विचार: आतंक के मामलों में अपवाद हो जमानत
सुप्रीम कोर्ट के 'जमानत नियम है, जेल अपवाद' वाले बयान पर पूर्व डीजीपी ने तर्क दिया है कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में यह सिद्धांत खतरनाक हो सकता है।
HighLights
आतंकवाद मामलों में जमानत नियम नहीं, अपवाद हो।
राष्ट्रीय सुरक्षा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।
आतंकी नेटवर्क को कमजोर करना देश के लिए आवश्यक।
अशोक कुमार। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “जमानत नियम है, जेल अपवाद” और यहां तक कि यूएपीए यानी गैर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम में भी। इसके बाद इस पर बहस शुरू हो गई। इसमें संदेह नहीं कि व्यक्तिगत आज़ादी संविधान की बहुत बड़ी ताकत है, पर आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में इस सिद्धांत को सीधे-सीधे लागू करना खतरनाक हो सकता है।
पुलिस, खुफिया तंत्र, आतंक-रोधी अभियानों और आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि इस मुद्दे को सिर्फ “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यहां प्रश्न देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का है।
आतंकी हमला साधारण आपराधिक घटना नहीं होता। आतंकी स्लीपर सेल, ओवरग्राउंड वर्कर्स, सीमा-पार हैंडलर्स, गुप्त फंडिंग और गोपनीय संचार तंत्र के माध्यम से काम करते हैं। ऐसे नेटवर्क को पकड़ना और खत्म करना मुश्किल होता है। खुफिया एजेंसियों और पुलिस के अधिकारियों को कई बार तो वर्षों तक लगातार निगरानी करनी पड़ती है, तब जाकर किसी आतंकी माड्यूल का पर्दाफाश हो पाता है।
आम लोग यह नहीं समझ सकते कि एक आतंकी तक पहुंचने में कितनी मेहनत लगती है। अधिकारी दिन-रात काम कर जान जोखिम में डालते हैं। बड़ी मुश्किल से पकड़े गए आतंकियों को आसानी से जमानत मिलना सुरक्षा एजेंसियों के मनोबल और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों को कमजोर करता है। जमानत पर बाहर आने के बाद आतंक के आरोपित फिर से अपने नेटवर्क को सक्रिय कर सकते हैं, सबूत मिटा सकते हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या फरार हो सकते हैं।
आतंक से जुड़े मामलों में स्लीपर सेल दोबारा सक्रिय होने का खतरा हमेशा बना रहता है। आम अपराधियों से हटकर आतंकी कट्टर विचारधारा से प्रेरित होते हैं और संगठित नेटवर्क के इशारों पर काम करते हैं, जिनकी पहुंच सीमाओं के पार तक होती है।
अगर जमानत पर छूटा एक भी आतंकी दोबारा हमला करने में सफल हो गया तो उसका परिणाम भयावह हो सकता है। निर्दोष लोगों के साथ सुरक्षा बल भी निशाना बन सकते हैं। देश की संपत्ति और सामाजिक सौहार्द की भी क्षति हो सकती है। ऐसे मामलों में राज्य सिर्फ आरोपित के अधिकारों की बात करके आम नागरिकों की सुरक्षा की अनदेखी नहीं कर सकता।
मानवाधिकार सिर्फ आतंक के आरोपितों के नहीं, निर्दोष नागरिकों के होते हैं। आजकल कुछ लोग यूएपीए मामलों को सिर्फ “लंबी जेल” के दृष्टिकोण से देखने लगे हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों को उतनी गंभीरता से नहीं देखते। निःसंदेह मुकदमों में देरी चिंता का विषय है और न्यायिक सुधार जरूरी हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि आतंक से जुड़े मामलों में जमानत को नियम बना दिया जाए।
हाल में सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के मामले में एक आरोपित को जमानत देते हुए कहा कि मुकदमे में ज्यादा देरी जमानत का आधार हो सकती है और फिर दोहराया- “जमानत नियम है और जेल अपवाद।” कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का भी जिक्र किया। लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार बेहद जरूरी हैं, पर राष्ट्रीय सुरक्षा भी उतनी ही बड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
आतंक के मामलों में जमानत नियम नहीं, बल्कि अपवाद होनी चाहिए। हां, जहां सबूत कमजोर हों, मामला दुर्भावना से दर्ज किया गया हो या कोई असाधारण मानवीय परिस्थिति हो, वहां अदालतों को राहत देने का अधिकार जरूर होना चाहिए, लेकिन अगर यूएपीए मामलों में जमानत को सामान्य सिद्धांत बना दिया गया, तो इससे गलत संदेश जाएगा और आतंक के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ सकती है। इससे भारत की वही पुरानी छवि बन सकती है कि वह आतंक के प्रति “साफ्ट स्टेट” है, जबकि पिछले दशक में देश ने इस छवि से बाहर निकलने की गंभीर कोशिश की है।
आतंकवाद से जुड़ी जांच बहुत जटिल होती है। विदेशी एजेंसियों से तालमेल, फोरेंसिक जांच, एन्क्रिप्टेड मैसेज डिकोड करना और पैसों के लेन-देन को ट्रैक करना अत्यधिक कठिन होता है। इसमें समय लगता है। हर देरी को एजेंसियों की असफलता नहीं कहा जा सकता। कई बार मामलों की प्रकृति ही ऐसी होती है कि जांच लंबी चलती है। मैंने कई ऐसे अपराधियों को देखा है जो जमानत मिलने के बाद फिर से अपराध में शामिल हो गए। हत्या और दुष्कर्म जैसे मामलों में कई आरोपित जमानत पर बाहर आकर गवाहों को धमकाने या खत्म करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों को तो सामान्य आपराधिक मामलों की तरह नहीं ही देखा जा सकता।
यूएपीए कानून इसलिए बनाया गया है, क्योंकि आतंकवाद देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए सीधा खतरा है। अगर ऐसे कानूनों को उदार जमानत सिद्धांतों के जरिए कमजोर किया गया, तो सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल टूटेगा। भारत आज भी कई गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। सीमा-पार आतंकवाद, कट्टरपंथ, नार्को-टेररिज्म, साइबर भर्ती और स्लीपर सेल की सक्रियता आज भी बड़ी चिंताएं हैं। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ लगातार भारत के खिलाफ छद्म युद्ध चला रही है।
ऐसे में देश ऐसी कानूनी व्याख्याओं का खतरा नहीं उठा सकता, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर दें। कोई यह नहीं कह सकता कि निर्दोष लोग अनिश्चितकाल तक जेल में रहें। जांच और सुनवाई त्वरित होनी चाहिए। विशेष अदालतों को ज्यादा प्रभावी बनाया जाए। अदालतों में खाली पद भरे जाएं और अभियोजन व्यवस्था मजबूत हो। जब तक ये सुधार पूरी तरह लागू नहीं हो जाते, तब तक राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में जमानत को नियम बनाना खतरनाक होगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा को सैद्धांतिक चर्चा के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। एक गलत फैसला निर्दोषों की जानें ले सकता है। लोकतंत्र सिर्फ अधिकारों की वजह से नहीं चलता, बल्कि मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की वजह से भी कायम रहता है। अगर राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर पड़ गई, तो लोकतंत्र की नींव भी खतरे में पड़ सकती है। भारत को लोकतांत्रिक भी रहना है और सुरक्षित भी, लेकिन जब आतंक के किसी आरोपी के अधिकारों और आम नागरिकों की सुरक्षा के बीच चुनाव करना पड़े, तो हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।
(लेखक उत्तराखंड के डीजीपी रहे हैं)












