीय मदद पहुंचने ही न पाए। छठा स्तंभ है जागरूकता और कट्टरता-निरोध, जिसमें समाज को साथ लेकर चलना और दुष्प्रचार का समय से खंडन। सातवां स्तंभ है लचीलापन और पुनर्बहाली यानी घटना के बाद तेजी से सामान्य स्थिति बहाल करना। ये सभी स्तंभ ऐसी रणनीति बनाते हैं, जो न केवल आतंक को रोकने में सक्षम है, बल्कि समाज को भी मजबूत बनाती है।
आज आतंकी नई तकनीकों का तेजी से उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में पारंपरिक पुलिसिंग पर्याप्त नहीं रह गई है। प्रहार इस कमी को दूर करते हुए साइबर क्षमता, आधुनिक तकनीक और वित्तीय निगरानी को भी अपने ढांचे में शामिल करता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने आतंक के खिलाफ अपना रुख और स्पष्ट किया है।
बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेकर आपरेशन सिंदूर और देश के भीतर आतंकी नेटवर्क पर लगातार कार्रवाई यह दिखाती है कि भारत अब केवल बचाव की नीति तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर उसके पास निर्णायक और पूर्व-निषेधात्मक कठोर कदम उठाने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों मौजूद हैं।
प्रहार यह सुनिश्चित करता है कि ऐसी कार्रवाई केवल परिस्थितियों पर निर्भर न रहे, बल्कि एक व्यवस्थित नीति के तहत की जाए। इस नीति का केंद्रीय आधार आतंक की रोकथाम है। इसके लिए खतरे को प्रारंभिक स्तर पर ही चिह्नित कर उसे निष्प्रभावी करना मूल उद्देश्य है। इसके लिए खुफिया-आधारित पुलिसिंग को सुदृढ़ करना, एजेंसियों के बीच रियल-टाइम सूचना साझाकरण सुनिश्चित करना, भर्ती नेटवर्क को समय रहते ध्वस्त करना और आतंकी समर्थन तंत्र को समाप्त करना अनिवार्य है।
साथ ही, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय कट्टरपंथी गतिविधियों की निगरानी और आतंकी वित्तपोषण के स्रोतों पर कठोर नियंत्रण इस ढांचे के प्रमुख घटक हैं। एआइ के माध्यम से संभावित खतरों का पूर्वानुमान, बिग डाटा से संदिग्ध पैटर्न की पहचान, सीमाओं पर ड्रोन निगरानी और साइबर फोरेंसिक के माध्यम से इन्क्रिप्टेड संचार की ट्रैकिंग जैसे उपाय इसे अधिक प्रभावी बनाते हैं।
आतंकवाद के डिजिटल स्वरूप को देखते हुए साइबर क्षमताओं का विस्तार अब अनिवार्य हो गया है, क्योंकि डीपफेक आधारित दुष्प्रचार के बढ़ते उपयोग ने यह चुनौती और जटिल बना दी है। यह भी समझना होगा कि कट्टरपंथ केवल सुरक्षा बलों के माध्यम से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज, शिक्षकों, धार्मिक नेतृत्व और नागरिक संगठनों की भागीदारी भी अपरिहार्य है।
प्रहार भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति में बड़े बदलाव का प्रतीक है। इसका ढांचा मजबूत है और सरकार की मंशा भी स्पष्ट दिखती है, पर इसकी सफलता क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। नीति बनाना पहला कदम है, उसे जमीन पर प्रभावी बनाना असली चुनौती है।
(लेखक उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)



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