संजय गुप्त। जैसी आशंका थी, वैसा ही हुआ। अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला बोल दिया। इस हमले को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि वे वहां सत्ता बदलने के साथ ईरान की परमाणु हथियार निर्माण क्षमता खत्म करना चाहते हैं। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के साथ ही करीब 40 वर्षों से सत्ता पर काबिज एक कठोर मजहबी शासन के संचालक का अंत हो गया, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि इस देश में सत्ता परिवर्तन भी होने जा रहा है। फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं।

अमेरिका और इजरायल ईरान पर हमले के लिए चाहे जो तर्क दें, उसे वैध नहीं कहा जा सकता। यह वैसा ही मनमाना हमला है, जैसा वेनेजुएला में किया गया था। अमेरिका पिछले काफी समय से ईरान की घेरेबंदी के साथ ही उससे वार्ता भी कर रहा था। इस वार्ता के बीच ही उसने ईरान पर हमला कर दिया।

ईरान अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों का जवाब देने में लगा हुआ है। वह इजरायल को निशाना बनाने के साथ ही पड़ोसी देशों सऊदी अरब, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात आदि में अमेरिकी सैनिक ठिकानों के साथ इन देशों के नागरिक क्षेत्रों को भी निशाना बना रहा है। इससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है। ईरान ने खाड़ी के देशों में मिसाइलें और ड्रोन दागने के साथ ही होर्मुज समुद्री जल मार्ग बंद कर दिया है। उसने इस जल मार्ग से निकलने की कोशिश कर रहे कुछ तेल टैंकरों पर भी हमला किया।

होर्मुज जल मार्ग बंद होने से पश्चिम एशिया से आने वाले तेल एवं गैस की आपूर्ति रुक गई है। इस जल मार्ग से दुनिया के कुल उपभोग के लगभग एक चौथाई हिस्से की तेल एवं गैस की आपूर्ति होती है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से भारत समेत दुनिया के कई देशों को तेल एवं गैस की आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है। यदि पश्चिम एशियाई देशों से तेल एवं गैस की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो विश्व में ऊर्जा संकट खड़ा हो सकता है।

ईरान पड़ोसी देशों के नागरिक ठिकानों पर हमला कर और फिर होर्मुज जल मार्ग को बंद करके खुद को विश्व से अलग-थलग करने का ही काम कर रहा है। यदि उसने अपना रवैया नहीं बदला तो उसके प्रति जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति है, वह खत्म होने में देर नहीं लगेगी, क्योंकि तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और इससे दुनिया की बेचैनी बढ़ती जा रही है।

इजरायल-अमेरिका और ईरान युद्ध ने भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती भी खड़ी कर दी है, क्योंकि उसके संबंध दोनों पक्षों से है। हालांकि भारत ने खामेनेई की मौत पर शोक व्यक्त किया है और लगातार ऐसे बयान दे रहा है कि किसी भी विवाद का समाधान संवाद से होना चाहिए, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि खामेनेई के नेतृत्व वाला ईरान का मजहबी शासन तंत्र निरंकुश था। वह अपने ही लोगों का दमन करने के लिए कुख्यात था। कुछ ही दिनों पहले उसकी पुलिस ने उन हजारों प्रदर्शनकारियों को मारा, जो उसकी नीतियों से नाराज होकर सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे थे।

खामेनेई के पूर्ववर्ती खुमैनी इस्लामिक क्रांति के नाम पर राजशाही को हटाकर ईरान की सत्ता पर काबिज हुए थे। उन्होंने अपने लोगों को कट्टर इस्लामिक तौर-तरीके अपनाने के लिए बाध्य किया। उनके निधन के बाद उनकी जगह कमान संभालने वाले खामेनेई भी उन्हीं के रास्ते पर चले। उनके सत्ता में रहते ईरान ने हमास, हिजबुल्ला, हाउती जैसे चरमपंथी गुटों को सहयोग और समर्थन दिया। ये सभी गुट इजरायल के लिए खतरा बने हुए हैं।

ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से अमेरिका ने कई बार वहां के असंतुष्टों को विद्रोह के लिए उकसाया, पर वह सफल नहीं हो सका और दूसरी ओर ईरान ने इन असंतुष्टों का निर्ममता से दमन किया। हालिया विद्रोह को भी उसने निर्ममता से कुचला। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि खामेनेई की मौत के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन बनेगा। इसमें संदेह है कि अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन करा सकेगा। यदि वह इसमें सफल नहीं हुआ तो ट्रंप के इरादों पर पानी ही फिरेगा। संदेह इस पर भी है कि इजरायल और अमेरिका ईरान की परमाणु हथियार निर्माण क्षमता खत्म कर सकेंगे। पिछले वर्ष जून में जब इन दोनों देशों ने ईरान पर हमला किया था, तब यह दावा किया था कि उसके परमाणु हथियार संबंधी तंत्र को ध्वस्त कर दिया गया।

ईरान ने अपनी समस्या इसलिए बढ़ा ली है, क्योंकि एक तो वह परमाणु हथियार बनाने पर आमादा है और दूसरे इजरायल को दुनिया के नक्शे से मिटाने की बातें करता रहता है। इस कारण पश्चिमी देश उससे सशंकित रहते हैं। ईरान कठोर अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने के बाद भी न तो हमास, हिजबुल्ला जैसे गुटों को हथियार एवं पैसा देने की अपनी नीति छोड़ रहा है और न ही परमाणु हथियार बनाने के इरादे का परित्याग कर रहा है। इन प्रतिबंधों के चलते उसकी अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। वह इसके बाद भी अपना रवैया बदलने के लिए तैयार नहीं कि उसके समर्थक देश रूस और चीन उसकी एक सीमा से अधिक मदद करने में सक्षम नहीं।

यह सही है कि खामेनेई की मौत से ईरानी जनता का एक वर्ग खुश है, लेकिन यह कहना कठिन है कि वह सत्ता परिवर्तन में सहायक बन सकेगा, क्योंकि ईरानी सेना और खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर की देश पर मजबूत पकड़ है। ऐसा लगता है कि अमेरिका ने बिना किसी ठोस रणनीति के ईरान पर हमला कर दिया, क्योंकि सभी नाटो देश उसका साथ देने के इच्छुक नहीं। ट्रंप ने इस हमले से विश्व अर्थव्यवस्था के समक्ष जो संकट बढ़ाया है, उसकी चपेट में वह भी आएगा।

लगता है सुप्रीम कोर्ट की ओर से अपनी टैरिफ नीति खारिज किए जाने से अपनी कमजोर होती स्थिति से अपने लोगों को ध्यान बंटाने के लिए ट्रंप ने ईरान को निशाना बनाया। यदि ट्रंप प्रशासन को अवैध ठहराए गए टैरिफ को वापस करना पड़ा और ईरान से युद्ध लंबा खिंचा तो शेष विश्व के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी चरमरा सकती है। इसी के साथ ट्रंप का वैश्विक तेल कारोबार पर अपना दबदबा बनाने और इस बहाने डालर का वर्चस्व कायम रखने का सपना भी टूट सकता है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वेनेजुएला की तरह ईरान भी अपना तेल डालर में नहीं बेच रहा था।

Sanjay Gupta Sir

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]