विचार: समूचे तंत्र की विफलता
कम से कम इस मामले में तो कहना ही होगा कि-मीडिया ट्रायल की जय हो। स्पष्ट है कि व्यवस्था के तीनों स्तंभ जब निराश करने लगें तो चौथा स्तंभ उम्मीद की किरण बनकर उभरता है।
HighLights
पुलिस, प्रशासन, न्यायपालिका की विफलता उजागर हुई।
मीडिया के हस्तक्षेप से मामला सही दिशा में बढ़ा।
दहेज कानूनों की अनदेखी पर सवाल उठे।
ए. सूर्यप्रकाश। त्विषा शर्मा की मौत के मामले को मध्य प्रदेश सरकार, भोपाल पुलिस और न्यायिक अधिकारियों ने जिस प्रकार संभाला, वह चुनी हुई सरकार, पुलिस-प्रशासन और अधीनस्थ न्यायपालिका जैसे राज्यव्यवस्था के सभी अंगों की विफलता का ही संकेत है। अगर मीडिया ने दखल न दिया होता तो इन सभी अंगों के बीच की साठगांठ समूचे तंत्र में नागरिकों के भरोसे को पूरी तरह नष्ट कर चुकी होती। स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी तंत्र के ऐसे पतन का साक्षी बनना बेहद शर्मनाक है।
माडल-अभिनेत्री त्विषा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं। जैसे 12 मई को मौत होने के बाद भी 15 मई तक पुलिस ने प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की। त्विषा की सास गिरिबाला सिंह सेवानिवृत्त जज तो पति समर्थ सिंह अधिवक्ता हैं। जहां एफआइआर में देरी हुई, वहीं गिरिबाला सिंह को न केवल सहजता से अग्रिम जमानत मिल गई, बल्कि घटना स्थल पर बेरोकटोक जाने की छूट भी मिली।
यह अच्छा है कि हाई कोर्ट से उनकी यह जमानत खारिज हो गई और सीबीआइ ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है, पर उससे पहले उनके पास इतनी गुंजाइश रही कि वे तमाम साक्ष्यों को अपनी सुविधा से देख सकें। उन्होंने पुलिस और न्यायिक तंत्र से जुड़े विभिन्न पदाधिकारियों को फोन काल भी किए, जिनमें लोकायुक्त, डीजी रैंक के पुलिस अधिकारी और एक जिला जज भी शामिल रहे। शायद ही कोई ऐसा दूसरा मामला ध्यान में आए, जहां न्यायाधीश ने मामले से जुड़े किसी संभावित आरोपित को ही साक्ष्यों से छेड़छाड़ की ऐसी खुली छूट प्रदान की हो। समर्थ सिंह भी करीब दस दिनों तक भूमिगत रहे। जब मीडिया में इस मुद्दे ने तूल पकड़ा तो मुख्यमंत्री त्विषा के परिवार से मिलने पर सहमत हुए और मामले की जांच सीबीआइ को सौंप दी गई। हालांकि यह सब 25 मई तक संभव हो सका। राज्य दूसरे पोस्टमार्टम के लिए भी तैयार तो हुआ, लेकिन मौत के 12 दिन बाद 24 मई को।
इस पूरे मामले में पुलिस की ढिलाई और सास को मिली अग्रिम जमानत ऐसे किसी भी व्यक्ति के अंतरात्मा को झकझोर सकती है, जो ससुराल में महिलाओं के प्रति क्रूरता और दहेज निषेध कानून की बारीकियों से परिचित हो। भारतीय साक्ष्य अधिनियम यानी बीएसए की धारा 117 (जो पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113 ए) के तहत स्पष्ट प्रविधान है कि, 'विवाह के सात वर्ष के अंदर किसी महिला की आत्महत्या के संबंध में जब यह सवाल उठे कि क्या उसकी आत्महत्या उसके पति या उसके किसी रिश्तेदार द्वारा उकसावे का परिणाम रही या उसके प्रति क्रूरता बरती गई तो न्यायालय सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह मानकर चल सकता है कि आत्महत्या उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार द्वारा उकसावे का नतीजा रही।' भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 तो और भी स्पष्ट एवं प्रभावी है। इसके अनुसार, 'जब सवाल यह हो कि क्या किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज के चलते हत्या की है और अपनी मृत्यु से ठीक पहले ऐसी महिला को उस व्यक्ति द्वारा दहेज की किसी भी मांग के लिए या उसके संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया था, तो न्यायालय यह मानने के लिए बाध्य होगा कि वही व्यक्ति दहेज के कारण हुई हत्या का जिम्मेदार है।'
