ए. सूर्यप्रकाश। एक समय जिस माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के रूप में देखा जाता था, उससे देश को अब मुक्ति मिल गई है। इस मुक्ति में माओवाद के सफाए से जुड़े मोदी सरकार के संकल्प की अहम भूमिका रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा माओवाद विरोधी नीतियों के सक्षम क्रियान्वयन के दम पर देश इस चुनौती से पार पाने में सफल हो सका है। याद रहे कि 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तब 126 जिले माओवाद से प्रभावित थे।

इनमें से 36 में तो माओवादियों की तूती बोलती थी। अब माओवाद की बची-खुची जड़ें केवल दो जिलों तक सिमटकर रह गई हैं और उनके वर्चस्व वाले जिलों की संख्या शून्य हो गई। माओवादी हिंसा देश की जड़ों को खोखला कर रही थी। केंद्रीय गृह मंत्रालय के नेतृत्व में अर्धसैनिक बलों और संबंधित राज्यों के पुलिस बल की एक व्यापक एवं सुव्यवस्थित रणनीति से ही माओवाद की समाप्ति में सफलता मिल सकी। निश्चित रूप से यह मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

बीते दिनों गृहमंत्री अमित शाह ने संसद को इस सफलता के विषय में सूचित भी किया। उन्होंने सदन में बताया कि 2014 से अब तक 4,839 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। जबकि 2,218 गिरफ्तार किए गए और 706 माआवोदी विभिन्न अभियानों में मार गिराए गए। माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में राज्य की बढ़ती पैठ का एक प्रमाण यह है कि इस दौरान वहां 596 पुलिस थाने मजबूत किले में तब्दील हो गए तो केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ के 406 नए कैंप भी स्थापित किए गए।

रात्रि में भी अभियान छेड़ने के लिए सुविधाओं का विस्तार किया गया, जिनमें ऐसी सुविधा वाले 68 हैलीपैड भी शामिल हैं, जहां रात को भी लैंडिंग संभव थी। माओवाद के विरुद्ध मिली उल्लेखनीय सफलता यह सोचने पर भी विवश करती है कि करीब 12 करोड़ की आबादी वाले हिस्से को अपनी चपेट में लेने वाली माओवादी हिंसा से निपटने में पूर्व की सरकारें क्यों विफल रहीं? इसका स्पष्ट उत्तर निकलेगा और वह है दृढ़ता की कमी और राजनीतिक मजबूरियां।

दूसरे शब्दों में कहें तो नीयत साफ नहीं थी। देश में माओवाद की जड़ें इंदिरा गांधी के शासन में पनपनी शुरू हुईं। 1969 में कांग्रेस में विभाजन के बाद इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए वामपंथी दलों के सहारे की जरूरत थी। इस सहारे के बदले में कांग्रेस सरकार ने वामपंथियों और उनके वैचारिक सहोदरों माओवादियों के प्रति नरम रुख अपनाया।

कांग्रेस ने स्वयं को प्रगतिशील दिखाने के लिए भी माओवादियों पर सख्ती नहीं की। जबकि माओवाद मध्य भारत में अपना विस्तार करते हुए देश की जड़ों को दीमक की तरह खोखला कर रहा था। इसका ही परिणाम रहा कि छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, केरल, बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में फैलते गए माओवाद से देश में लाल गलियारे की संकल्पनाएं तैरने लगीं।


माओवाद से निपटने के मामले में स्थितियां केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद बदलीं। गृहमंत्री अमित शाह ने एक व्यापक, बहुआयामी दृष्टिकोण तैयार किया। पूर्व की सरकारें इस आधार पर भी विफल रहीं कि वे स्थानीय जनता को यह भरोसा दिलाने में सक्षम नहीं हो पाईं कि सरकार माओवाद की समाप्ति को लेकर गंभीर है। इसी कारण जनता में माओवादियों का खौफ बना रहा।

मोदी सरकार ने लोगों का यह नजरिया बदला। मोदी के शासनकाल में हालात बदलने लगे। मनमोहन सिंह के शासनकाल (2004-20014) के दौरान माओवाद प्रभावित जिलों में 16463 हिंसक घटनाएं हुईं, जबकि मोदी के शासनकाल (2014-2024) में यह संख्या घटकर 7744 रह गई।

मोदी सरकार ने बार-बार दोहराया कि 31 मार्च, 2026 तक माओवादियों का समूल नाश कर दिया जाएगा। यह घोषणा सरकार के प्रमुख चेहरे अमित शाह करते रहे। इससे पहले किसी भी भारतीय नेता ने इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैली आंतरिक सुरक्षा संबंधी समस्या को समाप्त करने का ऐसा महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय नहीं किया था। यदि वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति में विफल रहे तो उसमें भी बड़ा राजनीतिक जोखिम था, लेकिन आत्मविश्वास से ओतप्रोत मोदी-शाह की जोड़ी अपनी दृढ़ता से इस लक्ष्य की पूर्ति को लेकर आश्वस्त थी।

एक ओर सरकार माओवादियों से निपटने में कोई नरमी नहीं बरत रही थी, तो दूसरी ओर माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को भी प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ा रही थी, ताकि जनता को समझ आए कि जब लोकतांत्रिक शासन अपने सही स्वरूप में सक्रिय हो तो उसके कितने सार्थक परिणाम सामने आते हैं। आक्रामक अभियान के चलते माओवादियों के शीर्ष कमांडर या तो मारे गए या फिर उन्होंने आत्मसमर्पण करने की राह चुनी। इससे कैडरों का हौसला भी प्रभावित हुआ।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार ने माओवादी हिंसा को कश्मीर घाटी और पूर्वोत्तर में अलगाववाद से भी बड़ी चुनौती बताया तो था, लेकिन उनकी सरकार ने इससे निपटने के लिए कारगर प्रयास नहीं किए। अब जब मोदी और शाह की जोड़ी ने माओवाद पर अंकुश लगाने में सफलता हासिल की है तो भी कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने इतनी गरिमा भी नहीं दिखाई कि वे सरकार के इन प्रयासों की सराहना कर सकें।

उलटे राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में माओवादियों की सहभागिता की चर्चा हुई। शाह ने संसद में कहा कि राहुल गांधी को 2010 में ओडिशा और 2018 में हैदराबाद में माओवादियों और उनके समर्थकों के साथ मंच साझा करते देखा गया।

माओवादियों के प्रति राहुल के समर्थन का सबसे शर्मनाक वाकया तब सामने आया, जब उन्होंने माओवादी सरगना हिडमा के एनकाउंटर का विरोध कर रहे माओवादी समर्थकों का इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शन में साथ दिया। याद रहे कि हिडमा के खून 170 से अधिक सुरक्षाकर्मियों के रक्त से सने हुए थे। नकारात्मकता में डूबे ये दल भले ही इस सफलता की सराहना करने में संकोच करें, पर देश मोदी-शाह की जोड़ी का आभारी रहेगा, जिसने देश को इस समस्या से मुक्ति दिलाई।

(लेखक लोकतांत्रिक विषयों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)