संजय गुप्त। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के त्यागपत्र देने के साथ ही उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के राज्य की कमान संभालने का रास्ता साफ हो गया। इससे शिवकुमार की तो चाहत पूरी हो गई, लेकिन यह कहना कठिन है कि कर्नाटक कांग्रेस में सब कुछ सामान्य होने जा रहा है या फिर राज्य की विभिन्न समस्याओं के समाधान की राह आसान हो गई है। सिद्दरमैया ने त्यागपत्र देने की घोषणा करते हुए यह कहा कि कांग्रेस नेतृत्व ने जैसा कहा, मैंने वैसा किया, लेकिन उन्होंने राज्यसभा आकर कांग्रेस की केंद्रीय स्तर की राजनीति में सक्रिय होने का आग्रह ठुकराते हुए कहा कि वे राज्य की राजनीति में ही सक्रिय रहेंगे।

चूंकि सिद्दरमैया जमीनी स्तर की राजनीति करने वाले नेता हैं और उनका अपना जनाधार है, इसलिए वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे शिवकुमार के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। इसके नतीजे में वहां नए सिरे से गुटबाजी भी पनप सकती है, क्योंकि शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के मंत्रिमंडल से सिद्दरमैया के कुछ समर्थक बाहर हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह स्वाभाविक ही है कि शिवकुमार अपने हिसाब से शासन से चलाएंगे और इसके लिए वे प्रशासन में भी पूर्व मुख्यमंत्री के समर्थकों को किनारे कर सकते हैं।

इसके आसार कम ही हैं कि सिद्दरमैया अपने उत्तराधिकारी शिवकुमार के लिए खुला मैदान छोड़ेंगे, क्योंकि जमीनी राजनीति करने वाला कोई नेता अपना राजनीतिक वर्चस्व इतनी आसानी से नहीं छोड़ता। अपने देश में तो ऐसा और भी कम होता है। अपने यहां उम्रदराज नेता तब तक राजनीति से रिटायर ही नहीं होते, जब तक उन्हें बिल्कुल किनारे न कर दिया जाए। कांग्रेस सिद्दरमैया की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती।

शिवकुमार 2023 में तभी से मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी थे, जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीता था, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने वरिष्ठता के आधार पर सिद्दरमैया का चयन किया। शिवकुमार का दावा था कि उनके और सिद्दरमैया के बीच इसे लेकर सहमति कायम हुई थी कि दोनों ढाई-ढाई वर्ष तक सत्ता संभालेंगे। अपने इस दावे के अनुरूप वे पिछले काफी समय से मुख्यमंत्री पद हासिल करने का प्रयत्न कर रहे थे, लेकिन सिद्दरमैया पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। आखिरकार कांग्रेस आलाकमान के दबाव में वे तीन वर्ष बाद मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार हुए। स्पष्ट है कि उन्होंने मजबूरी में पद छोड़ा।

कर्नाटक की तरह एक समय राजस्थान में भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच भी इसे लेकर खींचतना हुई थी कि दोनों के बाच ढाई-ढाई साल तक मुख्यमंत्री बनने की सहमति बनी थी। सचिन पायलट ने बहुत कोशिश की कि इस कथित सहमति के आधार पर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिले, लेकिन अशोक गहलोत टस से मस नहीं हुए। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान के निर्देशों को भी ठुकरा दिया। इस कारण सचिन पायलट एवं उनके बीच खींचतान जारी रही और कांग्रेस आलाकमान अंत समय तक कोई फैसला नहीं कर सका। ऐसा ही छत्तीसगढ़ में हुआ।

यहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता टीएस सिंह देव के बीच इसे लेकर झगड़ा होता रहा कि ढाई-ढाई साल तक सत्ता संभालने की बात हुई थी। यहां भी कांग्रेस नेतृत्व कोई फैसला नहीं कर सका। नतीजा यह हुआ कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की पराजय का एक कारण मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए खींचतान भी बनी।

कांग्रेस नेतृत्व ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को विधानसभा चुनाव के करीब एक वर्ष पहले मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए बाध्य किया, क्योंकि नवजोत सिंह सिद्धू उनके खिलाफ खड़े हो गए थे। हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके बजाय चरणजीत सिंह चन्नी को मिली। इसके चलते गुटबाजी को बढ़ावा मिला और विधानसभा चुनावों में इसका लाभ आम आदमी पार्टी ने उठाया।

कर्नाटक में दो वर्ष बाद चुनाव होने हैं। कहना कठिन है कि तब क्या होगा, लेकिन यह ध्यान रहे कि कर्नाटक में 1980 के बाद कोई भी सरकार सत्ता में नहीं लौटी है। शिवकुमार इस सिलसिले को तोड़ सकेंगे, यह कहना इसलिए कठिन है, क्योंकि कर्नाटक कई समस्याओं से घिरा है।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु आइटी सिटी के रूप में विख्यात है, लेकिन इस समय बेंगलुरु के साथ देश भर का आइटी उद्योग समस्याओं से घिरा है। कर्नाटक में बेंगलुरु को छोड़कर एक दो शहर ही सही तरह विकसित हो पाए हैं। बेंगलुरु और शेष राज्य में जो आर्थिक असमानता दिखती है, वह यही बताती है कि सरकारों ने अन्य शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। कर्नाटक उसी तरह की आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है, जैसे अन्य कई राज्य।

किसी भी दल के लिए कर्नाटक के लोगों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना इसलिए कठिन होता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र की जनता को संतुष्टि के नाम पर विकास के काम कम, लोकलुभावन योजनाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यह किसी से छिपा नहीं कि रेवड़ी राजनीति कर्नाटक के लिए एक समस्या बन गई है। लोकलुभावन योजनाएं पूरी करने के फेर में राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है। ऐसी योजनाओं से एक तो मुफ्तखोरी की संस्कृति पनपती है और दूसरे राज्य की वित्तीय सेहत बिगड़ती है।

ऐसा कुछ अन्य राज्यों में भी हो रहा है। कर्नाटक की तरह कई राज्यों में आर्थिक विकास राजधानी और चुनिंदा शहरों में ही केंद्रित दिखता है। अधिकांश राज्यों के पिछड़ेपन का कारण यही है कि वहां की सरकारें प्रदेश के समग्र विकास पर ध्यान नहीं देतीं। इससे आर्थिक असंतुलन और असमानता बढ़ती है। यह कर्नाटक में भी देखने को मिल रहा है। यह स्थिति शिवकुमार के लिए चुनौती बन सकती है।

प्रमुख राज्यों में देखा जाए तो कांग्रेस के पास तेलंगाना को छोड़कर कर्नाटक ही बचा है। यदि अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से राज्य की सत्ता निकल गई और भाजपा सत्ता में आ गई तो उसका देशव्यापी प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा। इसी के साथ कांग्रेस के लिए उसका मुकाबला करना कठिन हो जाएगा। स्पष्ट है कि शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना तो तय हो गया, लेकिन उनके लिए राज्य को समस्याओं से उबार पाना आसान नहीं होने वाला।

Sanjay Gupta Sir

[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]