देश में दहेज हत्या के बढ़ते मामलों के कारण ही संसद ने कानून में संशोधन किया और 1980 के दशक में इसे और अधिक सख्त बनाया। नव-प्रवर्तित भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के अंतर्गत भी पति या पति के रिश्तेदार के लिए तीन साल तक की कारावास का प्रविधान है, जो किसी महिला को अपनी क्रूरता का शिकार बनाता है। इसी क्रम में धारा 86 'क्रूरता' को परिभाषित करती है। इसके अनुसार 'क्रूरता' से तात्पर्य जानबूझकर किए गए ऐसे किसी भी आचरण से है, जिसके चलते (क) महिला को आत्महत्या करने के लिए उकसाने की आशंका हो या महिला के जीवन, अंग या स्वास्थ्य (चाहे मानसिक हो या शारीरिक) को गंभीर क्षति या खतरा पहुंचने का जोखिम हो, (ख) इसमें दहेज के लिए महिला का उत्पीड़न किया जाना शामिल हो। यदि दहेज उत्पीड़न के कारण विवाह के सात वर्ष के भीतर महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है, तो इस तरह के मामलों में न्यूनतम सात वर्ष की जेल हो सकती है, जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है।
इस मामले में सास गिरिबाला सिंह ने सार्वजनिक बयानबाजी से ही स्वयं को संदिग्ध रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने त्विषा पर मादक पदार्थों का सेवन करने, मानसिक बीमारी का इलाज चलने और परिवार के साथ तालमेल न बिठा पाने जैसे आरोप मढ़े। ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या पुलिस संसद द्वारा पारित कानून से जुड़े पहलुओं से परिचित नहीं थी? क्या गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत देने वाले इन प्रविधानों से वाकिफ नहीं थे? इस संबंध में उच्चतम न्यायालय का यह अवलोकन भी निराशाजनक है, जिसमें उसने मीडिया से कहा कि वह कोई नैरेटिव बनाने का प्रयास न करे। एक तरह से उसने मीडिया ट्रायल से परहेज करने को तो कहा, लेकिन पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह या भोपाल पुलिस या दस दिनों तक गायब रहे त्विषा के अधिवक्ता पति समर्थ सिंह को लेकर कुछ नहीं कहा। अच्छी बात है कि सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जरूर मीडिया की पीठ थपथपाई कि उसके हस्तक्षेप से यह मामला सही दिशा में बढ़ा।
समग्रता में देखें तो यह मामला समूचे तंत्र की विफलता का ऐसा उदाहरण है और उन लोगों को मुंह बंद करने के लिए पर्याप्त है, जो मीडिया ट्रायल को लेकर बिदकते रहते हैं। अगर मीडिया ने इस मुद्दे को न उठाया होता, तो संभव है कि इस मामले का किसी परिणति से पहले ही पटाक्षेप हो गया होता? अगर मीडिया के माध्यम से इसका ब्योरा सामने नहीं आता तो क्या उच्चतम न्यायालय को इस शर्मनाक लीपापोती की भनक लग पाती? कम से कम इस मामले में तो कहना ही होगा कि-मीडिया ट्रायल की जय हो। स्पष्ट है कि व्यवस्था के तीनों स्तंभ जब निराश करने लगें तो चौथा स्तंभ उम्मीद की किरण बनकर उभरता है।
(लेखक संवैधानिक मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)












