प्रतिकूल परिस्थितियों में बचत का सुझाव देना अथवा किफायत बरतने की अपील करना कभी भी अनावश्यक नहीं हो सकता, लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि विपक्ष को प्रधानमंत्री की इस सलाह पर आपत्ति है कि मौजूदा हालात में लोग पेट्रोलियम पदार्थों के उपयोग में संयम बरतें, वर्क फ्राम होम की संस्कृति अपनाएं, विदेश यात्रा से बचें, सोना न खरीदें और देश में ही विवाह समारोह आयोजित करें।

आखिर उन संसाधनों के उपयोग में किफायत क्यों नहीं बरती जानी चाहिए, जिनके आयात में विदेशी मुद्रा खर्च होती है? क्या यह किसी से छिपा है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत समेत अधिकांश देशों के आयात बिल बढ़ रहे हैं और इसका बुरा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है? हर किसी को इससे परिचित होना चाहिए कि डालर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से अर्थव्यवस्था को दोहरा नुकसान हो रहा है।

यह नुकसान न बढ़ने पाए, इसके लिए प्रधानमंत्री ने देशवासियों को संसाधनों के संयमित उपयोग की जो सीख दी, वह सही समय पर दी गई एक उचित सलाह है। जब विपक्ष को इस पर आपत्तियां खड़ी करने के स्थान पर मौके की नजाकत समझनी चाहिए, तब वह ऐसी प्रतीति करा रहा है, जैसे प्रधानमंत्री लोगों को डरा रहे हैं या फिर अपनी असमर्थता बयान कर रहे हैं।

राहुल गांधी समेत जो विपक्षी नेता प्रधानमंत्री की सही सलाह को उनकी नाकामी बता रहे हैं, उन्हें इससे परिचित होना चाहिए कि गाढ़े वक्त में जनता से संसाधनों के उपयोग में संयम बरतने का आग्रह पहले भी अनेक बार किया जा चुका है? उन्हें इससे भी अवगत होना चाहिए कि अमेरिका और ईरान में टकराव के चलते होर्मुज समुद्री मार्ग बंद होने से जो ऊर्जा संकट उपजा है, उसके नतीजे में पड़ोसी देशों समेत अधिकांश देशों में पेट्रोल और डीजल के मूल्य बढ़ाने पड़े हैं।

क्या यह उल्लेखनीय नहीं कि भारत में अभी तक ऐसा करने की नौबत नहीं आई है? इसकी भी अनदेखी न की जाए कि कहीं-कहीं गैस की थोड़ी किल्लत अवश्य देखने को मिल रही है, लेकिन पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति में कहीं कोई बाधा इसके बाद भी देखने को नहीं मिली है कि भारत में पेट्रो उत्पादों की खपत विश्व में सबसे तेजी से बढ़ रही है। इससे यही पता चलता है कि तमाम चुनौतियों के बाद भी हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत है।

यह विचित्र है कि जनता को वस्तुस्थिति से अवगत कराने वाली प्रधानमंत्री की जिस अपील को औद्योगिक जगत सही मान रहा है, उसमें विपक्ष को खामी दिख रही है? इसे उसके दृष्टि दोष के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। विपक्ष को यह आभास होना चाहिए कि ऐसी अपील के केंद्र में आम लोगों के स्थान पर वे सक्षम लोग अधिक होते हैं, जो अपनी आर्थिक संपन्नता के चलते कई बार किफायत की चिंता नहीं करते?