संपादकीय: अमेरिका का मुगालता, रूस से तेल खरीद की छूट उदारता नहीं बल्कि मजबूरी
अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारत को रूस से एक माह तक तेल खरीदने की छूट को लेख मजबूरी बताता है, उदारता नहीं। भारत ने यूरोपीय संघ से व्यापार समझौता कर अमेरिका को संदेश दिया कि उसके पास अन्य विकल्प हैं।
HighLights
अमेरिकी प्रशासन ने भारत को रूस से एक माह तक तेल खरीदने की जो कथित छूट दी, उससे कुछ ऐसा ध्वनित हो रहा है कि यह तय करने का अधिकार उसने अपने हाथ ले लिया है कि कौन देश किससे, कब तेल खरीद सकता है और कौन नहीं? उसके पास ऐसा कोई अधिकार न था, न है और न हो सकता है, लेकिन यूक्रेन युद्ध खत्म कराने के बहाने वह लंबे समय से भारत पर रूस से तेल न खरीदने का दबाव बनाए हुए है।
उसने भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भी थोपा, पर भारत ने इसकी परवाह नहीं की। आखिरकार उसने अपने स्तर से ही भारत से अंतरिम व्यापार समझौता पर सहमति बन जाने की घोषणा करते हुए पारस्परिक टैरिफ 25 से 18 प्रतिशत किया और रूस से तेल खरीदने के कारण लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ को खत्म किया।
वास्तव में वह ऐसा करने के लिए बाध्य हुआ, क्योंकि भारत ने यूरोपीय संघ से सभी व्यापार समझौते की जननी कहे जाने वाला व्यापार समझौता कर उसे यह संदेश दिया कि उसके पास और भी विकल्प हैं। सच यह भी है कि भारत ने रूस से तेल खरीद पूरी तौर पर कभी भी बंद नहीं की। जनवरी और फरवरी माह में भी उसने रूस से तेल खरीदा। इसके अलावा भारत बार-बार यह भी दोहराता रहा है कि वह अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए रूस समेत कहीं से भी तेल खरीदने के लिए स्वतंत्र है।
आखिर जब भारत रूस से तेल खरीद ही रहा है तो फिर अमेरिका के यह कहने का क्या मतलब कि वह भारत को उससे 30 दिन के लिए तेल खरीदने की छूट दे रहा है? अमेरिका ने तथाकथित उदारता दिखाते हुए भारत को रूस से तेल खरीदने की जो मंजूरी दी, वह उसकी मजबूरी का ही परिचायक है। वह जानता है कि ईरान से युद्ध के कारण पश्चिम एशिया से तेल एवं गैस की आपूर्ति बाधित हो रही है और उनके दाम भी बढ़ रहे हैं।
इससे समूची विश्व अर्थव्यवस्था के समक्ष जो संकट पैदा होगा, उसके दुष्प्रभाव से वह भी नहीं बच पाएगा। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि तेल एवं गैस की आपूर्ति का जो वैश्विक संकट खड़ा हो गया है, उसके लिए मूलतः अमेरिका ही जिम्मेदार है। यदि वह इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला नहीं करता तो होर्मुज जल मार्ग से तेल की आपूर्ति बाधित नहीं होती।
यह अमेरिका की जिम्मेदारी है कि वह उक्त जल मार्ग से पश्चिम एशियाई देशों से आने वाले तेल की आपूर्ति की बाधाओं को दूर करे, लेकिन फिलहाल वह इसमें समर्थ नहीं दिख रहा है, क्योंकि ईरान हार मारने को तैयार नहीं। अच्छा हो कि अमेरिका इस मुगालते से बाहर आए कि वह हर मामले में न तो अपनी ही चला सकता है और न ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार पर एकाधिकार कर सकता है। उसे यह भी आभास हो जाए तो अच्छा कि ईरान वेनेजुएला नहीं है।












