डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह। पश्चिम एशिया के अस्थिर-अशांत परिदृश्य में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष ने भारत को एक जटिल और नाजुक कूटनीतिक स्थिति में डाल दिया है। ईरान पर अमेरिका-इजरायली हमले ने, जिसे 'आपरेशन रोरिंग लायन' नाम दिया गया है, के बाद ईरान ने भी जार्डन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देशों पर मिसाइल हमलों के साथ जवाबी कार्रवाई की है। इसने ऊर्जा आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर भारत सहित प्रमुख शक्तियों के बीच वैश्विक चिंताओं को बढ़ा दिया है।

आज यह क्षेत्र पूर्ण युद्ध की कगार पर है, जिससे और अधिक चुनौतियां और चिंताएं पैदा हो रही हैं। जहां भारत-ईरान संबंध पारंपरिक रूप से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपर्कों द्वारा परिभाषित होते हैं, वहीं पिछले एक दशक में भारत ने इजरायल के साथ भी एक मजबूत और व्यापक रक्षा साझेदारी बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया इजरायल यात्रा ने दोनों देशों ने अपने संबंधों को "शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी" के स्तर तक बढ़ाया है।

पश्चिम एशिया के साथ गहरे जुड़ाव को देखते हुए भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता व्यापार, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा आपूर्ति है। भारत को न केवल संतुलन बनाने, बल्कि क्षेत्र में अपने बड़े हितों को सुरक्षित करने पर भी ध्यान देना होगा। यह संकट हमारी “ऊर्जा सुरक्षा” के लिए चिंताएं पैदा करता है। यह क्षेत्र हमारे तेल आयात का लगभग 55 प्रतिशत आपूर्ति करता है, जिसमें इराक और सऊदी अरब जैसे देश शीर्ष आपूर्तिकर्ता हैं। मध्य एशिया से आने वाले कच्चे तेल की आपूर्ति को इसकी क्षेत्रीय निकटता और रिफाइनरी अनुकूलता के लिए महत्व दिया जाता है। इसके अलावा भारत कच्चे तेल का लगभग दो-तिहाई और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का आधा हिस्सा होर्मुज की खाड़ी के माध्यम से आयात करता है, जो एक प्रमुख शिपिंग मार्ग है और जिसे ईरान ने बंद कर दिया है। यह हमारे तेल आयात का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।

पश्चिम एशिया से तेल की शिपिंग के लाजिस्टिक फायदे भी हैं। हालांकि भारत वैकल्पिक ईंधन स्रोतों की खोज कर रहा है, विशेष रूप से पश्चिम अफ्रीका में, लेकिन पश्चिम एशिया क्षेत्र में बढ़ता संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए चिंताजनक स्थिति पैदा करता है। 2025 में इसी तरह के तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को सौ डालर प्रति बैरल से ऊपर धकेल दिया था, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया था और घरेलू मुद्रास्फीति की दर भी प्रभावित हुई थी। तेल की कीमतों में वृद्धि हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को प्रभावित करेगी और घरेलू बाजार पर दबाव डालेगी।

भारत के ईरान और इजरायल, दोनों से व्यापारिक संबंध हैं। 2025 में ईरान के साथ व्यापार लगभग 2.42 अरब अमेरिकी डालर रहा, जिसमें भारत ने 1.24 अरब डालर के सामान का निर्यात किया। यूरोप और उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र में भारत अपने निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा 'बाब अल-मंदब जल मार्ग के जरिए करता है।

हाल के समय में इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों में एक मौलिक बदलाव आया है, जो केवल परंपरागत लाजिस्टिक रक्षा आपूर्ति से आगे बढ़कर भारत में संयुक्त सैन्य संसाधनों के साझा विकास और उत्पादन तक पहुंच गया है। इजरायल भारत के लिए उन्नत हथियारों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, जिसमें ड्रोन और मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। ऐसे में ईरान और इजरायल के बीच कूटनीतिक संतुलन साधते हुए अपने हितों को बचाना भारत की पहली प्राथमिकता होगी।

पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाला संकट वहां हमारी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी प्रभावित करेगा। एक बड़ी चिंता भारत के ‘अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (आइएनएसटीसी) के बाधित होने की हो सकती है, जिसका उद्देश्य ईरान के माध्यम से यूरोपीय व्यापार को बढ़ावा देना है। आइएनएसटीसी का पूरा होना ईरानी रेल और सड़क नेटवर्क पर निर्भर करता है। युद्ध के चलते इन बुनियादी ढांचों को सैन्य रसद के लिए स्थानांतरित कर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त ईरान का चाबहार बंदरगाह भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेश है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ सीधा संपर्क स्थापित करता है। यह न केवल पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, जिसे चीन द्वारा बनाया जा रहा है, का एक रणनीतिक विकल्प है, बल्कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता पूरी करने और मध्य एशिया में दुर्लभ खनिजों को प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण कदम है। चाबहार बंदरगाह आइएनएसटीसी का प्रवेश बिंदु है। इज़रायल-ईरान संघर्ष का बढ़ना इस परियोजना को प्रभावित कर सकता है।

एक और महत्वपूर्ण परियोजना जो इस संघर्ष से प्रभावित हो सकती है, वह है भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आइएमईसी)। क्षेत्र में अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए दिल्ली की यह एक और महत्वपूर्ण पहल है। प्रधानमंत्री मोदी की 'एक्ट वेस्ट पालिसी' का उद्देश्य स्वेज नहर के माध्यम से स्थापित परंपरागत व्यापार मार्गों से हटकर भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच एक नए आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना है और आइएमईसी इस उद्देश्य के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कड़ी है। ईरान संकट ने इन सभी कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

रणनीतिक और आर्थिक कारणों के अलावा इस संकट का एक मानवीय पक्ष भी है, जो भारत के राष्ट्रीय हित का एक बड़ा पहलू है। पश्चिम एशियाई क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। यह समुदाय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हर साल लगभग सौ अरब डालर का योगदान देता है।

यह वित्तीय प्रवाह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो व्यापार असंतुलन और वैश्विक मुद्रा में उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक बफर (सुरक्षा) प्रदान करता है। इस पूरे विवाद में भारत की नीति बहुपक्षीय सहयोग की नीति के अनुसार है। सभी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ अपने अच्छे संबंधों का लाभ उठाकर दिल्ली एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में भी कार्य कर सकती है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)