श्यौराज सिंह ‘बेचैन’। महापुरुषों के क्रियाकलाप ही उनका संदेश होते हैं। यही कारण है कि लोग दुनिया के सभी शीर्ष नायकों के जीवन-वृत्तों में गहरी दिलचस्पी दर्शाते हैं। डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन संघर्ष के प्रति भी दुनिया में जिज्ञासुओं की संख्या बढ़ रही है। आज उनकी प्रासंगिकता पर विचार करें तो एक प्रचलित लोक कहावत याद आती है, ‘काम सबको प्यारा होता है, चाम किसी को नहीं।’ इसमें दो मत नहीं कि आंबेडकर भारत भूमि के महा कमेरे सपूत थे। उन्होंने जबसे होश संभाला, उत्तरोत्तर स्वयं को बौद्धिक श्रम की साधना में झोंकते चले गए। बड़ा विजन, बड़े सपने और फिर उनको हासिल करने के लिए सामर्थ्यवान बनने की निरंतर तत्परता की उनकी जैसी दूसरी मिसाल नहीं है।

कबीरपंथी पिता सूबेदार रामजी ने उन्हें पहला पाठ पढ़ाया कि यदि तुम्हें अस्पृश्य-जातियों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति दिलानी है तो ज्ञान की सत्ता से स्वयं को समर्थ बनाना होगा। ज्ञान से ही ज्ञान का जवाब दिया जा सकता है। सो पिता की मंशा समझ आई और पढ़ाई को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया, पर पढ़ाई के मार्ग में अस्पृश्यता और जाति-हिकारत कदम-कदम पर अवरोध खड़े कर रही थीं। ऐसे परिवेश में दसवीं पास कर लेने पर उनका सम्मान किया गया। वे अस्पृश्य समुदाय के दसवीं पास पहले विद्यार्थी थे।

शिक्षा-उपाधियों के उनके कीर्तिमान अध्ययन की निरंतरता के ही परिणाम हैं। अन्यथा स्नातक का उनका परीक्षाफल एक औसत छात्र की छवि ही सामने लाता है। अपनी पैदायशी सुपरमैन वाली धारणा को उन्होंने अपने साक्षात्कारों में स्वयं ही तोड़ा। 13 अप्रैल, 1947 को ‘साप्ताहिक नवयुग’ में अपने साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि मेरी बीए में थोड़े ही अंकों से सेकेंड डिवीजन रह गई। इंटरमीडिएट में कुल 600 में 223 अंक ही आए थे। इस बाबत उन्होंने कहा था कि अगर कोई मेरे बीए तक के परीक्षा परिणाम देख कर भविष्यवाणी करता कि यह लड़का आगे चल कर इतनी उपलब्धियां प्राप्त करेगा तो उसे पागल करार दिया जाता। फिर भी उनके अध्ययन और लेखन का चुनाव, रिसर्च की गुणवत्ता और देश समाज के संदर्भ में उसकी उपयोगिता महत्वपूर्ण है। उनके शोध के निष्कर्षों की रोशनी में ही भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना हुई। अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाले अमर्त्य सेन ने भी गरीबी को समझने के लिए डा. आंबेडकर के रिसर्च को श्रेय दिया था।

राष्ट्रीय एकता को लेकर डॉ. आंबेडकर न केवल चिंतित रहते थे, बल्कि उन्होंने पंथ के आधार पर भारत विभाजन रोकने की सलाह भी दी थी। ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ पुस्तक लिखकर उन्होंने दोनों पक्षों को समझाया भी था। जिन्ना को समझाया था कि एकता से हल निकालें, बंटवारा करा कर पछताएंगे। जिन्ना ने उन्हें अनसुना करते हुए कहा, ‘मैं आपकी किताब पढ़ चुका हूं, डॉ. आंबेडकर यह आपकी राय है, हमारा फैसला नहीं है।’ बाबा साहब दूरद्रष्टा थे। उन्होंने तभी बता दिया था कि विभाजन से स्थायी शांति और प्रगति स्थापित नहीं होगी। आधे मुसलमान भारत और आधे पाकिस्तान में, इससे समाधान नहीं होगा, परंतु उनकी किसी ने नहीं सुनी।

भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर डॉ. आंबेडकर की शंकाएं सही साबित हुईं। आज भी दोनों में प्रेम, सहयोग, शांति और सद्भाव नहीं है। पाकिस्तान पोषित आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत को भारी धन-बल खर्च करने पड़ रहे हैं। पाकिस्तान भी जब तब हथियार भांजता रहता है। यदि दोनों देश अविभाजित होते तो युद्ध सामग्री पर खर्च होने वाली मोटी धनराशि देश के आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास पर खर्च होती है।

अछूतों को आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से समर्थ बनाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर गोलमेज सम्मेलन से पृथक निर्वाचन का अधिकार लेकर आए। इस पर गांधी जी ने कहा, ‘अस्पृश्य मेरे दिल के टुकड़े हैं। मैं उन्हें अलग नहीं होने दूंगा।’ तत्कालीन मीडिया ने भी पृथक निर्वाचन को ऐसे पेश किया जैसे पाकिस्तान की तरह डॉ. आंबेडकर कोई अलग दलितस्थान बनाने जा रहे हों। गांधी जी ने पूना की यरवदा जेल में आमरण अनशन कर दिया। डॉ. आंबेडकर पर चारों ओर से दबाव डाला गया कि बापू के प्राण बचाओ। वे धर्म संकट में थे। गांधीजी के प्राणों की रक्षा करें या अस्पृश्यों के हितों-अधिकारों की रक्षा? आखिर राजनीतिक सत्ता, प्रशासनिक एवं राजकीय सेवाओं में निर्धारित प्रतिनिधित्व के आधार पर पूना पैक्ट हो गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समझौते पर नेक नीयत से अमल नहीं हुआ। दस वर्ष के भीतर प्रतिनिधित्व पूरा होने का आश्वासन आज तक पूरा नहीं हुआ। उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं प्रशासनिक उच्च स्तर पर प्रतिनिधित्व पूरा होना तो दूर, उपस्थिति तक नगण्य बनी हुई है।

भारत में जातिभेद की तरह अमेरिका में नस्लभेद की समस्या थी। उसमें समावेशी नीतियों को लागू करके अश्वेतों को उद्योग, मीडिया, कला, सिनेमा, राजनीति, खेल, संगीत सब क्षेत्रों में समावेश कर लिया। भारत के आधुनिक सेवा क्षेत्र में दलितों का उचित समावेश नहीं है। नतीजा उन्हें देश को अमेरिका बनाने का अवसर नहीं मिल रहा है। बेशक हम विकासशील हैं, परंतु संतुलन और समग्रता में उसे विकसित बनाने वाले नागरिकों को मौके देने से राष्ट्रीय निर्माण में तेजी आएगी।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सीनियर प्रोफेसर हैं)