विचार: एक शोख आवाज का गुम हो जाना
आरडी बर्मन का आर्केस्ट्रेशन और आशा भोसले के साथ उनकी जुगलबंदी ने जैसे उस दौर में एक जादू पैदा कर दिया था। पंचम दा और आशा के लीक से हटे हुए कुछ गाने हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी थाती के रूप में शुमार हैं।
HighLights
आशा भोसले की अनूठी आवाज़ ने बनाई अलग पहचान।
ओपी नैयर, आरडी बर्मन संग यादगार संगीत यात्रा।
भारतीय फिल्म संगीत में उनका योगदान अमूल्य विरासत।
यतीन्द्र मिश्र। आग के शोलों की तरह लपकती और युवाओं के मन को झंकृत करने वाली आवाज का युग आज समाप्त हो गया। पंडित दीनानाथ मंगेशकर की दूसरी बेटी भी भारतीय पार्श्वगायन के महान परिदृश्य से सदा के लिए ओझल हो गईं, जिसे लता मंगेशकर के अवसान के बाद दक्षिण एशियाई देशों में आखिरी महत्वपूर्ण आवाज के रूप में जाना जाता था। आशा भोसले, जिन्हें सदियों में एक आशा के मुहावरे से याद किया जाता था। ऐसे समय सुर संगीत के क्षेत्र में अपनी मोहक और मादक स्वर के साथ एकाएक सुनहरे पर्दे पर आई थीं, जिनके पहले उन्हीं की बड़ी बहन लता मंगेशकर ने अपनी दैवीय पवित्र आवाज के साथ एक अलग ही एकाधिकार साधा हुआ था।
वर्ष 1933 में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौर में सांगली (महाराष्ट्र) में जन्मीं आशा जी, मंगेशकरों में सर्वथा अलग थीं, जैसे सात सुरों के बीच उनकी उपस्थिति का एक गहरा अभिप्राय हो। आज इंटनेरट मीडिया, यू-ट्यूब और स्पाटिफाई के जमाने में जब तीन मिनट की धुन आधारित रिद्म वाले गीतों पर युवा झूमने को तैयार रहते हैं, उसकी शुरुआत का श्रेय आशा जी को जाता है, जिन्होंने मुख्य अभिनेत्रियों के सदाबहार दर्दीले गीतों वाली फिल्मों में सहनायिका के लिए वह स्थान पैदा किया, जहां से क्लब या महफिलों में झूमने वाले गीतों को भी एक मुकाम मिलने लगा। उनके जीवन में अपनी बड़ी बहन की तरह ही सफलता, बड़े संघर्षों के बाद आई और यह भी हुआ कि घर में ही सबसे मजबूत और लोकप्रिय आवाज के साथ प्रतिस्पर्धा भी उन्हें झेलनी पड़ी।
आशा भोसले की यात्रा को आज इसी संदर्भ में याद करना प्रासंगिक होगा कि उन्होंने अपने पहले हुईं महान पार्श्वगायिकाओं, जैसे राजकुमारी, सुरैया, जोहराबाई अंबालेवाली, शमशाद बेगम, गीता दत्त और लता मंगेशकर की उपस्थिति में खुद की उपस्थिति को न सिर्फ प्रासंगिक बनाया, बल्कि पार्श्वगायन का ऐसा अनूठा व्याकरण बनती चली गईं, जिनके हिस्से जो भी गीत आया, वह आज की भाषा में चार्टबस्टर हुआ। ‘आइए मेहरबां’ (हावड़ा ब्रिज), ‘मुड़-मुड़ के न देख मुड़-मुड़ के’ (श्री 420), ‘शोख नजर की बिजलियां, (वो कौन थी) जैसे ढेरों गानों से आशा जी के मुहावरे को समझा जा सकता है, जहां न लता मंगेशकर की सादगी है और न ही शमशाद बेगम का तीखापन।
