संजय गुप्त। मोदी सरकार ने संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण लागू करने के लिए सभी राज्यों में 50 प्रतिशत लोकसभा सीटें बढ़ाए जाने का जो संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, उसे वह विपक्ष के विरोध के कारण पारित नहीं कर सकी और दो तिहाई बहुमत के अभाव में वह गिर गया। इसी के साथ अगले आम चुनाव यानी 2029 से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की पहल ठंडे बस्ते में चली गई।

ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि जहां प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने दक्षिण के क्षेत्रीय दलों जैसी संकीर्णता दिखाई तो सपा जैसे दलों ने महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी, अल्पसंख्यक वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग की। कांग्रेस एवं दक्षिण भारत के दलों और खासकर तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक ने ऐसे व्यवहार किया, जैसे किसी राज्य विशेष के हितों अथवा क्षेत्र विशेष की महिलाओं को आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया गया था। यह विधेयक तो समस्त राष्ट्र की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए था। एक लोकसभा सदस्य जब किसी बिल पर मतदान करता है तो राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करता है, न कि राज्य विशेष के हितों को ध्यान में रखकर।

महिला आरक्षण विधेयक 2023 में इस प्रविधान के साथ पारित हुआ था कि उसे नई जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के उपरांत लागू किया जाएगा, लेकिन कोविड और फिर अन्य कारणों से 2021 में होने वाली जनगणना में देरी होती चली गई। अब वह शुरू हुई है। उसके नतीजे आने में समय लगेगा और फिर परिसीमन होते-होते 2029 बीतने के आसार हैं। इसके चलते महिला आरक्षण 2034 के लोकसभा चुनाव में लागू हो पाता। इसी कारण सरकार ने महिला आरक्षण शीघ्र लागू करने की पहल की। उसने इसके लिए लोकसभा सीटें बढ़ाने वाले 131वें संविधान संशोधन विधेयक के साथ परिसीमन से जुड़ा संशोधन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेश संबंधी संविधान विधेयक पेश किया। चूंकि 131वां संविधान संशोधन विधेयक ही पारित नहीं हो सका, इसलिए सरकार के लिए अन्य दोनों विधेयक बेमानी हो गए।

मौजूदा लोकसभा सीटें 1971 की जनगणना के बाद हुए परिसीमन के तहत बढ़ी थीं। इसके बाद से वे यथावत हैं, क्योंकि परिसीमन कराकर लोकसभा सीटें बढ़ाने की पहल को फ्रीज कर दिया गया था। 1971 में भारत की आबादी करीब 55 करोड़ थी। अब 140 करोड़ हो चुकी है, पर लोकसभा सीटें 543 ही हैं। इसके चलते एक लोकसभा सदस्य को कहीं अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है। कहीं-कहीं तो यह आबादी 45 लाख से भी अधिक है। परिसीमन फ्रीज करने का एक बड़ा कारण दक्षिण के राज्यों का यह तर्क था कि वे अपनी आबादी कम करने में सफल रहे हैं और यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो उत्तर भारत के मुकाबले लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, लेकिन प्रश्न यह है कि अब जब नई जनगणना के बाद परिसीमन होगा तो क्या उस समय वे यह जिद पकड़ेंगे कि वह जनसंख्या के आधार पर न हो?

जो भी हो, विपक्षी नेता यह समझा नहीं सके कि उनका महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक के विरोध के पीछे औचित्य क्या था? इस विधेयक के गिर जाने से विपक्षी दल यह कह सकते हैं कि उन्होंने सरकार के इरादों पर पानी फेर दिया, लेकिन उनके लिए जनता को यह समझाना कठिन होगा कि उन्होंने महिला आरक्षण क्यों नहीं लागू होने दिया? यह तय है कि महिला आरक्षण की पहल नाकाम हो जाने पर भाजपा विपक्ष के रवैये को राजनीतिक रूप से भुनाने की हरसंभव कोशिश करेगी और उन्हें महिला हित विरोधी करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

कांग्रेस कुछ भी दावा करे, सच यह है कि उसकी बुनियाद कमजोर होती जा रही है। उसके पास इतनी सामर्थ्य नहीं और न ही उसका संगठन ऐसा है कि वह प्रस्तावित 816 सीटों पर सक्षम प्रत्याशी खड़े कर पाती और उन्हें सही से चुनाव लड़ा पाती। ध्यान रहे उसके मुकाबले भाजपा का संगठन कहीं अधिक सशक्त है। जब महिला आरक्षण लागू कराने के लिए विशेष सत्र बुलाने का फैसला किया गया होगा, तब मोदी सरकार को यह आभास अवश्य रहा होगा कि विपक्षी दल बाधा खड़ी करेंगे। सरकार इसके संभावित परिणामों का सामना करने के लिए तैयार होगी, अन्यथा वह जोखिम नहीं उठाती। उसने यह जोखिम इसीलिए उठाया ताकि नाकामी की स्थिति में उसे विपक्ष के खिलाफ नैरेटिव बनाने में आसानी हो। विपक्ष ने उसे यह मौका खुद ही दे दिया।

निःसंदेह महिलाओं के राजनीति में आने से राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर सुधार होता। वैसे भी पंचायतों में उनकी भागीदारी से माहौल बदला है। प्रधान और पंचायत प्रमुख के रूप में वे बेहतर काम कर रही हैं। आखिर जब पंचायतों में महिलाओं की सीटें 50 प्रतिशत तक हो गई हैं तो लोकसभा और विधानसभाओं में उनके लिए 33 प्रतिशत स्थान क्यों नहीं आरक्षित हो सकते? विपक्ष का एक तर्क यह था कि सरकार चाहे तो मौजूदा लोकसभा सीटों में ही महिला आरक्षण लागू कर दे, लेकिन यदि ऐसी कोई पहल होती तो भी शायद विपक्ष पीछे हट जाता, क्योंकि उसके पुरुष सांसद इसके लिए तैयार नहीं होते। वास्तव में सभी राज्यों में लोकसभा की 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाकर महिला आरक्षण लागू करने की पहल ही एक उपयुक्त तरीका था। लगता है विपक्ष ने यह ठान लिया था कि उसे हर हाल में महिला आरक्षण की पहल को पटरी से उतारना है। उसकी ओर से सरकार की पहल के विरोध में जो तर्क दिए गए, वे खोखले ही अधिक थे।

दक्षिण के कई राजनीतिक दलों समेत अन्य क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने हित की तो बात की, लेकिन महिलाओं के हित की अनदेखी कर दी। पता नहीं क्यों क्षेत्रीयता की राजनीति करने वाले दल यह भूल जाते हैं कि जब कोई सांसद बनता है तो वह देश के संविधान की शपथ लेता है। इस शपथ में क्षेत्र विशेष का कोई महत्व नहीं होता। समझना कठिन है कि राष्ट्रीय महत्व के विधेयक पर क्षेत्रीय संकीर्णता का परिचय क्यों दिया गया? आखिर ऐसा तो है नहीं कि लोकसभा सदस्य राज्य या क्षेत्र विशेष के हितों की रक्षा के लिए निर्वाचित होते हैं। यह काम तो विधायकों के जिम्मे होता है। अच्छा होता कि विपक्ष इस अंतर को समझता।

Sanjay Gupta Sir

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]