सुनीता नारायण। ईरान के खिलाफ विनाशकारी अमेरिका-इजरायल संघर्ष ने दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर दिया है। अमीर और गरीब दोनों तरह के देशों की सरकारें अपने लोगों को आने वाले भीषण समय के बारे में सचेत कर रही हैं, जैसा इस पीढ़ी ने पहले कभी नहीं देखा। ऊर्जा/ईंधन की अविश्वसनीय कमी, राशनिंग और यहां तक कि कारों और हवाई जहाजों के ईंधन खत्म होने की आशंका। सवाल यह है कि भविष्य का ऊर्जा मानचित्र कैसा दिखेगा?

विनाश और मानवीय पीड़ा

जैसा कि मैं यह पूछ रही हूं, मैं आपसे अनुरोध करूंगी कि उन हत्याओं, हजारों जानों के नुकसान और उस संवेदनहीन विनाश को हल्के में न लें जिसे हम अपनी स्क्रीन पर देखते हैं। इस ऊर्जा व्यवधान द्वारा दुनिया में लाए गए वास्तविक दर्द को भी कम करके न आंकें। कई देश रसोई ईंधन (एलपीजी) की कमी का सामना कर रहे हैं, और परिवार इसे किसी भी कीमत पर हासिल करने के लिए अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च कर रहे हैं। ईंधन स्टेशनों पर लंबी कतारें सामान्य हो रही हैं- जो फिर से उन लागतों को बढ़ा रही हैं जिन्हें लोग मुश्किल से वहन कर सकते हैं।

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

ज्यादातर देशों में, विशेष रूप से हमारी दुनिया में, ईंधन आयात व्यापार घाटे पर सबसे अधिक भार है और इस स्थिति में, तेल की बढ़ती कीमतों का अर्थव्यवस्थाओं पर अपंग कर देने वाला प्रभाव पड़ता है। वहीं वैश्विक उर्वरक आपूर्ति में आसन्न कमी से किसानों पर भारी मार पड़ने की आशंका है- वे जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन से प्रेरित चरम मौसम और विकृत वैश्विक खाद्य कीमतों से जूझ रहे हैं। कुल मिलाकर, दुनिया घुटनों पर है- पसंद से नहीं, बल्कि ईरान के खिलाफ इस संवेदनहीन अमेरिका-इजरायल संघर्ष के प्रति अपनी डरपोक और दयनीय प्रतिक्रिया के कारण। नियम-आधारित व्यवस्था और उसकी सारी नैतिकता तार-तार हो चुकी है।

ऊर्जा संक्रमण की गति

यह हमारे सामने सवाल छोड़ता है कि इस झटके का ऊर्जा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस अशोभनीय संघर्ष से पहले भी दुनिया ऊर्जा संक्रमण के बीच में थी-बिजली के लिए कोयले को लगातार नवीकरणीय ऊर्जा से बदलना और वाहनों में पेट्रोल और डीजल के उपयोग को विस्थापित करना। अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक, दुनिया की स्थापित बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत थी।

विकासशील देशों का नेतृत्व

दिलचस्प बात यह है कि यह ऊर्जा संक्रमण केवल वहां नहीं हो रहा था जहां उम्मीद की जा सकती थी-जैसे चीन या यूरोप। थिंक टैंक 'एंबर' की एक रिपोर्ट में पाया गया कि 74 सबसे जलवायु-संवेदनशील देश 'इलेक्ट्रो-टेक' को तेजी से अपना रहे थे, इसलिए नहीं कि वे जलवायु परिवर्तन के प्रति चिंतित थे, बल्कि इसलिए कि यह तेज, सस्ता और अधिक विश्वसनीय था। ये देश जीवाश्म ईंधन को छोड़कर सीधे नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ सकते हैं। रिपोर्ट कहती है, 'सौर उत्पादन में नामीबिया और टोगो, बैटरी बिक्री में जार्डन और किर्गिस्तान, और ईवी अपनाने में नेपाल और श्रीलंका आगे हैं।'

भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा

वर्तमान व्यवधान ने ऊर्जा आयात की लागत बढ़ा दी है और देशों को ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता के प्रति जागरूक कर दिया है। तेल और गैस के बाजारों को हासिल करने के लिए फिर से होड़ मची है। यह देशों को अपने स्वयं के संसाधनों- कोयला से लेकर चारकोल तक- का अधिक उपयोग करने के लिए प्रेरित कर सकता है, जो दोनों ही प्रदूषणकारी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक प्रवाह का लगभग 20 प्रतिशत बाधित हुआ है। इसका मतलब यह हो सकता है कि सस्ते और प्रचुर मात्रा में जीवाश्म ईंधन का समय समाप्त हो गया है।

एक विभाजित दुनिया

अब स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का तर्क राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा में निहित होगा। जैसा कि मैं यह लिख रही हूं, मुझे दुख के साथ स्वीकार करना चाहिए कि भविष्य आसान नहीं होने वाला है। यह वर्तमान समय मुझे बताता है कि एक वैश्विक समाज के रूप में हम पीछे हटे हैं। मानवीय विनाश और पतन के इन खंडहरों से टुकड़ों को समेटना कठिन होगा। ऐसी टूटी और विभाजित दुनिया में जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं को हल करना हमारे लिए कठिन होगा!

(लेखिका सीएसई की महानिदेशक एवं डाउन टू अर्थ की संपादक हैं)