विचार: बंगाल को चाहिए आर्थिक नवजागरण
यह लेख पश्चिम बंगाल के आर्थिक पतन का विश्लेषण करता है, जो कभी भारत का औद्योगिक केंद्र था। साठ के दशक से शुरू हुई यह गिरावट राजनीतिक नीतियों, आर्थिक विषमता और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों का परिणाम है।
HighLights
बंगाल कभी भारत का प्रमुख औद्योगिक और आर्थिक केंद्र था।
राजनीतिक नीतियों, नक्सलवाद ने उद्योगों के पलायन को बढ़ावा दिया।
आर्थिक सुधारों और मतदाता जागरूकता से ही पुनरुत्थान संभव।
शिवकांत शर्मा। स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था, भारत जो कल सोचता है उसे बंगाल आज सोच लेता है। उनकी यह उक्ति स्वतंत्रता के समय के पश्चिम बंगाल के लिए सटीक थी। बंगाल सांस्कृतिक और सामाजिक नवजागरण के साथ-साथ देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास का भी केंद्र था और कलकत्ता(अब कोलकाता) उसकी मुकुटमणि था। स्वतंत्रता के समय उद्योग और व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र कलकत्ता ही था, जिसकी जीडीपी शंघाई के बराबर थी और औसत आय उससे भी अधिक।
देश की एक चौथाई वस्तुओं का उत्पादन अकेले बंगाल में होता था और देश की जीडीपी में सबसे बड़ा योगदान बंगाल का ही था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद और खासकर साठ के दशक के बाद बंगाल और कलकत्ता की किस्मत ने ऐसी पलटी खाई कि आज इस राज्य में तीन प्रतिशत से भी कम वस्तुएं बनती हैं और जीडीपी में उसका योगदान घटकर केवल 5.6 प्रतिशत रह गया है। प्रति व्यक्ति आय में भी वह पहले स्थान से फिसलकर 21वें पायदान पर चला गया है। राज्यों के मानव विकास सूचकांक में भी वह 22वें से 25वें पायदान पर है। ओडिशा भी उससे आगे निकल चुका है। इस पतन का असली कारण बंगाल की राजनीति, आर्थिक विषमता और कानून व्यवस्था में छिपा है, जिसे राज्य सरकारों ने लगातार नजरअंदाज किया है।
बढ़ती आर्थिक विषमता के कारण साठ के दशक से ही नक्सलबाड़ी के हिंसक आंदोलन का दौर शुरू हो गया, जिस पर अंकुश लगाने में राज्य और केंद्र सरकारें, दोनों विफल रहीं। इससे कानून व्यवस्था भंग हुई और राज्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले छोटे और मझोले कारोबारों ने परेशान होकर बड़ी संख्या में पलायन शुरू किया। सत्तर का दशक आते-आते मजदूर संगठनों के सिंडिकेट बनने शुरू हुए, जिन्होंने बड़े उद्योगों को हड़तालों और घेराव से परेशान करना शुरू किया। उनके डर से नए पूंजी निवेशकों का आना तो दूर, पहले से जमे बड़े उद्योग घरानों ने भी कोलकाता से अपने कारोबार समेटने शुरू कर दिए।
टाटा और बिड़ला के कारोबारी मुख्यालय मुंबई चले गए और एंबेसडर कार बनाने वाली हिंदुस्तान मोटर्स से लेकर डनलप टायर तक हुगली के किनारे लगे कारखाने एक-एक करके बंद होते गए। सत्तर का दशक दुनिया भर में मजदूर आंदोलनों का दशक था। भारत में कोलकाता ही नहीं, अहमदाबाद और मुंबई के कारखानों के मजदूर भी हड़ताल, घेराव और आंदोलन कर रहे थे। इसी दौर में बंगाल की जनता ने वाम मोर्चे को भारी जनादेश दिया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। वे 23 साल मुख्यमंत्री रहे। उनकी और उनके बाद 11 साल तक मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकारों की प्राथमिकता निजी पूंजी निवेश को बढ़ावा देकर उद्योग और रोजगार पैदा करने और उससे बढ़े राजस्व को सामाजिक न्याय के कार्यों में लगाने के बजाय सरकारी नियंत्रण और पुनर्वितरण की रही।
