विचार: पटरी पर लौटता तीन भाषा फॉर्मूला
आश्चर्य है कि दो-तीन विदेशी भाषाएं पढ़ना उन्हें अपने बच्चों पर अतिरिक्त बोझ नहीं लगता, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाएं सीखने के नाम पर वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। यह अनुचित है। सरकार को किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहिए।
HighLights
नौवीं कक्षा में दो भारतीय भाषाएं पढ़ना अनिवार्य।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का महत्वपूर्ण कार्यान्वयन कदम।
भाषाई एकता बढ़ाना, विदेशी भाषाओं पर जोर कम करना।
प्रेमपाल शर्मा। सीबीएसई और केंद्र सरकार के ताजा निर्णय की तारीफ की जानी चाहिए, जिसमें उन्होंने नौवीं कक्षा में दो भारतीय भाषाओं को पढ़ना अनिवार्य किया है। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के कार्यान्वयन का अगला कदम है। सीबीएसई के नए आदेश के अनुसार पहली जुलाई से देश में नौवीं कक्षा में तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी, जिनमें दो अनिवार्य रूप से भारतीय भाषाएं होंगी। अगर पहली भाषा अंग्रेजी है तो दूसरी भाषा हिंदी या अपनी मातृभाषा होगी और तीसरी भाषा के रूप में विद्यालय संविधान की आठवीं अनुसूची की कोई भी भाषा चुन सकते हैं। इसका उद्देश्य बहुभाषी समाज की तरफ बढ़ना है, जो इस देश की हकीकत भी है। 1960 के दशक में कोठारी आयोग द्वारा दिए गए तीन भाषा सूत्र का आत्मा भी यही था कि उत्तर भारत के बच्चे दक्षिण भारत की कोई भाषा सीखें और दक्षिण भारत के बच्चे अपनी मातृभाषा के अलावा उत्तर भारत की हिंदी सीखें, लेकिन कुछ राजनीतिक स्वार्थ की वजह से इसे हिंदी थोपने के रूप में दुष्प्रचार किया गया।
उत्तर भारत की शिक्षा नीति में भी यह कमी रही कि उसने दक्षिण की कोई भाषा सीखने के बजाय तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत से काम चला कर खानापूर्ति कर ली। उम्मीद है उत्तर भारत अब ऐसी गलती नहीं करेगा। दक्षिण भारत का इसीलिए आज तक यह विरोध जारी है कि जब उत्तर भारत उसकी कोई भाषा नहीं सिखाता तो दक्षिण के राज्य भी हिंदी क्यों सीखें? इसीलिए तीन भाषा फार्मूला अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया। अब सरकार की नई सुविचारित नीति के तहत यह सफल होता नजर आ रहा है।
वर्तमान में उत्तर भारत में विशेषकर अधिकांश पब्लिक स्कूलों में नौवीं कक्षा में तो एक भी भारतीय भाषा नहीं पढ़ाई जा रही। इनमें से कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जिनमें 12वीं में हिंदी का सेक्शन ही नहीं है, जबकि अंग्रेजी के अलावा बच्चों को पढ़ने के लिए जर्मन, फ्रेंच, जापानी, स्पेनिश आदि विदेशी भाषाओं के विकल्प हैं। सरकारी स्कूलों में गनीमत है कि हिंदी बची हुई है, लेकिन ज्यादातर विज्ञान के विद्यार्थी सरकारी स्कूलों में भी 11वीं में हिंदी नहीं पढ़ रहे या कहें उन्हें नहीं पढ़ाई जा रही। भाषा नीति के नए आदेश का सबसे ज्यादा विरोध यही महंगे निजी स्कूल और अभिभावक कर रहे हैं। वे शिकायत कर रहे हैं कि इसे इस सत्र में ही लागू करना था तो पहली अप्रैल से क्यों नहीं किया गया। उन्हें