जगतबीर सिंह। वियतनाम युद्ध में हुई किरकिरी से सबक लेते हुए जब अमेरिकी सेनाएं 1991 के खाड़ी युद्ध में उतरीं तो उन्होंने थल, नभ एवं जल सेना के ऐसे अभूतपूर्व समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत किया कि चंद दिनों में ही युद्ध का निर्णायक फैसला हो गया। आपरेशन डेजर्ट स्टार्म नाम से चला वह अभियान अमेरिका की बड़ी सैन्य सफलताओं में से एक माना जाता है।

हालांकि उसके कुछ साल बाद ही अफगानिस्तान में अमेरिका का आतंक विरोधी अभियान इतना लंबा खिंचा कि उसे कभी न समाप्त होने वाले ‘अंतहीन युद्ध’ की संज्ञा मिलने लगी। अमेरिकी सेना के सबसे लंबे अभियान के रूप में दर्ज हुए इस अभियान के विषय में यह भी कहा जा सकता है कि अमेरिका को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी, क्योंकि तालिबान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गए।

इसी तरह रूस ने भी यूक्रेन पर इसी धारणा के साथ हमला किया कि कुछ ही दिनों में वह हथियार डाल देगा, लेकिन वह लड़ाई अभी तक जारी है। अक्टूबर 2023 में जब हमास के हमले के बाद इजरायल ने गाजा को निशाना बनाया तो यही माना गया था कि थोड़े समय में ही यह लड़ाई थम जाएगी, मगर उस लड़ाई का दायरा बढ़कर लेबनान, सीरिया और यमन तक विस्तारित होता गया। हालांकि जनवरी में वहां एक युद्धविराम की स्थिति तो बनी, लेकिन वहां भीषण मानवीय आपदा की स्थिति को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

ईरान युद्ध का उदाहरण लें तो उसकी शुरुआत भी संभवत: इसी विचार के साथ हुई हो कि जल्द ही इसका परिणाम सामने आ जाएगा। शुरुआती दौर में ही शीर्ष नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या इसी धारणा के अनुरूप थी कि इससे शासन परिवर्तन में आसानी होगी। हालांकि खामेनेई की मौत ने शासन परिवर्तन के बजाय ईरानियों को और एकजुट करने का ही काम किया।

शासन पर पहले जो दबाव महसूस हो रहा था, वह भी छिन्न-भिन्न हो गया। फिर लड़ाई लंबे दौर में दाखिल हो गई और पूरी दुनिया उसकी तपिश महसूस करने लगी। इतिहास पर दृष्टि डालें तो यूरोपीय सैन्य नेतृत्व ने 1914 की गर्मियों में यह सोचकर युद्ध छेड़ा कि क्रिसमस तक लड़ाई थम जाएगी, मगर हुआ इसका उलटा और यह जंग नवंबर 1918 तक जारी रही।

जर्मनी ने बख्तरबंद सेना और वायुसेना के घातक उपयोग वाली ब्लिट्जक्रेग यानी बिजली की चपलता वाली रणनीति के जरिये 1940 में पश्चिमी यूरोप के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, लेकिन यह शुरुआती सफलता भी अंतत: उसे जीत नहीं दिला पाई। सोवियत संघ के साथ जर्मनी 1941 में ऐसे विध्वंसक एवं अंतहीन युद्ध में उलझा, जिसमें दोनों खेमों को ही भारी क्षति पहुंची, लेकिन इसका परिणाम जर्मनी के विभाजन के रूप में निकला।

देखा जाए तो दोनों विश्व युद्धों में जीत की कुंजी वास्तविक सैन्य शक्ति से अधिक धैर्य और लंबे समय तक संघर्ष में टिके रहने की क्षमता में निहित थी। इसी क्रम में कोरियाई युद्ध तीन वर्षों से अधिक समय तक चला और अमेरिकी सैनिक वियतनाम में एक दशक से भी अधिक समय तक तैनात रहे। हालांकि इस सबका यह अर्थ नहीं कि आधुनिक सशस्त्र संघर्षों का निर्णय तत्काल नहीं हो पाता।

जून 1967 में इजरायल ने एक सप्ताह के भीतर ही अरब देशों के गठबंधन को धूल चटा दी थी। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के लिए हुए 1971 के युद्ध में भी भारत ने मात्र 13 दिनों की लड़ाई में ही पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। गत वर्ष आपरेशन सिंदूर में भारत की करीब 88 घंटों की जोरदार कार्रवाई के बाद ही पाकिस्तान संघर्षविराम की गुहार लगाने लगा था।

सैन्य रणनीतियों में संक्षिप्त स्वरूप में तीव्र प्रहार और एकाएक किए हमलों के जरिये जीत की अपनी महत्ता रही है, लेकिन इतिहास साक्षी है कि जो सेनाएं इस भरोसे के साथ रणभूमि में उतरीं, उन्हें यह अनुभूति भी हुई कि किसी भी युद्ध को अपेक्षित समय में संतोषजनक परिणामों के साथ समाप्त करना कितनी टेढ़ी खीर साबित हुआ।

संक्षिप्त युद्ध की रणनीति मुख्य रूप से प्रतिद्वंद्वी को एकाएक हमले से चौंकाने पर टिकी होती है। इसमें पूरी ताकत से ऐसे हमलों पर जोर होता है कि दुश्मन को संभलने का कोई मौका ही न मिले और उस पर निर्णायक बढ़त बनाई जाए। यह भी स्मरण रखना होगा कि छोटे युद्ध उन संसाधनों के दम पर लड़े जाते हैं जो उस समय उपलब्ध होते हैं, लेकिन लंबे खिंचने वाले युद्धों के लिए उन क्षमताओं को विकसित करना पड़ता है, जो निरंतर बदलती युद्ध स्थितियों के अनुरूप उपयोगी साबित हो सकें।

संक्षिप्त युद्ध अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अस्थायी व्यवधान पैदा करते हैं और इनमें व्यापक आपूर्ति शृंखला की भी खास दरकार नहीं होती। जबकि लंबे खिंचने वाले युद्धों में ऐसी रणनीतियां आवश्यक हो जाती हैं, जो जनता का मनोबल और समर्थन बनाए रख सके।

ईरान युद्ध में अमेरिका और इजरायल का सामना एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी से हुआ, जो न केवल उसके हमलों को झेल रहा था, बल्कि उनका तत्परता से जवाब भी दे रहा था। इस दौरान ईरान ने होर्मुज जलमार्ग से ऊर्जा आपूर्ति को बाधित करके उसे एक आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। तमाम युद्धों की तरह ईरान युद्ध भी इसी पहलू को रेखांकित करने वाला साबित हुआ है कि अधिकांश युद्धों की शुरुआत इस धारणा से होती है कि वे संक्षिप्त होंगे, पर इससे कहीं अधिक कठिन निर्णय यह होता है कि लड़ाई को कब और कैसे समाप्त किया जाए।

(लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं)