किसी की भी अनदेखी-उपेक्षा उसका अनादर ही होता है। पश्चिम बंगाल के दौरे पर गईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के साथ ऐसा ही हुआ। चूंकि उन्होंने इसे लेकर अपनी आपत्ति और पीड़ा प्रकट की, इसलिए यह सहज ही समझा जा सकता है कि वास्तव में उनके लिए निर्धारित प्रोटोकाल का उल्लंघन किया गया। यह इससे सिद्ध भी होता है कि उनके कार्यक्रम स्थल में बार-बार बदलाव किया गया और अंतत: उसका आयोजन ऐसी जगह किया गया, जहां लोगों को पहुंचने में कठिनाई का सामना करना पड़ा।

इससे भी खराब बात यह रही कि बदले हुए आयोजन स्थल पर जा रहे लोगों को इस आधार पर प्रवेश करने से रोका गया कि उनके पास आवश्यक निमंत्रण पत्र नहीं हैं, लेकिन वे तो वितरित ही नहीं किए गए थे। स्पष्ट है कि बंगाल सरकार में कोई यह चाहता था कि राष्ट्रपति का यह कार्यक्रम सफल न होने पाए। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि आदिवासियों के जिस कार्यक्रम में आदिवासी समाज की राष्ट्रपति को सम्मिलित होना था, उसमें बाधाएं खड़ी की गईं।

उनकी किस हद तक अनदेखी की गई, इसका एक प्रमाण यह भी है कि आयोजन स्थल पर उनके लिए आवश्यक सुविधाओं जैसे कि शौचालय आदि की व्यवस्था तक नहीं की गई। राष्ट्रपति जिस तरह पूर्व निर्धारित आयोजन स्थल पर गईं, उससे उन्होंने बंगाल प्रशासन की पोल ही खोली, क्योंकि उन्होंने पाया कि वहां पर कहीं अधिक लोगों के एकत्रित होने के लिए पर्याप्त स्थान था।

अच्छा होता कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनका प्रशासन यह समझता कि राष्ट्रपति के साथ उचित व्यवहार नहीं हुआ, लेकिन वे राष्ट्रपति को ही कठघरे में खड़ा करने में लग गईं। उन्होंने उन पर यह आरोप भी जड़ दिया कि वे भाजपा के इशारे पर राजनीति कर रही हैं। आखिर आदिवासियों के सम्मेलन में आदिवासी समाज की ही राष्ट्रपति का जाना दलगत राजनीति का विषय कैसे हो गया?

यह समझ आता है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग के खिलाफ धरने पर बैठे होने के कारण राष्ट्रपति की अगवानी के लिए नहीं पहुंच सकीं, लेकिन वे अपनी ओर से किसी मंत्री को तो इस कार्य के लिए नियुक्त कर ही सकती थीं। प्रोटोकाल भी यही कहता है और इसके कई उदाहरण हैं कि जब राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री के आगमन पर मुख्यमंत्री उपस्थित नहीं हो पाते तो वे अपने किसी मंत्री को उनके स्वागत के लिए भेजते हैं।

कोई नहीं जानता कि ममता बनर्जी को अपनी जगह किसी मंत्री को राष्ट्रपति का स्वागत करने के लिए भेजने में क्या कठिनाई थी? जो भी हुआ, अच्छा नहीं हुआ। राष्ट्रपति के किसी दौरे को दलगत राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए और वे जिस आदर एवं सम्मान की अधिकारी हैं, वह उन्हें प्रदान किया जाना चाहिए।