संपादकीय: युद्धविराम पर संशय, कभी ईरान अपनी जिद पर अड़ता है तो कभी अमेरिका
ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने की घोषणा के बाद अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखने पर इसे फिर बंद कर दिया। इससे पश्चिम एशिया में युद्धविराम पर संशय गहरा गया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट बढ़ रहा है।
HighLights
ईरान के विदेश मंत्री की ओर से होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने की घोषणा को 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि ईरानी सेना ने उस पर फिर से अपना पहरा बैठाने का फैसला कर लिया। उसने इस कारण होर्मुज को फिर से बंद करने का फैसला किया, क्योंकि अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी जारी रखने पर अड़ा है। साफ है कि पश्चिम एशिया संकट के मामले में कभी ईरान अपनी जिद पर अड़ता है तो कभी अमेरिका।
जब युद्धविराम की शर्तों के तहत होर्मुज खोलने पर सहमति बन गई थी और उसका दायरा लेबनान तक प्रभावी हो जाने के बाद ईरान ने इस समुद्री मार्ग को पूरी तरह खोलने की घोषणा कर दी थी तो फिर अमेरिका को भी ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी करने के अपने फैसले से पीछे हट जाना चाहिए था। तब तो और भी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के फैसले का स्वागत किया और दोनों देश दूसरे दौर की शांति वार्ता करने की संभावनाएं भी टटोल रहे हैं।
यह अमेरिका और ईरान के साथ पश्चिम एशिया के लिए ही आवश्यक नहीं है कि दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम को स्थायी रूप दिया जाए, बल्कि विश्व समुदाय के लिए भी आवश्यक है, क्योंकि होर्मुज के बाधित होने के कारण विश्व भर में ऊर्जा संकट गहरा रहा है। वैसे तो इस समुद्री मार्ग के बाधित होने से सबसे अधिक भारत और अन्य एशियाई देश प्रभावित होते हैं, लेकिन इस मार्ग से तेल और गैस की आपूर्ति में कमी आने के नतीजे में उनके दाम बढ़ने का असर पूरे विश्व पर पड़ता है।
यह ठीक है कि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की अनुमति एक माह के लिए और बढ़ा दी, लेकिन आखिर वह यह तय करने वाला होता कौन है कि किस देश से तेल-गैस खरीदा जा सकता है? अमेरिका अपने स्वार्थों के चलते किसी न किसी ऊर्जा संपन्न देश पर प्रतिबंध लगाता ही रहता है। ईरान, वेनेजुएला और रूस इसके उदाहरण हैं। इसके दुष्परिणाम संबंधित देश के साथ अन्य देश भी भोगते हैं। अमेरिका यह जो मनमानी करता है, उसे चुनौती दी जानी आवश्यक है।
यह अच्छा है कि भारत रूस से तेल खरीद मामले में अमेरिका के रवैये की परवाह नहीं कर रहा है। भारत को न केवल अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए, बल्कि खुद को आर्थिक रूप से इतना सक्षम भी बनाना चाहिए कि अमेरिका किसी तरह का अनुचित दबाव न डालने पाए। अमेरिका और ईरान के बीच लागू अस्थायी युद्धविराम की अवधि जैसे-जैसे करीब आ रही है, उसके स्थायी रूप लेने पर वैसे-वैसे संशय बढ़ रहा है। इस नाजुक युद्धविराम को देखते हुए भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए और अधिक सक्रियता दिखानी होगी। उसे न केवल ऊर्जा आयात के नए विकल्प तलाशने होंगे, बल्कि इसके लिए भी उपाय करने होंगे कि आयातित ऊर्जा पर निर्भरता कम कैसे हो।



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