विचार: परिस्थितियों का लाभ उठाए भारत
अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक के दिल्ली दौरे और व्यापार समझौते पर चर्चा हुई। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले और ट्रंप की आर्थिक नीतियों के कारण अमेरिका पर दबाव बढ़ा है।
HighLights
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ट्रंप की व्यापार नीतियों पर अंकुश लगाया।
बढ़ते व्यापार घाटे और महंगाई से अमेरिका पर आर्थिक दबाव।
भारत को H1B वीजा सहित बेहतर व्यापार शर्तें मिल सकती हैं।
शिवकांत शर्मा। बीते दिनों अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक एकाएक दिल्ली दौरे पर पहुंचे। उन्होंने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से बातचीत की और उसे सार्थक भी बताया। ये वही लुटनिक हैं जिन्होंने पिछले महीने कहा था कि व्यापार समझौते की सारी तैयारी हो चुकी थी और यदि मोदी जी राष्ट्रपति ट्रंप को फोन कर लेते तो समझौता हो गया होता। भारत को उनके दावे का खंडन करना पड़ा। उससे पहले कहा था कि एक-दो महीनों के भीतर ही भारत को माफी मांगनी होगी और समझौता करने की कोशिश करनी होगी।
क्या उन्होंने यह कहते समय सोचा होगा कि एक दिन उन्हें ही समझौते के लिए भागकर भारत आना होगा? समय का यह फेर अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक निर्णय ने कराया जिसने टैरिफ लगाने के लिए आपात आर्थिक शक्ति कानून के प्रयोग को असंवैधानिक ठहरा दिया। विडंबना यह है कि आपात आर्थिक शक्ति कानून को 1977 में राष्ट्रपति की आपात शक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए पारित किया गया था। हालांकि ट्रंप उसी का प्रयोग अपनी विदेश-अर्थनीति के बड़े हथियार के रूप में कर पूरी दुनिया को नचा रहे थे।
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के अंकुश से तिलमिलाए ट्रंप ने व्यापार अधिनियम की धारा 122 का प्रयोग करते हुए सभी देशों के आयात पर 24 फरवरी से 10 प्रतिशत सरचार्ज लगाने का एलान कर दिया और अगले ही दिन उसे उसकी अधिकतम सीमा तक बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की धमकी दे डाली। अब वे उन देशों को धारा 232, 301 और 388 के सहारे सबक सिखाने की धमकी दे रहे हैं जो नए सिरे से मोलभाव करने की योजना बना रहे हैं। धारा 232 उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के बहाने और धारा 301 अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यापारिक हथकंडे अपनाने वालों के खिलाफ टैरिफ और प्रतिबंध थोपने का अधिकार देती हैं।
धारा 388 अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुंचाने वाले देश पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देती है, परंतु ये धाराएं न्यायिक जांच के बिना इंटरनेट मीडिया पर आधी रात के फरमानों से लागू नहीं की जा सकतीं और इन्हें अदालतों में चुनौती दी जा सकती है। धारा 122 के तहत लगाए सरचार्ज के लिए भी 150 दिनों के भीतर कांग्रेस का अनुमोदन लेना होगा जो चुनावों में उलझी कांग्रेस से ले पाना असंभव सा दिखता है। इसके अलावा ट्रंप अब दूसरे देशों को रूसी तेल खरीदने से रोकने या कब्जा करने में उनका साथ देने पर विवश करने के लिए टैरिफ लगाने की धमकियों से दबाव नहीं डाल पाएंगे।
