प्रेम कुमार। भारत का लोकतंत्र बहुलतावाद पर आधारित राष्ट्रीयता की उस उदात्त कल्पना पर प्रतिष्ठित है, जिसमें विविधता को शक्ति माना गया है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संवैधानिक संस्थाएं हैं। संसद इन संस्थाओं का सर्वोच्च मंच है। इस सदन में व्यक्त होने वाली हर आवाज देश के करोड़ों नागरिकों की आशाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। लोकसभा अध्यक्ष का पद भारतीय संसदीय लोकतंत्र में सर्वोच्च गरिमापूर्ण, निष्पक्ष और शक्तिसंपन्न संवैधानिक पद है। संविधान के अनुच्छेद 93 के अंतर्गत निर्वाचित लोकसभा के अध्यक्ष/ उपाध्यक्ष सदन की कार्यवाही के सुचारु संचालन, नियमों के पालन, सांसदों के अनुशासन, विशेषाधिकारों की रक्षा और सदन की सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।

वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को 19 जून, 2019 को 17वीं लोकसभा का अध्यक्ष सर्वसम्मति से निर्वाचित किया गया। इस निर्वाचन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ-साथ प्रमुख विपक्षी दलों ने भी अपना समर्थन दिया। यह व्यापक सहमति इस विश्वास का प्रमाण थी कि वे सदन को संतुलित, प्रभावी और अनुशासित रीति से संचालित करने की क्षमता रखते हैं। अध्यक्ष पद ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने जो सुधारात्मक प्रयास और संस्थागत नवाचार किए, उनसे न केवल लोकसभा की कार्य संस्कृति में सकारात्मक परिवर्तन आया, अपितु सदन की कार्यक्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित कर दशकों से चली आ रही परिपाटी को नई दिशा दी है। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक एवं अपेक्षित हैं, किंतु वे मनभेद में परिवर्तित नहीं होने चाहिए। वैचारिक विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही लोकतंत्र को जीवंत बनाती है। तथापि, मतभेदों की अभिव्यक्ति नियमों और संसदीय प्रक्रियाओं के दायरे में ही सार्थक होती है। ओम बिरला ने जिस संयम के साथ विभिन्न परिस्थितियों का सामना किया, वह न केवल सराहनीय है, अपितु विधानसभाओं के लिए भी एक आदर्श उदाहरण है। उनके कार्यकाल का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहलू संसदीय प्रणाली के संस्थागत सुदृढ़ीकरण से संबंधित है। इसी दिशा में नवनिर्वाचित सांसदों के लिए प्रबोधन कार्यक्रम (ओरिएंटेशन प्रोग्राम) एक सुव्यवस्थित और प्रभावी प्रशिक्षण सत्र के रूप में स्थापित किया गया, जो उन्हें संसदीय प्रक्रियाओं, नियमों, विधायी कार्य तथा उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों से सुपरिचित कराता है। इससे न केवल सांसदों की सदन में भागीदारी अधिक प्रभावी हुई, बल्कि बहसों की गुणवत्ता में भी ठोस सुधार परिलक्षित हुआ।

संसदीय समिति प्रणाली विधायी प्रक्रिया की दक्षता, जवाबदेही और समावेशिता को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लोकसभा के संसदीय शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान 'प्राइड' (पार्लियामेंटरी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फार डेमोक्रेसीज) के माध्यम से विभिन्न विधानसभाओं तथा संसद के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में डिजिटाइजेशन, तकनीकी एकीकरण, संसदीय समितियों की कार्यप्रणाली एवं समन्वय, अनुसंधान सहायता और विभाग-संबंधित स्थायी समितियों में विधेयकों के अनिवार्य संदर्भ जैसे विषयों पर विस्तृत प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

ओम बिरला के नेतृत्व में लोकसभा को 'पेपरलेस' बनाने और तकनीकी आधुनिकीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 'डिजिटल संसद' प्लेटफार्म की स्थापना, सांसदों के लिए डिजिटल उपस्थिति प्रणाली जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं इसी व्यापक परिवर्तन का अंग हैं। मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए आश्वासनों की निगरानी के लिए 'आनलाइन एश्योरेंस मानिटरिंग सिस्टम' को सशक्त किया गया, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों की जवाबदेही और पारदर्शिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसी क्रम में 'नेशनल ई-विधान एप्लीकेशन' कार्यक्रम को व्यापक स्तर पर लागू किया गया। वर्तमान में 21 राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों की विधानमंडल इस प्लेटफार्म के माध्यम से अपना विधायी कामकाज डिजिटल माध्यम से संचालित कर रही हैं।

बिहार विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में मेरा अनुभव है कि इस नवाचार से विधानसभाओं की डिजिटल कार्यप्रणाली को अत्यंत प्रोत्साहन मिला है। संसदीय कार्यवाही के आधुनिकीकरण तथा पारदर्शिता, सुगमता और दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। लोकसभा सचिवालय और इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सहयोग से विकसित स्वदेशी एआइ टूल 'संसद भाषिणी' का उपयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत की भाषायी विविधता को ध्यान में रखते हुए इसके माध्यम से संसदीय दस्तावेजों को विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।

लोकसभा अध्यक्ष का पद दलगत राजनीति से ऊपर होता है और संविधान ने उन्हें तटस्थ मध्यस्थता की महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की है। संसदीय अनुशासन को बनाए रखना अध्यक्ष की एक अनिवार्य संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार निश्चित रूप से मूलभूत है, किंतु यह स्वतंत्रता संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के दायरे में ही अर्थपूर्ण एवं वैधानिक होती है। ऐसे में जब अध्यक्ष को अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, तो राजनीतिक असहमति का उभरना स्वाभाविक है। फिर भी यह समझना आवश्यक है कि यदि अध्यक्ष की संस्था को निरंतर विवादों और अविश्वास के घेरे में रखा जाएगा, तो इससे संसदीय लोकतंत्र की मूल संरचना कमजोर हो सकती है।

भारतीय संसदीय लोकतंत्र की यात्रा केवल संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण की कहानी नहीं है। यह उस अटूट संकल्प की गाथा है, जो प्रत्येक चुनौती को अवसर में और प्रत्येक संकट को नवनिर्माण की शक्ति में परिवर्तित करती है। जब तक सदन में एक भी स्वर जनआकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता रहेगा, भारत का लोकतंत्र न केवल जीवित रहेगा, अपितु और अधिक दीप्तिमान होता रहेगा।

(लेखक बिहार विधानसभा के अध्यक्ष हैं)