जैसी आशंका थी वैसा ही हुआ, ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटे तक चली वार्ता विफल हो गई। इसका कारण दोनों पक्षों का अपने रवैये से टस से मस न होना रहा। जहां अमेरिका हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहता था कि ईरान परमाणु हथियार बनाने का इरादा छोड़े, वहीं ईरान न तो इसके लिए तैयार था और न ही अपनी इस जिद को छोड़ने के लिए कि होर्मुज समुद्री मार्ग पर उसका आधिपत्य रहना चाहिए। साफ है कि वार्ता में ईरान ने भी अड़ियल रवैये का परिचय दिया।

वह परमाणु हथियारों से लैस हो, इसे कोई भी नहीं चाहता-अमेरिका और इजरायल तो कदापि नहीं। इसकी अनदेखी न की जाए कि ईरान इजरायल को दुनिया के मानचित्र से मिटाने की बात करता रहता है और उस पर हमले करने वाले हमास, हिजबुल्ला सरीखे आतंकी संगठनों को हर तरह का सहयोग-समर्थन देता है। ईरान का यह दावा झूठा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम नाभिकीय हथियारों के निर्माण के लिए नहीं है, क्योंकि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं कि वह तय सीमा से कहीं अधिक यूरेनियम संवर्धन क्यों कर रहा है?

यदि वह परमाणु हथियारों से लैस हुआ तो पश्चिम एशिया में दादागीरी तो दिखाएगा ही, इजरायल के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा भी बनेगा। विश्व को यह भी स्वीकार नहीं हो सकता कि वह होर्मुज को अपनी निजी जागीर समझे। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार इस जलमार्ग पर उसका एकाधिकार नहीं। यदि ईरान के लिए यह आवश्यक है कि वह होर्मुज और यूरेनियम संवर्धन पर अपना हठ छोड़े तो अमेरिका को भी वहां सत्ता परिवर्तन कराने के अपने अतिवादी विचार का परित्याग करना होगा।

अमेरिका-ईरान के बीच वार्ता विफल होना पश्चिम एशिया के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए निराशा और चिंता का कारण है। इस वार्ता की विफलता के बाद ट्रंप ने जिस तरह होर्मुज की नाकेबंदी करने और वहां से एक भी जहाज न निकलने देने की धमकी दी, वह तो ऊर्जा संकट को और खतरनाक स्थिति में ले जाने वाली बात है। उनकी यह धमकी भारत के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि हमारे कुछ जहाज किसी तरह तेल और गैस लेकर वहां से निकल पा रहे थे।


लगता है ट्रंप चाहते हैं कि होर्मुज को लेकर पूरी दुनिया ईरान पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका के साथ खड़ी हो। जो भी हो, अमेरिका-ईरान जिस तरह अपने रवैये पर अडिग हैं, उससे चंद दिनों पहले थमा 40 दिन पुराना युद्ध नए सिरे से शुरू होने की आशंका बढ़ गई है। यदि युद्ध नए सिरे से छिड़ता है तो अमेरिका ईरान पर कहीं अधिक भीषण हमले करेगा। इसके नतीजे में वह होर्मुज से अपना नियंत्रण खो सकता है। अच्छा होगा कि दोनों पक्ष युद्धविराम पर नए सिरे से कुछ नरम रवैये के साथ पुन: वार्ता की संभावनाएं टटोलें।