भारत ने अमेरिका के दबाव में आने के बजाय दूसरों से समझौते करके अमेरिका पर दबाव बनाने की कोशिश की। भारत जानता था कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ट्रंप के मनमाने टैरिफों को असंवैधानिक ठहरा सकता है। इसलिए वह जिस फ्रेमवर्क पर सहमत हुआ, उसमें यह गुंजाइश रखी गई कि दोनों में से कोई देश अपनी शर्तें बदलता है तो दूसरे को भी अपनी शर्तें बदलने की छूट होगी। इसी को आधार बनाकर भारतीय व्यापार प्रतिनिधि दल समझौते को अंतिम रूप देने अमेरिका नहीं गया।
ट्रंप इस समय चारों ओर से दबाव में हैं। ईरान जिस तरह इजरायल और अमेरिका के हमलों का जवाब देने में लगा हुआ है, उससे उन पर दबाव और बढ़ गया है। यह युद्ध लंबा खिंचा तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था का भी संकट बढ़ेगा। दुनिया से 175 अरब डालर का टैरिफ उगाहने के बावजूद अमेरिका का व्यापार घाटा पिछले महीने 900 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर बना हुआ है। आर्थिक विकास की दर पिछली तिमाही में घटकर 1.4 प्रतिशत रह गई है और महंगाई तीन प्रतिशत के आसपास चल रही है। लोग बढ़ते दैनिक खर्च से परेशान हैं, जिसे कम करने के वादे पर ट्रंप जीते थे।
उन्होंने अपने समर्थकों को यह आभास दिया था, मानो उनके टैरिफ निर्यातकों को चुकाने होंगे, लेकिन हकीकत यह है कि लगभग सारे टैरिफ आयातक कंपनियों ने चुकाए और उनका कुछ बोझ अपने ग्राहकों पर भी डाला। इसलिए हाल के महीनों में अमेरिकी बाजारों में दैनिक जरूरत का सामान महंगा हुआ है। बेरोजगारी भी बढ़ रही है और संसदीय चुनाव सिर पर हैं। ट्रंप की लोकप्रियता का ग्राफ 40 प्रतिशत पर अटका हुआ है, जिसके चलते कांग्रेस में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिलने की प्रबल संभावना है। यदि ऐसा हुआ तो ट्रंप की तमाम आर्थिक नीतियों पर अंकुश लग जाएगा।
दूसरी तरफ जिन-जिन देशों के साथ व्यापार समझौते हुए हैं, वे सभी उनपर पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। जापान, यूरोप, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश निवेश प्रस्तावों से कदम पीछे खींच रहे हैं, जिन्होंने टैरिफ के आतंक में निवेश का वादा किया था। इसलिए व्यापार समझौते का दबाव इस समय भारत की जगह अमेरिका पर है और भारत को इसका लाभ उठाते हुए चतुराई से मोलभाव करना चाहिए। जैसे प्रशिक्षित सेवाकर्मियों और छात्रों की मोबिलिटी से जुड़े एच1बी वीजा का फ्रेमवर्क में जिक्र नहीं है। भारत को उसे यूरोप और रूस के साथ हुए समझौतों की तरह अमेरिका से प्रस्तावित समझौते में भी शामिल कराने की कोशिश करनी चाहिए, परंतु समझौता जरूर करना चाहिए।
यूरोपीय संघ और दूसरे देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों के बावजूद भारत के लिए अमेरिका संग व्यापार समझौते का महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि अमेरिका भारत के वस्तु निर्यात का सबसे बड़ा और समृद्ध बाजार है। भारत से निर्यात होने वाला 20 प्रतिशत सामान वहां जाता है। विदेशी व्यापार से होने वाले कुल लाभ में करीब 60 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिकी बाजार की है। यही भारत के साथ समझौते के लिए अमेरिका की उत्सुकता का मुख्य कारण भी है। वह अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। साथ में वह जिस भरोसेमंद सप्लाई चेन को तैयार करना चाहता है, उसकी मुख्य कड़ी भारत के सिवा कोई और नहीं बन सकता। वहीं, भारत को जिस तकनीक और पूंजी की आवश्यकता है वह उसे अमेरिका के सिवा कहीं और से नहीं मिल सकती। इसलिए समझौता होने से पहले ही उसके विरोध में उछलने-कूदने की जगह भारत को अपनी जरूरतों और हकीकत को समझना और दूरदर्शिता से काम लेना चाहिए।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)












