डॉ. जयंतीलाल भंडारी। इन्वेस्टमेंट इन्फोर्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आइसीआरए) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक कमजोर मानसून, अल नीनो के प्रभाव और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए मुश्किलें दिखाई दे रही हैं। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में भी कहा गया है कि इस वर्ष कमजोर मानसून से भारत में कृषि की पैदावार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने और विकास दर में कमी की आशंका है। भारतीय मौसम विभाग ने भी अल नीनो के कारण इस साल सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है। यह पूर्वानुमान पिछले 26 वर्षों में मानसून का सबसे कम शुरुआती अनुमान है। इससे देश में कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर असर पड़ सकता है। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट की रिपोर्ट में भी इसी तरह का पूर्वानुमान जारी किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 75 प्रतिशत वर्षा पर आधारित मानसून सीजन (जून से सितंबर) में 94 प्रतिशत वर्षा हो सकती है।

आंकड़े बताते हैं कि सामान्य से कम मानसून वाले वर्षों में जब बारिश का समय, वितरण और फैलाव लगभग समान रहा, तब खरीफ के उत्पादन में अधिक कमी नहीं हुई, किंतु गैर-सिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली दलहन और तिलहन जैसी फसलों के लिए जोखिम पैदा हुआ। दलहन और तिलहन का कम उत्पादन खाद्य महंगाई पर असर डाल सकता है। एक ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया संघर्ष से महंगे उर्वरक, महंगे तेल और आपूर्ति शृंखला बाधित होने से खेती की लागत बढ़ी है, तब कमजोर मानसून से न केवल किसानों और कृषि पर, वरन आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर हो सकता है। इससे पेयजल समस्या की चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

गत वर्ष के मानसून सीजन में अच्छी बारिश के कारण जलाशयों में पर्याप्त पानी है, लेकिन अब इस साल अल नीनो के खतरे और कमजोर मानसून की आशंका से जलाशय के सूखने और खेती के लिए पानी की कमी की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि पानी का स्टाक जल्दी खत्म हो सकता है। नीति आयोग के मुताबिक देश के कुल फसल रकबे का केवल 55 प्रतिशत ही सिंचित है और 45 प्रतिशत खेती मानसून पर निर्भर है। कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स के अनुसार, गेहूं की लगभग 74 प्रतिशत और धान की 65 प्रतिशत खेती वाले क्षेत्र पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं। व्यावसायिक फसलों और उद्योगीकरण की ओर बढ़ते रुझान से भारत में मानसूनी वर्षा पर निर्भरता काफी बढ़ी है। यह परिदृश्य देश में अभी सहज स्थिति वाले कृषि क्षेत्र के समक्ष एक नई चुनौती बनकर दिखाई दे रहा है। इस वर्ष सामान्य से कम मानसून और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए कई बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। अभी से ही जल संरक्षण के प्रयास शुरू होने चाहिए।

देश के विभिन्न हिस्सों में विविधतापूर्ण जलवायु है। देश कृषि अनुकूल जलवायु क्षेत्रों के मामले में समृद्ध है। अत: भारत को फसल विविधीकरण और खेती में आधुनिक तकनीक के एकीकरण के साथ आगे बढ़ना चाहिए। देश में अभी भी अनाज, दलहन तथा तिलहन का उत्पादन मौसम पर निर्भर होता है। ऐसे में क्षेत्रवार और फसलवार स्थितियों का व्यापक अध्ययन करते हुए सिंचाई व्यवस्था की नई नीति तैयार करनी चाहिए। हमें कमजोर मानसून के पूर्वानुमान के बीच खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खाद्य भंडारण मजबूत करना चाहिए। वर्ष 2025-26 के लिए खरीफ खाद्यान्न उत्पादन 17.41 करोड़ टन और रबी खाद्यान्न उत्पादन 17.45 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष 2024-25 की तुलना में एक बड़ी छलांग है। पिछले वर्ष खरीफ उत्पादन 16.94 करोड़ टन था, जिसमें इस बार लगभग 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं रबी उत्पादन पिछले वर्ष 16.91 करोड़ टन था, जिसमें इस बार 3.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच भारत में अनाज का यह रिकार्ड उत्पादन एक सुरक्षा कवच की तरह है। 2008 की वैश्विक मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था खाद्यान्न ताकत के कारण ही बहुत कम प्रभावित हुई थी। छह साल पहले कोविड से जंग में देश के खाद्यान्न भंडार देश के लिए बड़ा सहारा बन गए थे।

पिछले महीने अधिसूचित किए गए 50 लाख टन गेहूं के निर्यात आदेशों की पूर्ति अवश्य की जाए, लेकिन आगामी निर्यात आदेशों के लिए सजगता रखी जाए। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि देश ने वर्ष 2021-22 में 70 लाख टन से अधिक गेहूं का निर्यात किया था, लेकिन वर्ष 2024 में गेहूं का आयात करना पड़ा था। ऐसे में अनाज बर्बाद होने से बचाने के लिए देश में वर्ष 2028 तक सहकारी क्षेत्र में 700 लाख टन अनाज भंडारण की नई क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। कृषि में भी प्रौद्योगिकी संस्कृति को बढ़ावा देने और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। व्यापक भंडारण अभियान और कृषि-वित्तीय प्रौद्योगिकी तथा आपूर्ति शृंखलाओं में नवाचार को बढ़ाने के प्रयास किए जाने चाहिए। इससे किसानों और कृषि क्षेत्र को मुश्किलों से बचाते हुए आम आदमी एवं अर्थव्यवस्था की चिंताएं भी कम की जा सकती हैं।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)