तमिलनाडु में अभिनेता जोसेफ विजय की नई बनी पार्टी टीवीके के सबसे बड़े दल के रूप में उभरते ही कांग्रेस ने जिस तरह उसके साथ जाने के संकेत दिए और फिर बिना किसी संकोच ऐसा ही किया, उससे डीएमके का क्रुद्ध होना स्वाभाविक है। डीएमके नेताओं ने कांग्रेस के छिटकने को केवल धोखेबाजी ही नहीं बताया, बल्कि यह भी फैसला किया कि अब संसद में उसके सांसद कांग्रेस सांसदों के साथ नहीं बैठेंगे। यह आईएनडीआईए से नाता तोड़ने की घोषणा ही है। कांग्रेस की तरह डीएमके संग मिलकर चुनाव लड़ने वाली माकपा, भाकपा और वीसीके नामक दल ने भी जिस प्रकार विजय के साथ जाना पसंद किया, वह अवसरवाद के अलावा और कुछ नहीं।

चूंकि अब माकपा और भाकपा की कोई खास राजनीतिक अहमियत नहीं, इसलिए उनके डीएमके से अलग होने का कोई अधिक महत्व नहीं, लेकिन कांग्रेस का अलगाव विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए को और अधिक कमजोर करने वाला है। यह एक तथ्य है कि आईएनडीआईए से छिटकने वाले दलों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। पहले जदयू अलग हुआ, फिर आम आदमी पार्टी। अब एक तरह से कांग्रेस ही उससे किनारा कर रही है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि वे चुनाव से पहले ही टीवीके के साथ जाने पर विचार रहे थे, लेकिन यह कथित विचार उन्हें चुनाव बाद गठबंधन तोड़ने का लाइसेंस नहीं देता। आखिर राजनीतिक नैतिकता और गठबंधन धर्म नाम की कोई चीज है या नहीं?

आने वाले समय में आईएनडीआईए के बिखरने की आशंका इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि अन्य राज्यों में कांग्रेस की घटक दलों से खटपट होती रहती है, जैसे महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना से। यह भी ध्यान रहे कि हाल के विधानसभा चुनावों में बंगाल और केरलम में इस गठबंधन के घटक आमने-सामने ही थे। इस नतीजे पर पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि कांग्रेस को उसी गठबंधन के भविष्य की परवाह नहीं, जिसका नेतृत्व वह अपने हाथ रखना चाहती है। पहले भी इस गठबंधन का भविष्य बहुत उज्ज्वल नहीं दिख रहा था, पर अब तो वह और स्याह दिखने लगा है।

डीएमके संग चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस सत्ता की मलाई खाने जिस तरह एक झटके में टीवीके के साथ चली गई, उससे यही साफ हुआ कि वह अपने स्वार्थ के लिए किसी का भी साथ छोड़ सकती है। तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके का साथ दो दशक से भी अधिक पुराना था, लेकिन उसने अपने स्वार्थ के लिए इस लंबे साथ को कोई अहमियत नहीं दी। अब इसके भरे-पूरे आसार हैं कि इस गठबंधन के अन्य घटक भी मौका देखते ही कांग्रेस से अलग होने में देर नहीं करेंगे। इसकी अनदेखी न की जाए कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कांग्रेस के पलटी मारने पर यह कहकर उस पर तंज ही कसा है कि हम वे नहीं, जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें।