विचार: अविश्वास के बीच शांति की तलाश
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम बेहद नाजुक है, जिसके टूटने का खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान ने मध्यस्थता का दावा किया, लेकिन उसकी भूमिका पर सवाल उठे।
HighLights
युद्धविराम नाजुक, इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्ला पर हमला किया।
पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल, चीन का ईरान पर गहरा प्रभाव।
ट्रंप दबाव में, ईरान होर्मुज पर अपनी शर्तों पर अड़ा।
संजय गुप्त। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच करीब 40 दिन तक जारी लड़ाई को थामने के लिए जो युद्धविराम हुआ, वह बहुत ही नाजुक है। यह आशंका बनी हुई है कि यह कभी भी टूट सकता है। युद्ध विराम की घोषणा के कुछ घंटे बाद ही इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्ला को निशाना बनाने के लिए एक बड़ा हमला किया, जिसमें करीब दो सौ से अधिक लोग मारे गए। जो युद्ध विराम हुआ, वह कथित तौर पर पाकिस्तान की मध्यस्थता के चलते हुआ।
वह इस मध्यस्थता का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है और अपने को शांति का वाहक भी बता रहा है, लेकिन वह विवादों के घेरे में आया और उपहास का पात्र भी बना। पाकिस्तान के हिसाब से युद्धविराम के दायरे में लेबनान भी था, लेकिन इजरायल ने इससे इन्कार किया और अमेरिका ने भी। इससे ईरान भड़क गया और उसने समुद्री मार्ग होर्मुज बंद रखने की चेतावनी दी। पाकिस्तान कुछ भी दावा करे, यह साफ है कि वह मध्यस्थ के स्थान पर संदेश वाहक की भूमिका में था।
यह उस पोस्ट से साबित हुआ, जिसमें लिखा था कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए जारी की जानी वाली पोस्ट। बाद में यह उजागर भी हुआ कि इस पोस्ट को अमेरिका ने तैयार कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भेजा था और इसे खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने देखा था। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि पाकिस्तान न केवल अमेरिका और ईरान के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहा था, बल्कि चीन के भी संपर्क में था।
चूंकि पाकिस्तान की सीमाएं ईरान से लगती हैं, इसलिए वह यह नहीं चाहता था कि इस युद्ध की आंच उस तक आए या फिर उसकी जमीन का इस्तेमाल अमेरिका करे या उसे सऊदी अरब के बचाव में आगे आना पड़े। दोनों ही सूरतों में उसके ईरान से रिश्ते बिगड़ जाते। पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न देश अवश्य है, पर उसका कूटनीतिक प्रभाव और प्रतिष्ठा इतनी नहीं कि वह ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच कोई सुलह-समझौता करा पाए।
इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल के खिलाफ एक आपत्तिजनक पोस्ट की, जिसमें लिखा था कि मैं उम्मीद करता हूं कि जिन लोगों ने यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाने के लिए फलस्तीन जमीन पर कैंसर जैसी विनाशकारी सत्ता (यानी इजरायल) को खड़ा किया, वे नरक में जलें। इजरायल की कड़ी आपत्ति के बाद पाकिस्तानी रक्षा मंत्री को यह पोस्ट डिलीट करनी पड़ी। इस सबके बीच ही पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता हो रही है।
