बंगाल में भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण के बाद अब प्रतीक्षा है अप्रत्याशित चुनाव परिणाम वाले दूसरे राज्य तमिलनाडु में सरकार गठन की। चूंकि टीवीके नेता जोसेफ विजय ने डीएमके से छिटकने वाली कांग्रेस, माकपा, भाकपा, वीसीके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सहयोग से समर्थन जुटा लिया है, इसलिए उनके मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने में संदेह नहीं। विजय का अभिनेता से नेता बनकर एक तरह से आनन-फानन मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं। उन्होंने दो वर्ष पूर्व अपने दल का गठन किया और पहले ही प्रयास में सत्ता की कुर्सी तक पहुंच गए। उनकी जीत यह बताती है कि तमिलनाडु में फिल्म कलाकारों के प्रति लोगों की एक अलग तरह की दीवानगी रहती है।

इसी के चलते करुणानिधि और एमजीआर से लेकर जयललिता जैसी फिल्मी हस्तियों ने राजनीति में अपनी छाप छोड़ी। फिलहाल यह कहना कठिन है कि विजय मुख्यमंत्री के रूप में कैसी राजनीतिक छाप छोड़ते हैं, क्योंकि उन्हें प्रशासन चलाने का कोई अनुभव नहीं। उनकी सरकार पांच दलों के सहयोग पर टिकी होगी, इसलिए एक अभिनेता के रूप में तमाम लोकप्रियता के बाद भी उनके लिए शासन चलाना बहुत आसान नहीं होगा। यह ठीक है कि तमिलनाडु अपेक्षाकृत एक समृद्ध राज्य है, लेकिन विजय ने जिस तरह थोक के भाव लोक-लुभावन वादे कर रखे हैं, उसे देखते हुए उनके लिए उन्हें पूरा करना आसान नहीं होगा।

आखिर आर्थिक दृष्टि से सक्षम तमिलनाडु में नेताओं को इतने अधिक लोक-लुभावन वादे क्यों करने पड़ते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में यही अधिक दिखता है कि राज्य का एक तबका अभी भी निर्धनता की परिधि में ही बना हुआ है। यह एक विसंगति ही है। इसमें संदेह है कि रेवड़ियां बांटकर निर्धनता को दूर किया जा सकता है। विजय के मामले में यह भी देखना होगा कि वे द्रविड़ दलों की तरह से ही अपनी राजनीति चलाते हैं या फिर कोई नई राह पकड़ते हैं? द्रविड़ पार्टियों के बारे में यह किसी से छिपा नहीं कि वे हिंदी विरोध के साथ दिल्ली यानी केंद्रीय सत्ता से टकराव मोल लेने की राजनीति करती रही हैं और तमिल अस्मिता के नाम पर तमिलवाद को इस तरह उभारने की भी कोशिश करती रहीं, जैसे यह राज्य शेष देश से विशिष्ट हो।

इस तमिलवाद में क्षत्रीय संकीर्णता के साथ प्रायः एक तरह के अलगाववाद की भी बू आती रही है। फिलहाल यह जानना कठिन है कि ईसाइयत को मानने वाले जोसेफ और उनके राजनीतिक दल की विचारधारा क्या है? क्या यह अजीब नहीं कि वे भाजपा को तो धार्मिक पार्टी मानते हैं, लेकिन मुस्लिम लीग को नहीं? वास्तव में विजय को लेकर एक नहीं कई सवाल हैं। इनमें से एक यह भी है कि कहीं उनके सत्ता में आने से ईसाई मिशनरियों का मतांतरण अभियान और तेज तो नहीं हो जाएगा?