संजय गुप्त। पश्चिम बंगाल में जैसे ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की प्रक्रिया शुरू हुई थी, वैसे ही ममता बनर्जी ने उसका उग्र विरोध करना शुरू कर दिया था और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। शीर्ष अदालत ने एसआइआर को न केवल सही माना, बल्कि उसे जारी रखने के आदेश भी दिए। यही नहीं उसने इस प्रक्रिया की निगरानी न्यायिक अधिकारियों को भी सौंप दी। जब चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए राज्य में बड़ी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती की तो उसका भी ममता ने विरोध किया, जबकि यदि चुनाव के पहले और चुनाव के समय हिंसा नहीं हुई तो इसका श्रेय चुनाव आयोग को ही जाता है।

इसके बाद भी ममता ने अपनी हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ा। इस्तीफा देने से इन्कार करके उन्होंने बचकाने राजनीतिक व्यवहार का ही परिचय दिया है।
निःसंदेह अन्य राज्यों की तरह बंगाल में भी मृत, स्थानांतरित और दोहराव वाले लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, लेकिन इसके आधार पर इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी एसआइआर के कारण हारी। यह आरोप इस तथ्य से झूठा साबित होता है कि जिन 20 सीटों पर सबसे अधिक नाम काटे गए, उनमें से 13 में टीएमसी जीती।

इससे इन्कार नहीं कि एसआइआर में कुछ विसंगतियां रही होंगी, क्योंकि कोई भी प्रक्रिया सौ प्रतिशत सही नहीं होती, पर टीएमसी की हार के लिए एसआइआर को दोष देना इस सच से मुंह मोड़ना है कि ममता का शासन कुशासन का पर्याय बन गया था। 15 वर्षों से सत्ता पर आसीन ममता ने मुस्लिम तुष्टीकरण की हदें पार कर दी थीं। इसकी प्रतिक्रिया में हिंदू भाजपा के पक्ष में गोलबंद हुए और इसी कारण उसे अप्रत्याशित जीत मिली। टीएमसी की पराजय इस कारण भी हुई, क्योंकि खुद ममता भी अलोकप्रिय हो गई थीं। इसका कारण था उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से अवैध वसूली और लोगों की संपत्तियों पर कब्जा करना।

बंगाल में महिला असुरक्षा का मुद्दा भी सतह पर आया, क्योंकि आरजी कर मेडिकल कालेज की डाक्टर से दुष्कर्म के बाद हत्या और संदेशखाली में हिंसा एवं महिलाओं से दुर्व्यवहार की घटनाओं ने लोगों को झकझोर कर रख दिया। इससे टीएमसी के प्रति सत्ता विरोधी माहौल और अधिक गहराया। ममता अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय जिस तरह यह कह रही हैं कि वे हारी नहीं, बल्कि उन्हें हराया गया है, वह उनकी खीझ ही है।

बंगाल में आजादी के बाद पहले कुछ दशकों तक कांग्रेस का शासन रहा, फिर वाम दल तीन दशक से भी अधिक समय तक सत्ता में रहे। जब वाम दलों का शासन कुशासन का पर्याय बना तो लोगों ने परिवर्तन के नारे के साथ उन्हें चुनौती देने वाली ममता का साथ दिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भी वाम दलों वाले तौर-तरीके अपना लिए। इसका एक कारण यह भी रहा कि वाम दलों के तमाम नेता और कार्यकर्ता टीएमसी में आ गए थे। एक समय जो ममता बांग्लादेशी घुसपैठियों का विरोध करती थीं, वही सत्ता पाने और उसे बनाए रखने के लोभ में उनकी अनदेखी करनी लगीं। वे इस सच से इन्कार करती रहीं कि बांग्लादेश से घुसपैठ होती है। वे घुसपैठियों का बचाव करने लगीं, जबकि हिंदू समाज यह देख रहा था कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने किस तरह असम की तरह बंगाल के सीमांत क्षेत्रों में डेमोग्राफी बदल दी है।

डेमोग्राफी में यह बदलाव सामाजिक असंतुलन पैदा करने और हिंदू अस्मिता को चोट पहुंचाने के साथ राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन रहा था। जैसे बंगाल में घुसपैठ एक चुनावी मुद्दा बनी, उसी तरह असम में भी और इसी कारण भाजपा वहां तीसरी बार जीती।

बांग्लदेश में पिछले दिनों जो राजनीतिक उथलपुथल एवं हिंसा हुई और जिसमें हिंदुओं को निशाना बनाया गया, उसका भी बंगाल के हिंदुओं पर असर पड़ा। उन्हें लगा कि बंगाल में राष्ट्रवादी विचारों वाली सरकार बननी चाहिए। पता नहीं क्यों ममता यह भूल गईं कि वाम दलों को भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने की कीमत चुकानी पड़ी थी? भाजपा ने घुसपैठियों को निकालने का नारा देकर जो नैरेटिव खड़ा किया, उसने इसलिए काम किया, क्योंकि बंगाली हिंदू अपने आसपास और खासकर सीमावर्ती जिलों में घुसपैठियों का दखल देख रहे थे।

बंगाल में राष्ट्रवादी विचारों वाली सरकार के गठन से न केवल राज्य का बिगड़ा माहौल सुधरना चाहिए, बल्कि घुसपैठ पर भी रोक लगनी चाहिए। आशा है कि भाजपा सरकार के रहते बांग्लदेश के साथ अनसुलझे मसले सुलझाने में भी मदद मिलेगी। बंगाल को राजनीतिक और चुनावी हिंसा की संस्कृति से मुक्त करना राज्य की नई सरकार के एजेंडे में खास तौर पर होना चाहिए। यह आसान नहीं, क्योंकि राज्य की राजनीति एक तरह से हिंसा और दबंगई के सहारे ही संचालित होती रही है। यह दुर्भाग्य की बात रही कि टीएमसी के शासन में भी यह अराजक राजनीतिक संस्कृति और फली-फूली। इसके लिए ममता अपने अलावा किसी अन्य को दोष नहीं दे सकतीं।

बंगाल में चुनाव बाद जो हिंसा देखने को मिली और जिसके चलते कुछ भाजपा समर्थकों के साथ सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक की हत्या की गई, उसके लिए टीएमसी अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती। भाजपा को सावधान रहना होगा कि उसके जो कार्यकर्ता और समर्थक टीएमसी से आए हैं, वे हिंसा और दबंगई की राजनीतिक संस्कृति न अपनाने पाएं। ध्यान रहे खुद सुवेंदु अधिकारी एक समय टीएमसी के प्रमुख नेता और ममता के विश्वासपात्र थे। स्पष्ट है कि भाजपा को अपने संग आए टीएमसी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के कार्य-व्यवहार के प्रति सतर्क रहना होगा।

उसे यह भी देखना होगा कि टीएमसी का अराजक प्रवृत्ति वाला काडर भाजपा में न आने पाए। यदि भाजपा इसे लेकर सचेत नहीं रहती तो राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को खत्म करने में कठिनाई होगी। इसकी अनदेखी न की जाए कि चुनाव बाद हिंसा ने यही सिद्ध किया है कि भाजपा सरकार के सामने कानून एवं व्यवस्था को ठीक करना और ममता के कुशासन के असर को खत्म करना एक बड़ी चुनौती है। किसी राज्य का माहौल तब बदलता है, जब कानून एवं व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त होती है। इसे दुरुस्त करके ही बंगाल को पटरी पर लाया जा सकता है।