अमेरिका और ईरान में कोई समझौता होने की संभावनाओं के बीच जिस तरह दोनों किसी सहमति पर भी पहुंचते नहीं दिख रहे हैं, उससे किसी के लिए भी कहना कठिन है कि बातचीत सही दिशा में चल रही है और पश्चिम एशिया संकट शीघ्र समाप्त होने वाला है। पिछले लगभग एक माह से कभी अमेरिका वार्ता के सही दिशा में जारी रहने की घोषणाएं करता है तो कभी ईरान अपने रुख में नरमी दिखाता है, लेकिन परिणाम शून्य है।

बीच-बीच में अमेरिका और ईरान, दोनों एक-दूसरे को धमकी भी देते रहते हैं। साफ है कि दोनों का एक-दूसरे के प्रति गहरा अविश्वास है और कथित तौर पर मध्यस्थता कर रहा पाकिस्तान संदेशों का आदान-प्रदान करने के अतिरिक्त और कुछ करने की स्थिति में नहीं।

इसका कोई खास मतलब नहीं कि दोनों देशों में युद्धविराम कायम है, क्योंकि वह होर्मुज समुद्री मार्ग बाधित ही है, जिससे विश्व के पांचवें हिस्से की ऊर्जा आपूर्ति होती है। यह आपूर्ति करीब-करीब ठप होने के कारण ऊर्जा संकट गहरा गया है और उसका बुरा असर अमेरिका समेत सभी देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

अब ट्रंप के उन दावों पर भरोसा करना कठिन हो रहा है कि ईरान समझौते के लिए तैयार है। वैसे समझौता न हो पाने के लिए केवल अमेरिका को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ईरान भी इस जिद पर अड़ा है कि वह होर्मुज पर अपना आधिपत्य नहीं छोड़ेगा और अपने संवर्धित यूरेनियम को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा।

इसका अर्थ है कि वह परमाणु हथियार बनाने के इरादे का परित्याग नहीं करना चाहता। इसे कोई भी नहीं चाहेगा कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल करे। उसे न केवल परमाणु हथियार हासिल करने के इरादे को छोड़ना होगा, बल्कि होर्मुज पर नियंत्रण रखने की जिद भी छोड़नी होगी। होर्मुज एक स्वतंत्र समुद्री मार्ग है और ईरान को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह उसे अपनी निजी जागीर समझ ले अथवा वहां से गुजरने वाले जहाजों से टैक्स वसूले।

यह अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की अवहेलना करने वाली जिद है। ईरान यह दिखा रहा है कि पश्चिम एशिया संकट जारी रहने से उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, पर सच यह है कि वह आर्थिक तबाही के मुहाने पर है। ऐसे में उसे अपनी जिद छोड़नी चाहिए। बदले में अमेरिका को भी उसे यह भरोसा दिलाना होगा कि उस पर फिर हमला नहीं होगा। दोनों देशों को यह समझना होगा कि उनके बीच का गतिरोध विश्व अर्थव्यवस्था के लिए नासूर बन गया है। बहुत हो चुका।

अब यह गतिरोध टूटना चाहिए, क्योंकि पश्चिम एशिया संकट विश्व के करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रहा है। लोगों की रोजी-रोटी पर ही संकट नहीं है, वे गरीबी के दुष्चक्र से भी घिरते जा रहे हैं।