विचार: सरकार और देश में अंतर करना आवश्यक
लोकतंत्र में सरकार और देश को एक मानना गलत है, क्योंकि सरकारें अस्थायी होती हैं जबकि देश स्थायी। सरकार की आलोचना करना देशद्रोह नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए नागरिक का कर्तव्य है।
HighLights
सरकार अस्थायी, देश स्थायी; अंतर समझना जरूरी।
सरकार की आलोचना नागरिक का लोकतांत्रिक कर्तव्य है।
सत्ताधारी दल के हित राष्ट्रहित से भिन्न हो सकते हैं।
प्रो. मनोज कुमार झा। लोकतंत्र की सबसे बुनियादी सच्चाइयों में से एक यह है कि देश और सरकार एक ही इकाई नहीं होते। यह फर्क केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का मूल आधार है। देश एक जीवंत, बहुस्तरीय और निरंतर विकसित होने वाली सामूहिक चेतना है और उसकी विविधताओं, संघर्षों, इतिहास, आकांक्षाओं और भविष्य का समुच्चय होता है। इसके विपरीत, सरकार एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसे जनता समय-समय पर चुनती है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, पर देश बना रहता है। इस सरल-सी प्रतीत होने वाली सच्चाई को धुंधला करना, लोकतंत्र के आत्मा को कमजोर करना है।
समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक हितों को राष्ट्रहित के रूप में प्रस्तुत करने लगता है। यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन आज के दौर में इसका स्वर अधिक मुखर और आक्रामक हो गया है। सरकार की आलोचना को देश की आलोचना के रूप में चित्रित करना, असहमति को राष्ट्रद्रोह के साथ जोड़ देना और किसी एक नेता की छवि को राष्ट्र की गरिमा के साथ मिला देना, ये सभी प्रवृत्तियां लोकतांत्रिक विमर्श को सीमित करने के औजार हैं। इससे नागरिकों पर दबाव पैदा होता है कि वे सवाल उठाने से बचें, अन्यथा उन्हें “देश-विरोधी” ठहरा दिया जाएगा।
यह माहौल लोकतंत्र की मूल भावना-स्वतंत्र विचार और बहस के सर्वथा प्रतिकूल है।
किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों का कर्तव्य भी होती है। सरकार की नीतियों, निर्णयों और कार्यशैली पर सवाल उठाना, उनका विश्लेषण करना और आवश्यकतानुसार उनका विरोध करना सक्रिय नागरिकता के अनिवार्य तत्व हैं। यदि यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती है, तो सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता है और जवाबदेही कम होती जाती है। जब-जब सरकार और राष्ट्र को एक मान लिया गया, तब-तब लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुईं, नागरिक अधिकारों पर आघात हुआ और तानाशाही प्रवृत्तियां पनपीं।
किसी भी उच्च पदस्थ नेता की गरिमा और प्रतिष्ठा निस्संदेह महत्वपूर्ण होती है, लेकिन उसे राष्ट्र की गरिमा का पर्याय बना देना एक खतरनाक सरलीकरण है। राष्ट्र की प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति की छवि पर नहीं, बल्कि उसके संस्थानों की मजबूती, नागरिकों की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और समाज की समावेशी संरचना पर निर्भर करती है। जब हम किसी नेता की आलोचना को राष्ट्र के अपमान के रूप में देखने लगते हैं, तो हम अनजाने में लोकतंत्र के उस संतुलन को बिगाड़ देते हैं, जो संस्थाओं और व्यक्तियों के बीच स्थापित होना चाहिए। यह याद रखना प्रासंगिक है कि लोकतंत्र में संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं।
व्यक्ति-पूजा का यह चलन धीरे-धीरे संस्थागत ढांचे को कमजोर करता है और लोकतंत्र को एक व्यक्ति-केंद्रित व्यवस्था में बदलने का खतरा पैदा करता है। सत्ताधारी दल का हित और राष्ट्रहित भी हमेशा एक जैसे नहीं होते। हर दल स्वाभाविक रूप से अपने विस्तार, प्रभाव और चुनावी सफलता के लिए काम करता है और यह लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है, लेकिन जब इन हितों को राष्ट्रहित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और विरोध की आवाजों को दबाने का प्रयास होता है, तब समस्या पैदा होती है। इससे नीति-निर्माण में विविध दृष्टिकोणों की गुंजाइश कम हो जाती है और निर्णय एकतरफा हो सकते हैं।
लोकतंत्र का सार ही यह है कि विभिन्न विचारों के बीच संवाद हो और उसी से नीतियों का निर्माण हो। इस बहस में सबसे केंद्रीय भूमिका नागरिक की है। लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। सवाल पूछना, जानकारी जुटाना, नीतियों का मूल्यांकन करना और अपनी स्वतंत्र राय बनाना, ये सभी लोकतांत्रिक नागरिकता के आवश्यक तत्व हैं। यदि नागरिक इस जिम्मेदारी से पीछे हटते हैं, तो सत्ता का असंतुलन बढ़ता है और लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है। यह भी समझना जरूरी है कि आलोचना का अर्थ विरोध या नकारात्मकता नहीं होता। रचनात्मक आलोचना वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से नीतियों में सुधार होता है और शासन अधिक प्रभावी बनता है।
एक परिपक्व लोकतंत्र में सरकार आलोचना को अवसर के रूप में देखती है, न कि खतरे के रूप में, लेकिन जब आलोचना को ही शत्रुता के रूप में देखा जाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक असुरक्षा का संकेत है। आज आवश्यकता इसकी है कि हम देश और सरकार के बीच इस अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और बनाए रखें। हमें यह स्वीकार करना होगा कि सरकारें अस्थायी हैं, लेकिन देश स्थायी है। इसलिए हमारी सर्वोपरि निष्ठा किसी दल या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि उन मूल्यों के प्रति होनी चाहिए, जो इस देश को परिभाषित करते हैं-लोकतंत्र, न्याय, समानता, संप्रभुता और स्वतंत्रता।
एक सशक्त लोकतंत्र वही है, जहां नागरिक निर्भीक होकर सवाल पूछ सकें, जहां असहमति को सम्मान मिले और जहां सरकारें स्वयं को जनता के प्रति जवाबदेह मानें। देश और सरकार के बीच की इस आवश्यक दूरी को बनाए रखना ही लोकतंत्र की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। यदि हम इस अंतर को भूल जाते हैं, तो हम न केवल अपनी नागरिक जिम्मेदारी से विमुख होते हैं, बल्कि उस लोकतांत्रिक आत्मा को भी कमजोर कर देते हैं, जिसने हमें एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रखा है।
(लेखक राजद के राज्यसभा सदस्य हैं)












