विचार: नई रक्षा तकनीक अपनाए भारत
बरसात में उतनी कारगर नहीं रहतीं, दूसरे निशाना चूकने या छिटकने पर विमानों और उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए ड्रोन रक्षा पर अभी और बहुत काम होना बाकी है।
HighLights
रूस-यूक्रेन युद्ध ने स्वायत्त रोबोट, ड्रोन का महत्व दिखाया।
भारत को नई रक्षा तकनीकों को तुरंत अपनाना चाहिए।
निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स का सहयोग रक्षा में जरूरी।
शिवकांत शर्मा। रूस यूक्रेन से दस गुना शक्तिशाली परमाणु महाशक्ति है, लेकिन चार साल लंबी लड़ाई के बावजूद यूक्रेन को नहीं झुका पाया है। अमेरिका ईरान से सौ गुना शक्तिशाली परमाणु महाशक्ति है, मगर दो महीनों के विनाशकारी हमलों के बावजूद ईरान को नहीं झुका पाया है। कारण शायद यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के गत माह के उस दावे में छिपा है कि उनकी सेना के स्वायत्त रूप से काम करने वाले रोबोट वाहनों और ड्रोन प्रणाली ने एक रूसी मोर्चे पर कब्जा कर लिया और तीन रूसी सैनिकों को बंदी बना लिया। लगता है दुनिया फिर उस युग में प्रवेश कर रही है, जहां सेनाओं की जगह उनके शस्त्रास्त्रों का आपस में संग्राम हुआ करेगा।
यूक्रेन इस समय रूसी सैनिकों, वाहनों और ठिकानों को नष्ट करने, युद्ध में फंसे सैनिकों को रसद पहुंचाने और घायल सैनिकों को निकालने के लिए स्वायत्त रूप से काम करने वाली रोबोट प्रणाली का प्रयोग कर रहा है। चार साल से चल रही लड़ाई में यूक्रेन के लगभग डेढ़ लाख सैनिक मारे जा चुके हैं, इसलिए वह रूस की सीमा पर 30 से 40 किमी चौड़ी पट्टी को ऐसे क्षेत्र में बदलना चाहता है, जहां स्वायत्त रोबोट और ड्रोन दुश्मन को देखते ही मार दें। पिछले साल जून में उसने सौ से अधिक ड्रोन के जरिये रूस में चार हजार किमी भीतर तक हवाई ठिकानों के एक तिहाई विमानों को नष्ट कर दिया था। ऐसे शस्त्रास्त्रों के विकास में रूस भी पीछे नहीं है।
यूक्रेन ने पिछले साल रूस का एक ऐसा ड्रोन पकड़ा था जो एआइ से चलने के कारण दुश्मन के ठिकानों की खुद टोह लगाकर नष्ट करने की क्षमता रखता था। इसे सामान्य ड्रोन की तरह संकेत लेने और भेजने की जरूरत नहीं थी, इसलिए उसे जाम भी नहीं किया जा सकता था। रूस के रक्षा उद्योग के बारे में यह धारणा रही है कि वह केंद्रीय नियंत्रण और सेना की संस्थागत परंपराओं की जकड़न में बंधा है, जहां कोई व्यापक परिवर्तन बड़ी मुश्किल से होता है। हालांकि यूक्रेन युद्ध की चोट ने उसके पारंपरिक सोच को बदल दिया है। इस क्रम में रूस ने शुरुआत ईरान के शाहीन ड्रोन से की थी, जिनमें परिष्कार करते हुए वह स्वायत्त रूप से काम कर सकने वाले ड्रोनों तक पहुंचा है। उसने एआइ और स्वायत्त शस्त्रास्त्रों के विकास के लिए अपने रक्षा अनुसंधान क्षेत्र को पूरी तरह खोल दिया है। निजी क्षेत्र के स्टार्टअप, प्रयोगशालाएं और यहां तक कि कुछ स्कूल भी ड्रोन और रक्षा उपकरणों में एआइ से स्वायत्त क्षमता के विकास में लगे हैं।
युद्ध के मैदान से हर रोज हजारों वीडियो आते हैं, जिनका आकलन कर उनकी जानकारी को ड्रोन और स्वायत्त वाहनों में भरा जाता है। स्वायत्त ड्रोनों और रोबोट वाहनों को मानवाधिकार कार्यकर्ता 21वीं सदी का परमाणु बम बताते हैं। इन स्वायत्त प्रणालियों के प्रयोग से जहां सैनिकों की जान का जोखिम कम होगा, वहीं आम नागरिकों की जान का जोखिम बढ़ सकता है, क्योंकि एआइ से काम कर रहा ड्रोन सैनिक और नागरिक में कैसे भेद कर पाएगा? लड़ रहे सैनिक और समर्पण कर रहे सैनिक में कैसे भेद कर पाएगा? रूस तो यह सब चार साल से चल रही लड़ाई जीतने के लिए बना रहा है, क्योंकि उसे यूक्रेन के नागरिकों को होने वाले नुकसान की परवाह नहीं है, लेकिन यूरोप, अमेरिका और भारत जैसे देशों को स्वायत्त प्रणालियों के जोखिम पर भी विचार करना होगा।