पता होना चाहिए कि अप्रैल में शैक्षिक सत्र जरूर आरंभ हो जाता है, लेकिन पूरे देश में शिक्षा पहली जुलाई से ही शुरू होती है, इसलिए देरी की इस बात में कोई दम नहीं है। उनका दूसरा आरोप है कि हमने फ्रेंच, जर्मन भाषाओं की किताबें खरीद ली हैं और बच्चे कई वर्षों से इन भाषाओं को पढ़ रहे हैं। अब और भारतीय भाषाएं पढ़नी पड़ेंगी तो उनके बच्चों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ जाएगा। यह उनकी दसवीं के रिजल्ट को प्रभावित करेगा। उनकी यह भी शिकायत बचकानी है। उनसे बस यही कहना है कि अंग्रेजी तो वे जन्म से सीख रहे हैं। जर्मन और फ्रेंच भी उनको कभी अतिरिक्त बोझ नहीं लगते, पर अपनी मातृभाषा या अन्य देसी भाषाएं उन्हें बोझ क्यों लगने लगता है।
क्या बच्चे अपनी मर्जी से जर्मन और दूसरी भारतीय भाषा सीखते हैं? नहीं। यह अभिभावकों और स्कूल का उन पर जबरदस्ती लदा हुआ बोझ है। क्या हमारा संविधान गलत है, जिसमें हिंदी और सभी क्षेत्रीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसमें प्रशासन और शिक्षा देने की बात कही गई है? तीसरी भाषा के लिए सरकार ने सही राह सुझाई है कि इसमें बोर्ड की परीक्षा नहीं होगी, पाठ्यक्रम बहुत हल्का होगा और उसका मूल्यांकन भी आंतरिक होगा। इसका उद्देश्य साफ है कि उत्तर भारत के लोग दक्षिण की भाषाओं को जानें और दक्षिण के उत्तर भारत की। इससे दक्षिण का हिंदी और उत्तर भारत की भाषाओं का विरोध भी निर्मूल हो जाएगा और भाषाई एकता तो बढ़ेगी ही। आज यूरोप, अमेरिका से लेकर चीन, जापान जैसे देश इसलिए विकसित हैं, क्योंकि उनकी शिक्षा और प्रशासन अपनी भाषा में होता है, अंग्रेजी और दूसरी विदेशी भाषा में नहीं।
तीसरी भाषा कौन-सी चुनी जाए। अच्छा तो यही रहेगा कि संस्कृत के नाम पर पुरानी गलती न हो। स्कूल या प्रशासन बच्चों की सहमति से भाषा का चुनाव करें। पंजाबी, मराठी देवनागरी परिवार की भाषा हैं। बच्चों को कुछ मेहनत जरूर करनी पड़ेगी, लेकिन क्या यही मेहनत दक्षिण के राज्यों को हिंदी सीखने के लिए नहीं करनी पड़ती? इसलिए बिना देरी के इस पर अमल होना चाहिए और जो लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी के अलावा दूसरी विदेशी भाषाएं भी सीखना चाहते हैं तो उनके लिए आसमान खुला है।
बिना परीक्षा में शामिल किए यदि संभव हो तो स्कूल सिखाएं या कोई और इंतजाम करें। सब कुछ स्कूल नहीं सिखाते। हमारे चारों तरफ ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जिन्होंने नौकरी, व्यवसाय के लिए अपनी जरूरत के हिसाब से विदेशी भाषाएं सीखी हैं। इसलिए अभिभावकों का सरकार पर आरोप लगाना, उसे कठघरे में खड़ा करना या सुप्रीम कोर्ट जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। आश्चर्य है कि दो-तीन विदेशी भाषाएं पढ़ना उन्हें अपने बच्चों पर अतिरिक्त बोझ नहीं लगता, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाएं सीखने के नाम पर वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। यह अनुचित है। सरकार को किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहिए।
(केंद्रीय संयुक्त सचिव रहे लेखक शिक्षाविद् हैं)