यह वही दौर था, जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी माओ की सरकारी नियंत्रण और पुनर्वितरण की नीतियों से हुई बर्बादी से सबक सीखकर विदेशी पूंजी निवेश से औद्योगीकरण की तरफ बढ़ रही थी। इसके दस साल बाद सोवियत संघ भी सत्तर साल की सरकारी नियंत्रण और पुनर्वितरण की नीतियों की नाकामी से भंग हुआ और रूस निजी उद्योगों की तरफ बढ़ा, लेकिन देश से एक दिन आगे देखने वाले बंगाल को यह सब दिखाई नहीं दिया। भुगतान संकट से विवश होकर भारत सरकार ने भी 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां अपनाईं, जिनका लाभ उठाकर कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों ने तेजी से औद्योगीकरण शुरू किया, पर बंगाल के लोग पलायन करते कारोबारों और घटती औसत आय देखकर भी चुनाव-दर-चुनाव उन्हीं सरकारों को चुनते रहे, जो राज्य की अर्थव्यवस्था को चौपट कर रही थीं।
सात बार वाममोर्चा सरकारें चुनने के बाद बंगाल के लोगों ने 2011 में तृणमूल कांग्रेस को जनादेश दिया और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। यह स्पष्ट नहीं था कि उनकी पार्टी को उद्योगों को आकर्षित करने के लिए जनादेश मिला था या उन्हें राज्य से भगाने के लिए, क्योंकि बंगाल की राजनीति में उनका सिक्का ही टाटा उद्योग समूह को नैनो कार का कारखाना लगाने के लिए सिंगूर में दी गई जमीन के विरोध में भड़के आंदोलन का नेतृत्व करने की वजह से जमा था। ममता के 15 साल लंबे शासनकाल में भी राज्य से उद्योगों का पलायन जारी रहा और लगभग 6800 छोटी-बड़ी कंपनियों ने पलायन किया, जिसके कारण कर्ज का बोझ जीडीपी की तुलना में 38 प्रतिशत की सीमा पार कर गया। आज राज्य के बजट का 56 प्रतिशत केवल कर्ज का ब्याज चुकाने, वेतन और पेंशन देने में खर्च हो रहा है।
बजट का 46 प्रतिशत जनकल्याण योजनाओं और वोट बैंक बनाने के लिए शुरू की गई लाभार्थी योजनाओं पर खर्च हो रहा है, जिसे कर्ज लेकर पूरा किया जाता है। इसलिए बुनियादी ढांचा सुधारने और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार के पास कुछ नहीं बचता। आर्थिक नीतियों में आमूलचूल सुधार किए बिना यह स्थिति बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकती। बंगाल की भौगोलिक स्थिति बेजोड़ है। उसके पास देश का सबसे पुराना बंदरगाह है और पूर्वोत्तर भारत के साथ-साथ नेपाल और भूटान का समुद्री व्यापार भी उसी के जरिये होता है। उसके पास खनिज संपदा, समृद्ध विरासत और कोलकाता जैसा औद्योगिक केंद्र है, फिर भी वह देश के विकास का इंजन नहीं बन पाया।
बंगाल को विकास का इंजन बनाए बिना न पूर्वी भारत का विकास हो सकता है और न ही भारत विकास की सही रफ्तार पकड़ सकता है। बंगाल की प्रगति तब तक नहीं हो सकती जब तक यहां का मतदाता विकास और कानून व्यवस्था को चुनाव का प्रमुख मुद्दा नहीं बनाता। तमिलनाडु और कर्नाटक के औद्योगिक विकास का एक कारण यह भी है कि वहां के मतदाता गलत आर्थिक नीतियों पर चलने वाली सरकारों को हर बार बदल लेते हैं। इसकी वजह से सरकारें भी सजग रहती हैं। शायद बंगाल के मतदाता के लिए भी जागने का वक्त आ गया है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)












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