सारे स्वरों के बीच से निकलती हुई ऐसी दोलन करती आवाज, जिसे गुनगुनाना पिछली सदी के छठे दशक में आधुनिकता के प्रति आकर्षित हो रही युवतियों को बहुत भाया। उनके जीवन में संगीतकार ओंकार प्रसाद नैयर का आगमन वैसे तो वर्ष 1954 में ‘मंगू’ से हो गया था, जिसके लिए उन्होंने पहले पहल ‘मन मोरे गा झूम के’ गाया, मगर व्यापक परिदृश्य पर उन्हें ‘नया दौर’ का संगीत सामने लेकर आया, जिसके सभी गीत वर्ष 1957 के दौरान देशभर की धड़कन बन गए थे। मो. रफी के साथ दिलीप कुमार और वैजयंती माला के लिए गाया हुआ युगल गीत ‘मांग के साथ तुम्हारा, मैंने मांग लिया संसार’ ने उनकी नैयर के साथ जोड़ी को आगे के दो दशक तक मिथक बना दिया। आशा भोसले ने अपने संपूर्ण पार्श्वगायन के करियर में कभी भी प्रचलित नियमों को उसी तरह नहीं स्वीकारा, जो चलन में रहे।
उनकी आवाज में बहलाव, भटकन, विरह, प्रतीक्षा आदि की अनेक सिलवटें पड़ी हुई हैं। जैसे वह साबित करने के लिए व्यग्र थीं कि मेरी शैली का कोई दूसरा चेहरा भारतीय फिल्म संगीत में ढूंढ़ पाना असंभव होगा और उन्होंने ऐसा कर दिखाया भी। आशा जी ही यह कर सकती थीं कि किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के साथ ढेरों ऐसे प्रणय गीत गा सकीं, जिन पर आज भी युवा फिसल-फिसल जाएं। उन गीतों की एक लंबी लिस्ट है। फिर भी कुछ गीतों का स्मरण वाजिब होगा- ‘मैं सितारों का तराना’ (चलती का नाम गाड़ी), ‘छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा’ (पेईंग गेस्ट), ‘दीवाना मस्ताना हुआ दिल’ (बंबई का बाबू), ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे’ (आराधना), ‘आप यहां आए किसलिए’ (कल आज और कल), ‘नींद चुरा के रातों में’ (शरीफ बदमाश), ‘ओ साथी चल’ (सीता और गीता)।
उनके सांगीतिक जीवन में ओपी नैयर, आर. डी. बर्मन और खय्याम तीन बड़े सितारों की तरह चमकते हैं। भारतीय फिल्म संगीत का जब भी नए ढंग से मूल्यांकन होगा तो ‘आशा-नैयर युग’ को एक बड़े आंदोलन की तरह देखा जाएगा, जिसमें हर गीत एक जड़ाऊ निर्मिति की तरह अपनी स्वतंत्र शैली, बेहतरीन अदायगी और अनूठे गायन के लिए याद की जाएगी। इसी के समानांतर आरडी बर्मन के साथ की उनकी जोड़ी और उनके लिए सदाबहार प्रेम का गीत या कैबरे सांग सब कुछ वो गाती चली गईं।
आरडी बर्मन का आर्केस्ट्रेशन और आशा भोसले के साथ उनकी जुगलबंदी ने जैसे उस दौर में एक जादू पैदा कर दिया था। पंचम दा और आशा के लीक से हटे हुए कुछ गाने हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी थाती के रूप में शुमार हैं। इसी तरह खय्याम के लिए उनका नायाब और कभी न मिटने वाला ‘उमराव जान’ के लिए पार्श्वगायन हो या फिर जयदेव के लिए ‘अनकही’ जैसी फिल्म के गीत। आशा जी का जाना, एक फड़कते हुए साज का चुप हो जाना है, भारतीय फिल्म संगीत परंपरा में कोमलता और शोखी के गाढ़े लोप सरीखा है।
(लेखक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार स्वर्ण कमल से अलंकृत हैं)












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