आखिरकार कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दरमैया ने त्यागपत्र दे दिया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के उनकी जगह आसीन होने का रास्ता साफ हो गया। कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा लंबे समय से हो रही थी और इसे लेकर खींचतान भी जारी थी, लेकिन कुछ तय नहीं हो पा रहा था। शिवकुमार का दावा था कि 2023 में सरकार गठन के समय सिद्दरमैया और उनके बीच ढाई-ढाई वर्ष तक सत्ता संभालने की सहमति बनी थी, पर कांग्रेस नेतृत्व ने इसकी पुष्टि नहीं की।

अब तीन वर्ष बाद नेतृत्व परिवर्तन होना यह बताता है कि वास्तव में दोनों नेताओं में बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनने का समझौता हुआ था और उससे कांग्रेस आलाकमान भी अवगत था। यदि ऐसा था तो फिर छह माह की देरी क्यों हुई? यह प्रश्न कांग्रेस नेतृत्व और विशेष रूप से राहुल गांधी की विफलता को दर्शाता है।

इसलिए और भी, क्योंकि कहा जा रहा है कि नेतृत्व परिवर्तन तब सुनिश्चित हो पाया, जब प्रियंका गांधी ने हस्तक्षेप किया। यदि यह सच है तो यह पुराना सवाल फिर से उठेगा कि आखिर राहुल गांधी समय पर फैसला क्यों नहीं ले पाते? ध्यान रहे कि कांग्रेस अध्यक्ष भले ही मल्लिकार्जुन खरगे हों, लेकिन पार्टी के बड़े फैसले राहुल गांधी ही लेते हैं।

त्यागपत्र देने को तैयार हुए सिद्दरमैया ने यह तो माना कि आलाकमान ने जैसा कहा, वैसा किया, पर वे राज्यसभा आने को तैयार नहीं। एक तरह से उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को यह संदेश दिया कि वे संतुष्ट नहीं हैं और अपने हिसाब से राज्य की ही राजनीति करेंगे। हालांकि उनके त्यागपत्र देने पर शिवकुमार ने पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया, लेकिन यह कहना बहुत कठिन है कि दोनों के रिश्ते सामान्य बने रहेंगे और कर्नाटक कांग्रेस में गुटबाजी को बढ़ावा नहीं मिलेगा।

इसकी अनदेखी न की जाए कि इसके पहले बारी-बारी से नेतृत्व करने को लेकर राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इसी तरह की खींचतान हुई थी। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच ढाई-ढाई साल तक सत्ता संभालने को लेकर तनातनी जारी रही तो छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव के बीच। कांग्रेस नेतृत्व न तो इन दोनों राज्यों में अपने नेताओं के झगड़े को सुलझा पाया और न ही यह साफ कर पाया कि उनमें ढाई-ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहने का समझौता हुआ था या नहीं?

पंजाब में उसने नवजोत सिंह सिद्धू को संतुष्ट करने के लिए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को पद छोड़ने के लिए बाध्य किया तो इसके नतीजे में वहां ऐसी गुटबाजी पनपी कि पार्टी को बुरी पराजय का सामना करना पड़ा। कांग्रेस राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी नहीं बचा पाई। कर्नाटक में क्या होगा, यह दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव ही बताएंगे।