विचार: शिखर पर महिलाओं के होने का मतलब
यह राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक की वही धरती है, जहां उन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ, विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा के समर्थन में आंदोलन चलाया था।
HighLights
महिला नेता भी अपनाती हैं भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार।
बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में महिलाओं की दुर्दशा उजागर।
क्या सत्ता में स्त्रियां बदल पाती हैं पुरानी व्यवस्था?
क्षमा शर्मा। बंगाल में पराजय के बाद ममता बनर्जी मुश्किल में हैं। उनके सहयोगी ही उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। ममता यह दिखा रही हैं कि किस तरह हर वक्त संविधान बचाने और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेता चुनाव परिणाम अपने अनुकूल न आने के बाद किसी भी तरह के झूठ से परहेज नहीं करते। पता नहीं क्यों नेता यह मानकर बैठ जाते हैं कि कोई राज्य उनकी निजी जागीर है और वे हमेशा ही वहां बने रहेंगे? ममता की हार पर दो तरह के विमर्श चालू हैं। एक पक्ष कह रहा है कि उनकी हार उनकी पार्टी की गुंडागर्दी, तानाशाहीपूर्ण नीतियों, अवैध वसूली, भ्रष्टाचार तथा हिंदुओं की नाराजगी के कारण हुई। दूसरा पक्ष उनकी हार पर कह रहा है-देश से लोकतंत्र खत्म हो गया, फासिज्म आ गया आदि।
फासिज्म का राग अलापने वाले यह नहीं बताते कि आपातकाल के दिनों में या हिटलर, मुसोलिनी, माओ, स्टालिन, शी चिनफिंग, किम इल सुंग से किम इल जोंग आदि के शासनकाल में क्या वे इतना बोल सकते थे? डिजिटल मीडिया पर जो चाहे, लिख सकते थे। आपातकाल को इस लेखिका ने देखा है। जहां किसी को भी बिना किसी जांच के उठा लिया जाता था। फिर उसका पता न चलता था। आपातकाल को भी एक महिला नेता इंदिरा गांधी ने ही लगाया था। तब लोकतंत्र के बहुत से हिमायतियों को सांप सूंघ गया था। दूरदर्शन, रेडियो, अखबारों में बाकायदा सरकार के लोग बैठे रहते, जो हर खबर को देखते। तभी वह छप सकती थी या प्रसारित हो सकती थी।
मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं, उन्होंने राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति को वाकई बहुत सुधारा, लेकिन उन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। हालांकि वे साबित नहीं हुए। कुछ साल पहले ममता बनर्जी की तरह ही उन्होंने भी अपने भतीजे को अपना उत्तराधिकारी बना दिया। तमिलनाडु में जब जयललिता आईं तो उनकी परम मित्र शशिकला का बोलबाला हो गया था। जयललिता पर भी भ्रष्टाचार के खूब आरोप लगे। वह पहली मुख्यमंत्री थीं, जिन्हें इस पद पर रहते हुए जेल जाना पड़ा। शीला दीक्षित जब दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं, तो निश्चित रूप से उन्होंने दिल्ली के इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में बहुत योगदान दिया, लेकिन उन्हें भी भ्रष्टाचार के आरोपों से दो-चार होना पड़ा। उन्होंने भी अपने बेटे को आगे बढ़ाने की कोशिश की। पत्नी राबड़ी देवी को लालू प्रसाद यादव ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था। उन पर भी जमीन के बदले नौकरी और आइआरसीटीसी घोटाले में लिप्त होने के आरोप लगे हैं। सुनवाई हो रही है। उनके उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव और मीसा भारती बन गए हैं।
आखिर ऐसा क्यों है कि शिखर पर पहुंचते ही कई नेत्रियों को वही रास्ता सुविधाजनक लगता है, जिसे चुनौती देकर वे सत्ता में आती हैं। अपने रिश्तेदारों के अलावा, उत्तराधिकारी के लिए इन्हें कोई और योग्य क्यों नहीं लगता? उन विचारों का कितना महत्व है, जो कहते हैं कि स्त्रियां ही दुनिया को नष्ट होने से बचा सकती हैं। वे भी इसी पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सा हैं, इसलिए जाने-अनजाने वे भी वही तौर-तरीके अपनाती हैं। तब फिर शिखर पर रहकर वे क्या बदलती हैं? कहावत है-एब्सोल्यूट पावर करप्टस एब्सोल्यूटली या हिंदी की कहावत है-काजर की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय..। ये सच मालूम देती हैं। अक्सर कहा जाता है कि स्त्रियां यदि सत्ता के शिखर पर पहुंच जाएं, तो लोगों की तकदीर बदल सकती है, क्योंकि वे भ्रष्ट नहीं होतीं। वे पानी, सफाई, पोषण, स्कूल, सड़कों आदि को सुधारने की पहल करती हैं। बहुत सी ग्राम प्रधान स्त्रियों के बारे में छपता भी रहता है कि उन्होंने किस तरह अपने प्रयासों से गांवों की सूरत बदल दी।
प्रायः हमारी तुलना दूसरे देशों से की जाती है कि वहां देखो, कितना अच्छा है, लेकिन अमेरिका में अपराधी न स्त्री होती है, न पुरुष, वह सिर्फ अपराधी होता है। वहां ऐसा कोई नियम नहीं कि स्त्री अपराधी को पुरुष पुलिस वाले नहीं पकड़ सकते। न ही भारत की तरह यह नियम है कि सूर्यास्त के बाद किसी स्त्री अपराधी को आमतौर पर नहीं पकड़ा जा सकता। वहां अपराध के मामले में न स्त्री होना काम आता है, न रंग, भाषा, प्रदेश, प्रांत का सवाल उठता है। अपने यहां तो जैसे ही कोई अपराध करता है, उसकी जाति , लिंग, धर्म, भाषा देखी जाने लगती है।
जब से बंगाल के चुनाव हुए हैं, न जाने कितने भयावह वीडियो और रील्स देखी हैं। वहां की स्त्रियां बताती हैं कि मामूली बातों पर उनके पति, बेटों को घर से खींचकर उनके सामने ही मार दिया गया। लड़कियों का दुष्कर्म, अपहरण, घरों, जमीन पर कब्जा, मवेशियों को खोल ले जाना आम बात थी। पुलिस ने भी उनकी कोई मदद नहीं की। कुछ स्त्रियों ने कहा कि चुनाव के दौरान उनके घर सफेद साड़ियां भिजवाई जातीं यानी कि यदि तुमने हमें वोट नहीं दिया, तो इन्हें पहनना। मतलब कि विधवा हो जाओगी। क्या यह देखकर हैरत नहीं होती कि आज भी बंगाल में विधवा होना कितना दुखद है। वृंदावन की विधवाओं में अधिकांश बंगाल से ही आती हैं। उनके घर वाले ही उन्हें वहां छोड़ जाते हैं। यह राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक की वही धरती है, जहां उन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ, विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा के समर्थन में आंदोलन चलाया था।
(लेखिका साहित्यकार हैं)












