डॉ. ऋतु सारस्वत। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों ने इस बार केवल सत्ता का गणित नहीं बदला, बल्कि लोकतंत्र के अर्थ को भी एक नई सामाजिक व्याख्या दी है। आसग्राम से कलिता माझी, हिंगलगंज से रेखा पात्रा और पनिहाटी से रत्ना देवनाथ जैसी महिलाओं की जीत केवल चुनावी सफलता नहीं है।

यहां एक घरेलू सहायिका है, एक श्रमिक और वंचित वर्ग से आई महिला है तो एक ऐसी मां भी है जिसने अपनी निजी पीड़ा और सामाजिक अपमान को अपनी शक्ति और दृढ़निश्चय में बदल दिया। इन महिलाओं की उपस्थिति भारतीय राजनीति के उस बदले हुए चेहरे को सामने लाती है, जहां पहली बार हाशिए पर खड़ी दिखाई देने वाली स्त्रियां सत्ता और प्रतिनिधित्व के केंद्र में दिखाई देने लगी हैं।

इन महिलाओं की जीत को यदि हम मात्र चुनावी परिणाम के रूप में देखेंगे तो यह हमारी सामाजिक दृष्टि की असफलता होगी। चुनावी आंकड़ों और राजनीतिक विमर्शों से परे इन महिलाओं की जीत नारी सशक्तीकरण का हस्ताक्षर है। यही वह नारी सशक्तीकरण है, जिसका आह्वान स्वतंत्रता के बाद से लगातार किया जाता रहा है और जिसकी चर्चा बौद्धिक तथा वैचारिक वर्ग वर्षों से करता आया है।

कलिता माझी, रेखा पात्रा और रत्ना देवनाथ जैसी महिलाओं की जीत के साथ स्वाभाविक अपेक्षा यह थी कि भारत में नारीवादी विचारधारा के समर्थक और उसके मुखर प्रवर्तक खुलकर इनके साथ खड़े दिखाई देंगे। यह अपेक्षा इसलिए भी थी, क्योंकि वर्षों से स्त्री-प्रतिनिधित्व, राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्वकारी उपस्थिति को लेकर निरंतर आवाज उठाई जाती रही है। किंतु आश्चर्य यह है कि तमाम डिजिटल मीडिया मंचों से लेकर वैचारिक और बौद्धिक विमर्शों तक एक विचित्र-सी चुप्पी दिखाई देती है।

वे स्वर, जो सामान्यतः स्त्री-अधिकारों और महिला नेतृत्व के प्रश्न पर अत्यंत मुखर दिखाई देते हैं, आज कहीं खो से गए हैं। नारीवादी चिंतक नैंसी फ्रेजर अपने चर्चित निबंध 'फ्राम रीडिस्ट्रिब्यूशन टू रिकग्निशन?' में इस बात पर गंभीर प्रश्न उठाती हैं कि यदि नारीवाद केवल कुछ सफल और विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं की उपलब्धियों तक सीमित रह जाए तो वह समाज की वास्तविक असमानताओं को नहीं बदल सकता।

शायद यही कारण है कि जब साधारण और संघर्षपूर्ण जीवन से निकली महिलाएं राजनीति और सार्वजनिक नेतृत्व तक पहुंचती हैं तो समाज उन्हें उतनी सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता, जितनी सहजता से प्रभावशाली और संपन्न पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं को स्वीकार करता है।

बेल हुक्स ने अपनी पुस्तक 'फेमिनिस्ट थ्योरी : फ्राम मार्जिन टू सेंटर' में लिखा है कि मुख्यधारा का नारीवादी विमर्श लंबे समय तक मुख्यतः विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं के अनुभवों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। शायद यही कारण है कि श्रम, अभाव और संघर्ष से निकली महिलाओं को वह सहज स्वीकार्यता, प्रशंसा और मान्यता नहीं मिल पाती, जो प्रभावशाली और संपन्न पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं को अपेक्षाकृत आसानी से प्राप्त हो जाती है।

भारत की कोई भी राजनीतिक विचारधारा अथवा दल जब दलित, वंचित और संघर्षशील महिलाओं को मुख्यधारा की राजनीति तक पहुंचाने का अवसर देता है, तब सबसे पहले उन महिलाओं के साहस और संघर्ष को सम्मान मिलना चाहिए। उन्हें केवल किसी राजनीतिक दल के चश्मे से देखकर मौन हो जाना शायद उस व्यापक सामाजिक उद्देश्य को सीमित कर देना है, जिसकी बात दशकों से की जाती रही है।

नारीवाद का उद्देश्य केवल स्त्रियों को प्रतिनिधित्व दिलाना नहीं, बल्कि लैंगिक शोषण और दमन की संरचनाओं को समाप्त करना है। स्त्री संघर्ष को केवल वैचारिक विमर्शों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, उसे उन महिलाओं के जीवनानुभवों, वर्गीय संघर्षों और सामाजिक यथार्थ के साथ भी जोड़कर समझना होगा, जो हाशिए से निकलकर नेतृत्व तक पहुंचती हैं। तब उसका प्रभाव केवल निजी उपलब्धि तक सीमित नहीं रहता। यह स्थिति समाज की लोकतांत्रिक कल्पना, स्त्री आकांक्षाओं और प्रतिनिधित्व की पारंपरिक सीमाओं को भी बदलती है।

विडंबना यह है कि स्त्री-प्रतिनिधित्व और महिला नेतृत्व की चर्चा करने वाले समाजों में भी, जब अत्यंत साधारण, श्रमिक या सामाजिक रूप से उपेक्षित पृष्ठभूमि की महिलाएं राजनीति में पहुंचती हैं तो उनकी उपस्थिति को लेकर एक सूक्ष्म असहजता दिखाई देने लगती है। समस्या केवल स्त्री के राजनीति में आने की नहीं होती, बल्कि इस बात की भी होती है कि वह किस वर्ग और किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आई है। समय आ गया है कि स्वयं को नारीवाद का समर्थक कहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर झांककर यह प्रश्न पूछे कि क्या वह कहीं चयनात्मक नारीवाद का शिकार तो नहीं।

क्या वह वास्तव में हर उस महिला के साथ खड़ा है, जो वंचना, श्रम और सामाजिक उपेक्षा से निकलकर नेतृत्व तक पहुंचती है या फिर उसका समर्थन केवल उन महिलाओं तक सीमित रह जाता है, जिनसे वह वैचारिक या सामाजिक रूप से सहज महसूस करता है। यदि स्त्री संघर्ष और महिला नेतृत्व को भी पसंद-नापसंद तथा वैचारिक सुविधा के आधार पर स्वीकार किया जाएगा तो वह नारीवाद नहीं, बल्कि चयनात्मक नारीवाद बनकर रह जाएगा।

(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)