अटूट आस्था का शाश्वत प्रतीक सोमनाथ: सीएम योगी आदित्यनाथ
यह पीढ़ी भारत की सांस्कृतिक विरासत की उत्तराधिकारी भी है। उसे यह समझना होगा कि भारत का उत्थान केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं है।
HighLights
सोमनाथ मंदिर भारत की अमर राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक।
सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प था पुनर्निर्माण।
नया भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ आगे बढ़ रहा है।
योगी आदित्यनाथ। भारत केवल एक भूभाग नहीं, अपितु हजारों वर्षों की सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत राष्ट्र है। भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा अजर-अमर है, वह केवल रूप बदलता है। इसी प्रकार भारत की सनातन संस्कृति और उसकी आस्था भी अनश्वर है। इतिहास साक्षी है कि इस चेतना को मिटाने के अनेक प्रयास हुए, किंतु न इसे झुकाया जा सका, न समाप्त किया जा सका।
सौराष्ट्र में समुद्र तट पर अवस्थित श्री सोमनाथ मंदिर उसी अमर राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का तेजस्वी प्रतीक है। विगत एक हजार वर्षों का कालखंड इसका प्रमाण है कि विदेशी आक्रांताओं की घृणा, कट्टरता और विध्वंस की नीति के आगे हमारी आस्था, साहस और सृजनशीलता हर क्षण अडिग रही। आज जब भारतवर्ष 20वीं शताब्दी में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब यह केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण मात्र नहीं, अपितु भारत के आत्मा, उसकी आस्था और उसके स्वाभिमान को पुनः अनुभव करने का पावन अवसर भी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम श्री सोमनाथ ने शताब्दियों के असंख्य आक्रमण और विध्वंस देखे, किंतु हर बार वह और अधिक गौरव एवं तेज के साथ पुनः स्थापित हुआ। महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक अनेक आक्रांताओं ने इसे मिटाने का प्रयास किया, पर वे स्वयं इतिहास में विलीन हो गए और सोमनाथ मंदिर अडिग खड़ा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी जब देश विभाजन की पीड़ा, विस्थापन और अनिश्चितताओं से गुजर रहा था, तब हर भारतवासी यह अनुभव कर रहा था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, भारत को सांस्कृतिक स्वाधीनता का भी पुनर्स्थापन करना होगा।
ऐसे समय में लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। यह केवल एक मंदिर का पुनरुद्धार नहीं, स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प था। सरदार पटेल जानते थे कि यदि राष्ट्र को आत्मबल के साथ आगे बढ़ना है, तो उसे अपनी सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक गौरव से जुड़ना ही होगा। सोमनाथ का पुनर्निर्माण एक उद्घोष था कि स्वतंत्र भारत जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं के साथ आगे बढ़ेगा। हालांकि सरदार पटेल अपने उस स्वप्न को साकार होते नहीं देखे सके, पर प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अनिच्छा के बावजूद सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए थे। डा. राजेंद्र प्रसाद का यह निर्णय इसकी उद्घोषणा था कि भारत के सांस्कृतिक आत्मा को किसी वैचारिक आग्रह से दबाया नहीं जा सकता।
आज, अमृतकाल के कालखंड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ‘स्व’ से साक्षात्कार कर रहा है। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ही कालखंड है। जो कार्य स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद जी ने प्रारंभ किया था, वही चेतना आज मोदी जी के नेतृत्व में नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती दिखाई देती है। अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण भी पांच शताब्दियों के संघर्ष, धैर्य और सांस्कृतिक स्वाभिमान की ऐतिहासिक परिणति है। कभी जिन आक्रांताओं ने श्रीरामजन्मभूमि को अपमानित कर भारत की आस्था पर प्रहार किया था, आज उनका नाम इतिहास के अंधकार में खो चुका है, किंतु प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर पूरे वैभव के साथ खड़ा है।
इसी क्रम में श्रीकाशी विश्वनाथ धाम का पुनर्विकास काशी की जीवंतता और भारत की सनातन चेतना के पुनरुत्थान का प्रतीक है। आज वैश्विक स्तर पर भी भारत की इस सांस्कृतिक चेतना को नई स्वीकृति प्राप्त हो रही है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, अध्यात्म और सनातन जीवनदृष्टि के प्रति विश्व का आकर्षण निरंतर बढ़ रहा है। यह केवल सांस्कृतिक प्रभाव नहीं है, यह भारत की उस शाश्वत दृष्टि की स्वीकृति है, जो मानवता को संतुलन, सहअस्तित्व और समरसता का मार्ग दिखाती है। प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में ‘नया भारत’ आज ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के रूप में सनातन आस्था के सांस्कृतिक गौरव का उत्सव मना रहा है और गजनी जैसे आततायियों के विध्वंस पर उल्लास, सृजन और वैभव का नव-अंकुर प्रस्फुटित हो रहा है।
सोमनाथ का पुनर्निर्माण इसी व्यापक सांस्कृतिक विमर्श का महत्वपूर्ण आधार है। यह हमें स्मरण कराता है कि कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक शक्ति से महान नहीं बनता। उसकी वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना, उसके ऐतिहासिक आत्मविश्वास और उसकी सभ्यतागत निरंतरता में निहित होती है। जिन राष्ट्रों ने अपनी जड़ों को भुला दिया, वे इतिहास में धीरे-धीरे कमजोर पड़ गए, किंतु भारत ने हर युग में अपने आत्मा को सुरक्षित रखा। आज जब हम पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तब यह अवसर नई पीढ़ी को भारत के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने का भी है।
यह पीढ़ी भारत की सांस्कृतिक विरासत की उत्तराधिकारी भी है। उसे यह समझना होगा कि भारत का उत्थान केवल आर्थिक प्रगति से संभव नहीं है। भारत तब पूर्ण रूप से विकसित और शक्तिशाली बनेगा, जब वह अपने आत्मा से जुड़कर आगे बढ़ेगा। श्री सोमनाथ मंदिर हमें यह भी स्मरण कराता है कि पुनर्निर्माण केवल भौतिक नहीं होता, वह मानसिक और राष्ट्रीय भी होता है। जब कोई समाज अपने टूटे हुए प्रतीकों को पुनः स्थापित करता है, तब वह केवल भवन नहीं बनाता, बल्कि अपने आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करता है। पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर की 75वीं वर्षगांठ हमें यही प्रेरणा देती है कि राष्ट्र का स्वाभिमान उसकी सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा होता है। यदि संस्कृति सुरक्षित है, तो राष्ट्र का भविष्य भी सुरक्षित है।
आइए, इस अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि भारत की महान सांस्कृतिक परंपरा, आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रीय मूल्यों को और अधिक सशक्त बनाएंगे। भावी पीढ़ियों को अपनी सभ्यता का गौरव समझाएंगे और अमृतकाल में भारत को उसके वास्तविक वैश्विक स्वरूप तक पहुंचाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। जय सोमनाथ!
(लेखक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)












