विचार: भारतीय शिक्षा का वैश्वीकरण आवश्यक
शिक्षा केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि एक विमर्श भी है। इस अर्थ में भारतीय ज्ञान के वैश्वीकरण से भारतीय विमर्श का भी वैश्वीकरण सुनिश्चित हो पाएगा।
HighLights
उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण देश की प्रगति हेतु आवश्यक।
विज्ञान-समाज विज्ञान समन्वय से शोध में नवोन्मेष बढ़ेगा।
TISS-ग्लोबल पहल सकारात्मक भारतीय विमर्श को बढ़ावा देगी।
बद्री नारायण। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल में कहा कि भारतीय उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण देश की प्रगति और सर्वांगीण विकास के लिए एक आवश्यक तत्व है। उनके अनुसार दुनिया भर में भारतीय शिक्षा और शोध की समृद्ध नवोन्मेषी परंपरा तथा इसके गतिशील वर्तमान का अकादमिक वृत्तांत प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए। यह लक्ष्य तभी संभव होगा, जब शिक्षा और शोध के क्षेत्र में हमारी वैश्विक आवाजाही तथा ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा।
वे निरंतर इस पर भी बल देते रहे हैं कि उच्च शिक्षा के इस वैश्विक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विज्ञान और समाज विज्ञान को परस्पर समन्वय के साथ कार्य करना होगा। जब तक विज्ञान और समाज विज्ञान परस्पर समन्वय के साथ कार्य नहीं करेंगे, तब तक भारतीय शोध का नवोन्मेष अधूरा रहेगा। तकनीकी और सामाजिक विषयों के एकीकृत प्रयास भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
जहां तक समाज विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रश्न है, इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर विमर्श की तत्काल आवश्यकता है। पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की रुचि केवल भारत के आइटी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वे भारतीय समाज विज्ञान में भी गहरी रुचि ले रहे हैं। उनके लिए भारत सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश और सबसे बड़ा विकासशील बाजार भी है। ऐसे में भारत के वर्तमान इतिहास, सामाजिक संरचना और उभरती आर्थिकी को समझना उनके लिए एक बड़ी बौद्धिक चुनौती और अवसर है।
दूसरा बिंदु यह है कि भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के आगमन का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। इन संस्थानों में लिबरल स्टडीज, समाज विज्ञान और कौशल विकास के लिए पर्याप्त स्थान होगा। यह भारतीय छात्रों को वैश्विक मानकों के अनुरूप सामाजिक विषयों के अध्ययन का अवसर प्रदान करेगा। तीसरा और सबसे अहम पहलू यह है कि वर्तमान में दुनिया के विभिन्न देशों के बीच केवल आर्थिक विकास की ही प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोधों के साथ-साथ बाजार, राजनीतिक आर्थिकी और समाज वैज्ञानिक विमर्शों के बीच एक वैचारिक टकराहट भी चल रही है।
प्रत्येक विकसित और विकासशील राष्ट्र चाहता है कि उसकी सफलता और विशिष्टता का नैरेटिव उसके आर्थिक प्रभाव के विस्तार को मजबूती दे। जो वैश्विक कारपोरेट घराने पूरी दुनिया में अपने व्यापार का विस्तार कर रहे हैं, उन्हें भी अपनी रणनीतियों के लिए न केवल वैज्ञानिक, बल्कि समाज वैज्ञानिक वृत्तांत चाहिए। भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा बढ़ रहा है, जिसे अब सुदृढ़ अकादमिक और समाज वैज्ञानिक शोधपरक वृत्तांतों के समर्थन की आवश्यकता है, पर विडंबना यह है कि वर्तमान में अधिकांश समाज वैज्ञानिक शोधों में हम अपने समाज, विकास और आर्थिकी के सकारात्मक तत्वों को खोजने के बजाय नकारात्मक विमर्शों में ही उलझे हुए हैं।
प्रतिष्ठित समाज वैज्ञानिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों को अब इस दिशा में सार्थक एवं सकारात्मक पहल करने की महती आवश्यकता है। इसी दिशा में टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल 'टीस-ग्लोबल' के नाम से शुरू करने जा रहा है। इस पहल के अंतर्गत दुनिया भर के उन विद्वानों को आमंत्रित किया जाएगा, जो भारत पर शोध कर रहे हैं। साथ ही देश के दिग्गज समाज विज्ञानियों और विकास विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाकर उन्हें भारतीय समाज एवं विकास के नकारात्मक चित्रण के बजाय सकारात्मक पक्षों पर शोध, समझ और विमर्श के लिए प्रेरित किया जाएगा। इस प्रक्रिया में देश के वैज्ञानिक एवं समाज वैज्ञानिक शोध संस्थानों का एक संयुक्त फोरम विकसित करना भी अनिवार्य है।
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों का खुलना एक सुखद स्थिति है, जो हमारे छात्रों को शिक्षा के विविध विकल्प प्रदान कर रही है, पर हमें इसके साथ ही दुनिया के अन्य हिस्सों-विशेषकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में अपने शिक्षा संस्थान खोलने की प्रक्रिया को भी तीव्र करना होगा। हमें अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों में विशिष्ट विषयों पर केंद्रित भारतीय संस्थान भी स्थापित करने होंगे।
शिक्षा केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि एक विमर्श भी है। इस अर्थ में भारतीय ज्ञान के वैश्वीकरण से भारतीय विमर्श का भी वैश्वीकरण सुनिश्चित हो पाएगा। ज्ञान एक प्रकार की शक्ति है और इसे अर्जित करने के लिए हमें उत्कृष्ट श्रेणी की भारतीय अकादमिक संस्कृति विकसित करनी होगी, ताकि हमारा युवा वर्ग, जो भारत की सबसे बड़ी सामर्थ्य है, वह केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा बनकर न रह जाए, वरन ज्ञान, मेधा और दक्षता से युक्त हो जाए।
इसके लिए हमें अपने शिक्षा संस्थानों में उत्कृष्टता को केंद्र में रखना होगा। प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत विराट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारतीय शिक्षा और शोध जगत को सर्वोच्च राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के साथ कार्य करना होगा। हमें शिक्षा एवं अनुसंधान के क्षेत्र में ऐसे उत्कृष्ट शोधार्थी और शिक्षक तैयार करने होंगे, जो वैश्विक छात्र समुदाय और विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। ज्ञान की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करना ही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला होगी।
(लेखक टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज, मुंबई के कुलपति हैं)












