विचार: सार्थक संवाद की प्रतीक्षा में पश्चिम एशिया
अब्राहम समझौता राजनीतिक मतभेदों और क्षेत्रीय विवादों का तत्काल समाधान नहीं, बल्कि संवाद की शुरुआत है।
HighLights
अब्राहम समझौता पश्चिम एशिया में संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम।
क्षेत्रीय स्थिरता हेतु अधिक देशों की भागीदारी आवश्यक।
संवाद से दूरी ने बढ़ाई है क्षेत्रीय अस्थिरता।
रामिश सिद्दीकी। राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से अरब और मुस्लिम-बहुल देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील को केवल अमेरिकी कूटनीतिक दबाव मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। यह अपील पश्चिम एशिया के सामने प्रश्न रखती है कि क्या देश मान्यता और संवाद की प्रक्रिया से बाहर रहकर अपने हितों की रक्षा बेहतर ढंग से कर सकते हैं या इस प्रक्रिया में शामिल होकर अधिक स्थिर क्षेत्रीय व्यवस्था बनाने में भूमिका निभा सकते हैं? प्रश्न यह नहीं है कि कोई अमेरिकी कूटनीति से सहमत है या नहीं। यह भी नहीं है कि अब्राहम समझौता अपने मौजूदा स्वरूप में पूर्ण है या नहीं। कोई भी शांति समझौता शुरुआत में पूर्ण नहीं होता। असली प्रश्न यह है कि संवाद से दूरी बनाकर क्या पश्चिम एशिया को बेहतर परिणाम मिले हैं? दशकों से इस क्षेत्र ने युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, आम नागरिकों की पीड़ा और बढ़ते अविश्वास का अनुभव किया है। इसलिए एक अलग रास्ते पर विचार करना आवश्यक है।
अब्राहम समझौते की परिकल्पना इजरायल और अरब या मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंध सामान्य करने के एक ढांचे के रूप में की गई थी। इसकी शुरुआत 2020 में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन से हुई। बाद में मोरक्को और सूडान भी इससे जुड़ गए। इसका उद्देश्य कूटनीति, व्यापार, पर्यटन, सुरक्षा सहयोग, तकनीक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रास्ते खोलना था। इस समझौते का नाम अब्राहम समझौता रखा जाना भी अर्थपूर्ण है। अब्राहम, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लामी परंपराओं में एक महत्वपूर्ण पितृपुरुष माना गया है। यहूदी अपनी पवित्र वंश-परंपरा को अब्राहम से जोड़ते हैं, ईसाई उन्हें आस्था के पिता के रूप में देखते हैं और मुसलमान उन्हें एक ऐसे पैगंबर के रूप में मानते हैं, जिन्होंने मक्का में काबा का निर्माण किया और उनके वंश में अनेक पैगंबर आए। इसलिए यह नाम एक साझा आध्यात्मिक विरासत की ओर संकेत करता है।
अब्राहम समझौता राजनीतिक मतभेदों और क्षेत्रीय विवादों का तत्काल समाधान नहीं, बल्कि संवाद की शुरुआत है। यह याद दिलाता है कि यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों के बीच बातचीत कोई कृत्रिम पश्चिमी विचार नहीं, बल्कि एक बहुत पुराने सभ्यतागत संबंध में निहित है। जो देश इस समझौते से जुड़े, उन्होंने भावुकता में ऐसा नहीं किया। उन्होंने यह महसूस किया कि पुरानी नीति किसी के लिए लाभकारी नहीं रही। लंबे समय तक कई देशों ने माना कि इजरायल से औपचारिक संबंध न रखना फलस्तीनी मुद्दे को मजबूत करेगा। यह दृष्टिकोण भावनात्मक रूप से प्रभावी लगता था, विशेषकर अरब और मुस्लिम समाजों में, लेकिन इसके व्यावहारिक परिणाम सीमित रहे। इजरायल को मान्यता न देने से न तो फलस्तीनी राष्ट्र का निर्माण हुआ और न ही बार-बार होने वाले युद्ध रुके। यही कठिन तथ्य है। कोई रुख नैतिक रूप से प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह राजनीतिक रूप से भी प्रभावी हो।
निंदा कभी-कभी जरूरी हो सकती है, लेकिन केवल निंदा से प्रभाव या दबाव पैदा नहीं होता। जो देश परिणामों को प्रभावित करना चाहते हैं, उनके लिए दूरी की तुलना में सहभागिता अधिक उपयोगी हो सकती है। इसलिए अधिक व्यावहारिक रास्ता यह है कि अब्राहम समझौते से बाहर रहने के बजाय उसमें भागीदारी की जाए। इससे देश संवाद के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं और क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता की दिशा में ठोस पहल कर सकते हैं। यह उन देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो मानते हैं कि इजरायल से संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया एक विश्वसनीय फलस्तीनी समाधान से जुड़ी होनी चाहिए, लेकिन यह मांग संवाद से दूर रहने का कारण नहीं बननी चाहिए। यदि सभी अरब और मुस्लिम-बहुल देश इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करते हैं तो वे भविष्य की व्यापक क्षेत्रीय व्यवस्था को अधिक प्रभावी ढंग से आकार दे सकते हैं।
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर दिखाया है कि पश्चिम एशिया की अस्थिरता की कीमत केवल युद्ध में शामिल देश ही नहीं चुकाते। उसका असर पूरे क्षेत्र और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।। ईरान, इजरायल, खाड़ी देश और व्यापक विश्व इस आशंका के साथ जी रहे हैं कि कोई भी नया टकराव हालात को और गंभीर बना सकता है। इसलिए मूल बात यह नहीं है कि हर विवाद का समाधान तुरंत मिल जाएगा। मूल बात यह है कि संवाद के बिना हर संकट और भी खतरनाक हो जाता है। यहीं अब्राहम समझौता उपयोगी साबित हो सकता है। यह किसी अंतिम समाधान का दावा नहीं करता, लेकिन बातचीत का ऐसा ढांचा देता है जिसमें देश असहमति के बावजूद संपर्क बनाए रख सकते हैं। वे व्यापार कर सकते हैं, सुरक्षा चिंताओं पर बात कर सकते हैं और संबंधों को पूर्ण टकराव में बदलने से रोक सकते हैं। जिस क्षेत्र में लंबे समय तक चुप्पी और दूरी ने अविश्वास को बढ़ाया है, वहां संवाद का स्थायी माध्यम अपने-आप में महत्वपूर्ण है। किसी समझौते की असली परीक्षा यह नहीं होती कि वह पहले दिन कितना पूर्ण है, बल्कि यह होती है कि क्या वह आगे चलकर बेहतर व्यवस्था बनाने का रास्ता खोलता है। अब्राहम समझौते को भी इसी कसौटी पर देखना चाहिए।
(लेखक पश्चिम एशिया एवं इस्लामिक मामलों के जानकार हैं)












