जागरण संपादकीय: महिला आरक्षण की पहल
महिला आरक्षण से उन दलों को अवश्य समस्या हो सकती है, जिनका महिलाओं के बीच व्यापक जनाधार नहीं और जो उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के प्रति उदासीन रहते हैं।
HighLights
प्रधानमंत्री ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को सदी का महत्वपूर्ण कदम बताया।
महिला आरक्षण 2011 की जनगणना के आधार पर लागू होगा, विपक्ष को आपत्ति।
यह आरक्षण देश के राजनीतिक परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल देगा।
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री ने यह सही कहा कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। पहले यह अधिनियम नई जनगणना के बाद लागू होना था, पर उसमें देरी के चलते सरकार ने इसे 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने का निर्णय किया। इस पर आपत्ति जताई जा रही है, पर इस आपत्ति को महत्व देने से अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा, क्योंकि ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनने वाले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगता और तब तक 2029 के आम चुनाव हो जाते। इसी कारण इस अधिनियम में संशोधन करने हेतु संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है।
चूंकि यह सत्र विधानसभा चुनावों के बीच बुलाया जा रहा है, इसलिए कई विपक्षी दलों को यह रास नहीं रहा है। कई विपक्षी नेताओं की मानें तो बीती जनगणना के आधार पर महिला आरक्षण लागू करने से कुछ राज्यों के राजनीतिक हितों की अनदेखी हो सकती है और लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। फिलहाल इस आशंका का कोई पुष्ट आधार नहीं। ध्यान रहे प्रधानमंत्री कई बार यह कह चुके हैं कि महिला आरक्षण के चलते सीटें बढ़ने से किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। ऐसे में अच्छा यह होगा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का संशोधित प्रारूप सामने आने के बाद ही सवाल और संदेह खड़े किए जाएं। समस्या यह है कि मोदी सरकार कोई भी पहल करती है तो विपक्ष तत्काल उसकी नीयत पर सवाल खड़े करने लगता है। आलोचना-निंदा अनुमान और आशंका के आधार पर नहीं होनी चाहिए।
विपक्ष का यह कथन निराधार तो नहीं कि सरकार इस समय महिला आरक्षण लागू कराने वाली पहल से अपने राजनीतिक हित साधना चाहती है, लेकिन आम तौर पर सरकारों और दलों के तो हर फैसले राजनीतिक हित ध्यान में रखकर ही लिए जाते हैं। यदि महिला आरक्षण को अगले लोकसभा चुनाव में लागू करने वाली पहल सफल होती है तो ऐसा विपक्ष के समर्थन से ही संभव होगा। स्पष्ट है कि महिला आरक्षण का सपना साकार होने का श्रेय उनके खाते में भी जाएगा।
महिला आरक्षण से उन दलों को अवश्य समस्या हो सकती है, जिनका महिलाओं के बीच व्यापक जनाधार नहीं और जो उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के प्रति उदासीन रहते हैं। वैसे कोई भी दल महिला आरक्षण का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता, क्योंकि अब महिलाएं एक बड़ा और सशक्त वोट बैंक हैं। निःसंदेह महिला आरक्षण से देश का राजनीतिक परिदृश्य और वातावरण बदलेगा, पर यह ध्यान रहे तो बेहतर कि इस आरक्षण मात्र से उनका सामाजिक रूप से उत्थान सुनिश्चित होने वाला नहीं है। इसके लिए सरकारों, राजनीतिक दलों और समाज को कुछ और भी करना होगा।












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