पाकिस्तान के लिए संतोष की बात केवल यह है कि जो युद्ध पश्चिम एशिया के साथ उसे भी बुरी तरह प्रभावित कर रहा था, उसे खत्म करने और किसी समझौते तक पहुंचने के लिए होने वाली बातचीत उसके यहां हो रही है। यदि इस वार्ता में अमेरिका और ईरान के बीच कोई स्थायी समझौता होता है तो उसमें एक बड़ी भूमिका चीन की हो सकती है, क्योंकि उसका ईरान पर अच्छा-खासा प्रभाव है। माना जाता है कि चीन के कहने पर ही ईरान वार्ता के लिए आगे आया। चीन ने अच्छा-खासा निवेश यूएई और खाड़ी के अन्य देशों में किया हुआ है। युद्ध के चलते उसका यह निवेश खतरे में था। इससे चीन चिंतित था और अपने निवेश को सुरक्षित रखने के लिए पर्दे के पीछे से युद्ध विराम के लिए तत्पर था।
फिलहाल इसका आकलन करना कठिन है कि अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर जो हमला किया, उससे उसे हासिल क्या हुआ, क्योंकि ईरान में न तो सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही उसकी सेना पस्त पड़ी। उलटे वह इजरायल को निशाना बनाने के साथ खाड़ी देशों में हमले करने में जुटा रहा। इससे खाड़ी देश तो संकट में पड़े ही, अमेरिका की भी परेशानी बढ़ी। युद्ध विराम की घोषणा के बाद भी इजरायल लेबनान को इसलिए निशाना बना रहा है, क्योंकि वहां ईरान समर्थित हिजबुल्ला सक्रिय है। वह इजरायल को निशाना बनाता रहता है। पश्चिम एशिया में यहूदियों और मुसलमानों के बीच एक अर्से से बैर व्याप्त है।
ईरान तो इजरायल को दुनिया के नक्शे से ही मिटाने की बात करता है। उसके साथ-साथ पाकिस्तान जैसे अनेक इस्लामी देश इजरायल से घृणा करते हैं, लेकिन कई अरब देशों का उसके प्रति रवैया बदला है। भले ही इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू लेबनान से बातचीत को तैयार हों, लेकिन कहना कठिन है कि वे हिजबुल्ला के प्रति नरमी बरतेंगे। जहां तक अमेरिका की बात है, चूंकि ईरान युद्ध ट्रंप के गले की फांस बन गया है, इसलिए वे इस सैन्य टकराव से निकलने के लिए कोई सम्मानजनक रास्ता तलाश रहे हैं। इसका ही फायदा ईरान उठा रहा है।
ट्रंप के किसी तरह युद्ध से निकलने के संकेत इससे मिलते हैं कि वे लंबे खिंचते इस युद्ध के कारण इतने कुंठित हो गए कि ईरान को गालियां देने पर उतर आए। ट्रंप इसलिए मुश्किल में फंस गए हैं, क्योंकि वे न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन करा पाए और न ही यह सुनिश्चित कर सके कि उसकी परमाणु हथियार बनाने की क्षमता खत्म हो गई है। अमेरिका के सामने आर्थिक चुनौती भी खड़ी होती जा रही है। ईरान युद्ध पर पैसा खर्च करने के पहले वह यूक्रेन को आर्थिक मदद दे रहा था। उसने गाजा में इजरायल के हमलों के दौरान भी उसकी मदद की। यह भी ध्यान रहे कि ग्रीनलैंड और ईरान युद्ध के चलते उसके नाटो से रिश्ते भी खराब हो गए हैं।
पिछले लगभग पांच वर्षों में अमेरिका के आर्थिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को हथियार देने में खपा है। यह उसकी आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं। ट्रंप ईरान के समक्ष किस तरह कमजोर साबित हो रहे हैं, इसका पता इससे चलता है कि ईरान ने जिस तरह समुद्री मार्ग होर्मुज को बाधित किया और जिसके चलते विश्व में ऊर्जा संकट गहराया, उसे वे खुलवा नहीं पा रहे हैं।
युद्धविराम के बाद भी ईरान होर्मुज से प्रतिदिन 15 जहाज ही गुजरने देने की जिद पकड़े है। यदि यही स्थिति रही तो ऊर्जा संकट और गहराएगा। इस्लामाबाद में शांति वार्ता का जो भी हश्र हो, यह तय है कि ट्रंप दबाव में हैं और उनकी प्रतिष्ठा खतरे में है। निःसंदेह खतरे में युद्धविराम भी है, क्योंकि शांति की तलाश में वार्ता कर रहे दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रति अविश्वास से भरे हुए हैं।
[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]












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