संपादकीय: बंगाल में हिंसा
बंगाल के बारे में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि यहां राजनीतिक एवं चुनावी हिंसा का एक लंबा दौर रहा है। एक तरह से राजनीतिक एवं चुनावी हिंसा बंगाल की राजनीतिक संस्कृति बन गई है।
HighLights
पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का फिर उभार।
टीएमसी नेताओं अभिषेक, कल्याण बनर्जी पर हुए हमले।
बंगाल में कानून-व्यवस्था सुधारना अत्यंत आवश्यक।
पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के तत्काल बाद जो हिंसा हुई थी और जिसमें भाजपा एवं तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे पर हमले किए थे, वह करीब-करीब थम गई थी, लेकिन पिछले दिनों जिस तरह टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ और गत दिवस इसी पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी भी भीड़ के आक्रोश एवं पथराव का शिकार हुए, वह कोई शुभ संकेत नहीं। इस सिलसिले को रोका ही जाना चाहिए। यह स्वाभाविक है कि अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के साथ गुस्साई भीड़ ने जो धक्कामुक्की एवं मारपीट की, उसे तृणमूल कांग्रेस एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन हालिया चुनाव के बाद जो हिंसा देखने को मिली, उसकी तुलना उस भीषण अराजकता से नहीं की जा सकती, जो पिछले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद देखने को मिली थी।
उस समय तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं-नेताओं और उनके समर्थकों ने विरोधी दलों और विशेष रूप से भाजपा के उन लोगों पर कहर बरपाया था, जिनके बारे में उन्हें शक था कि उन्होंने ममता की पार्टी को वोट नहीं दिया। वह अराजकता इतनी भयावह एवं आतंकित करने वाली थी कि कई लोगों को अपनी जान बचाने के लिए असम में जाकर शरण लेनी पड़ी थी। यदि तब ममता बनर्जी ने उस हिंसा को गंभीरता से लिया होता और उस पर रोक लगाने की कोशिश की होती तो शायद आज जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह नहीं दिखता। यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि ममता बनर्जी ने अपने शासन में कानून एवं व्यवस्था को कलंकित करने वाली उस हिंसा से पल्ला झाड़ लिया था। उन्होने ऐसा ही उसके बाद की राजनीतिक हिंसा के मामले में भी किया।
बंगाल के बारे में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि यहां राजनीतिक एवं चुनावी हिंसा का एक लंबा दौर रहा है। एक तरह से राजनीतिक एवं चुनावी हिंसा बंगाल की राजनीतिक संस्कृति बन गई है। भाजपा को प्राथमिकता के आधार पर हिंसा की इस संस्कृति को खत्म करना होगा। उसे ऐसा इसके बावजूद करना होगा कि इस बार हिंसा का वैसा भयावह रूप देखने को नहीं मिला है। भाजपा सरकार को न केवल पुलिस-प्रशासन को आवश्यक निर्देश देने होंगे, बल्कि अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संदेश देना होगा कि किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। बंगाल में हर स्तर पर वास्तविक सुधार के लिए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि कानून एवं व्यवस्था को ठीक करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इससे ही राज्य सही तरह से पटरी पर आएगा। कोई भी राज्य सही तरह से तभी आगे बढ़ता है, जब वहां कानून एवं व्यवस्था नियंत्रित होती है।