इसके बावजूद अमेरिका पूरे जोश के साथ स्वायत्त रक्षा प्रणालियों के विकास में जुटा है। चूंकि उसने ईरान के साथ हुए युद्ध में ड्रोन की मारक क्षमता देख ली है, इसीलिए युद्ध मंत्री पीटर हेगसेथ का कहना है कि अमेरिका को एआइ की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति बनना है। इसे ही ध्यान में रखते हुए पेंटागन ने एआइ विकास में अग्रणी गूगल, ओपनएआइ, एमेजान, माइक्रोसाफ्ट, स्पेसएक्स, ओरेकल और एनवीडिया जैसी कंपनियों के साथ कदमताल शुरू की है। ड्रोन विकास के लिए संभवतः उसे यूक्रेन से ही मदद लेनी होगी, जो इस समय ड्रोन विकास के मोर्चे पर बहुत ऊंचे पायदान पर है। हाल में उसने मार्शियन नाम के स्वायत्त ड्रोन का परीक्षण शुरू किया है, जो 300 किमी प्रति घंटे की गति से उड़ता है और ड्रोन टोही रडारों की पकड़ में भी नहीं आता।
भारत का रक्षा तंत्र भी शस्त्रास्त्र खरीद या विकास की संस्थागत परंपराओं से बंधा है। नए शस्त्रास्त्रों का परीक्षण कर सेना के सभी अंगों से सामंजस्य बिठाने में समय लगता है, जबकि स्वायत्त रोबोट और ड्रोन प्रणालियों का विकास इतनी तेजी से हो रहा है कि कुछ महीनों के भीतर ही उनकी काट तैयार हो जाती है और उनके नए परिष्कृत रूपों का विकास करना पड़ता है। इसलिए इस होड़ में आगे बने रहने के लिए रक्षा कंपनियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र और स्टार्टअप की प्रतिभाओं का सहयोग लेना भी जरूरी है। उनके सहयोग से ही चीन रोबोट मानवों के विकास में दुनिया में सबसे आगे निकल गया है। पिछले महीने बीजिंग में हुई मानव और रोबोट धावकों की 21 किमी लंबी मैराथन दौड़ में चीनी मोबाइल कंपनी के रोबोट मानव लाइटनिंग ने विश्व रिकार्ड सात मिनट से तोड़ दिया।
भारत के लिए स्वायत्त रोबोट और ड्रोन तकनीक में बढ़त पड़ोसी देशों में आतंकवाद के अड्डों से निपटने में भी मददगार बनेगी। जरूरत पड़ने पर स्वायत्त रोबोट और ड्रोन प्रणाली की मदद से करोड़ों डालर के लड़ाकू विमानों और प्रशिक्षित पायलटों को जोखिम में डाले बिना आपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञ यह चेतावनी भी देते हैं कि यदि इस तरह के स्वायत्त ड्रोन और रोबोट आतंकी संगठनों के हाथ पड़ जाएं तो ये गंभीर समस्या भी बन सकते हैं।
इसलिए इनसे बचाव के लिए तैयार हो रहे अस्त्रों के विकास पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है। इजरायल, ब्रिटेन और अमेरिका ने ऐसी लेजर गन का विकास किया है जो एक किमी की दूरी से ही ड्रोन को मार गिरा सकती हैं और वे पेट्रियट और एस-400 जैसी मिसाइल रक्षा प्रणालियों की तुलना में बेहद सस्ती हैं, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है कि एक तो ये कोहरे और बरसात में उतनी कारगर नहीं रहतीं, दूसरे निशाना चूकने या छिटकने पर विमानों और उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए ड्रोन रक्षा पर अभी और बहुत काम होना बाकी है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)












