अंततः सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की चुनाव आयोग की प्रक्रिया को न केवल वैध करार दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन विपक्षी नेताओं के लिए एक बड़ा झटका है, जो यह दुष्प्रचार करने में लगे हुए थे कि चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर एसआइआर के नाम पर मनमानी करने में लगा हुआ है। इस आदेश ने यह स्पष्ट किया कि झूठ के पैर नहीं होते और दुष्प्रचार के जरिये किसी वैध प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। इस पर हैरानी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से असहमत लोग निराशा व्यक्त कर रहे हैं।

यह उनकी कुंठा के अतिरिक्त और कुछ नहीं, क्योंकि निष्पक्ष चुनावों की पहली शर्त ही यह है कि वैध मतदाता ही वोट डालें। कोई व्यक्ति वैध मतदाता है या नहीं, इसके निर्धारण के लिए आवश्यक छानबीन करना चुनाव आयोग का अधिकार है। यह विचित्र है कि कुछ विपक्षी दल चुनाव आयोग के इसी अधिकार को चुनौती देने के लिए ऐसे मनगढ़ंत आरोप लगा रहे थे कि आयोग एसआइआर के बहाने उनके समर्थकों के वोट काटने का काम कर रहा है। ऐसे आरोप लगाने वालों ने यह स्पष्ट करने की जहमत कभी नहीं उठाई कि आखिर उन्हें कैसे पता चला कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, वे उनके वोटर हैं?

बिहार में एसआइआर के दौरान जब करीब 65 लाख ऐसे नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जो अन्यत्र बस गए थे या फिर जिनकी मृत्यु हो गई थी अथवा जिनके नाम दो जगह दर्ज थे तो यह शोर मचाया गया कि वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है, पर यह शोर मचाने वाले ऐसे 65 लोगों को भी नहीं जुटा सके। बिहार विधानसभा चुनावों में एसआइआर के कोई मुद्दा न बन पाने के बाद विपक्षी दलों और खासकर वोट चोरी का जुमला उछाल रही कांग्रेस को यह समझ आ जाना चाहिए था कि वह हारी हुई लड़ाई लड़ रही है, लेकिन न उसने दीवार पर लिखी इबारत पढ़ी और न ही अन्य विपक्षी दलों ने।

विपक्षी दलों को इस पर खासी आपत्ति थी कि एसआइआर के तहत लोगों की नागरिकता की परख की जा रही है, जबकि चुनाव आयोग को ऐसा करने का अधिकार ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग किसी का नाम मतदाता सूची में शामिल करने के क्रम में उसकी नागरिकता की जांच कर सकता है। आखिर इससे ही तो तय होगा कि वह भारत का वैध नागरिक है या नहीं? चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की नागरिकता संबंधी जांच अंतिम फैसला नहीं मानी जाएगी, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि केंद्र सरकार लोगों की नागरिकता जांचने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार करने की दिशा में आगे बढ़े।