संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण का प्रारंभ हंगामे से होने के आसार पर आश्चर्य नहीं। अब संसद के प्रत्येक सत्र की शुरुआत हंगामे से ही होती है और कई बार तो पूरा सत्र उसी की भेंट चढ़ जाता है। बजट सत्र के दूसरे चरण में एक तो लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान पक्ष-विपक्ष में तकरार तय है और दूसरे, ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हमले को लेकर विपक्ष की ओर से सरकार को घेरने के चलते आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला देखने को मिल सकता है।

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चाहे जितनी तीखी बहस हो, उसका नतीजा तय है। चूंकि सत्तापक्ष का बहुमत है और प्रधानमंत्री ने सत्र शुरू होने के पहले लोकसभा अध्यक्ष की प्रशंसा करते हुए जिस तरह कहा कि वे अहंकारी-उत्पाती छात्रों को ठीक करना जानते हैं, उससे यह स्पष्ट है कि वे सत्तापक्ष को ओम बिरला के पक्ष में एकजुट होने का संदेश दे रहे हैं। इस अविश्वास प्रस्ताव पर शक्ति परीक्षण भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ने अपने लोकसभा सदस्यों को 9-10 मार्च को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी कर दिया है।

भले ही उच्च सदन को वरिष्ठों का सदन कहा जाता हो और यह अपेक्षा की जाती हो कि इस सदन के सदस्य सभी विषयों पर कहीं अधिक धीर-गंभीर और दलगत हितों से ऊपर उठकर चर्चा करेंगे, लेकिन सच यह है कि अब लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी हंगामे के दृश्य दिखना आम हो गया है। बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने इजरायल-अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमले और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर भी बयान जारी करने की मांग की है।

हालांकि सरकार की ओर से खामेनेई की मौत पर शोक जताया जा चुका है, लेकिन कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस पर जोर दे सकते हैं कि सरकार उनके मन माफिक बयान जारी करे। विपक्षी दल इससे अनजान नहीं हो सकते कि इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष से जो जटिल स्थिति उपजी है, वह ऐसी नहीं कि सरकार किसी एक के पक्ष में खुलकर खड़ी हो सके।

इस स्थिति से सबसे अच्छी तरह लंबे समय तक केंद्र की सत्ता में रही कांग्रेस अवगत होगी, पर वही इस मामले में अपने संकीर्ण रवैये का परिचय देने में सबसे आगे रह सकती है। इसका प्रमाण सोनिया गांधी का वह लेख है, जिसमें उन्होंने पश्चिम एशिया संकट पर सरकार के रवैये को कोसा। कम से कम कांग्रेस को तो यह पता होना चाहिए कि विदेश नीति किसी दल या सरकार की नहीं, बल्कि देश की होती है और उस पर पक्ष-विपक्ष को न केवल सहमति कायम करनी चाहिए, बल्कि उसका प्रदर्शन भी करना चाहिए।