पंकज चतुर्वेदी। कई दशकों की सबसे भयावह बाढ़ झेल रहे असम में एक तरफ जलप्लावन है तो दूसरी तरफ जमीन के कटाव से लोग बेघर-बेजमीन हो रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश की तलहटी से निकलने वाली सपाई नदी के तेज बहाव ने कई रेलवे स्टेशनों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क लील ली। शिवसागर, डिब्रूगढ़ जैसे जिलों में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों ने दर्जनों बस्तियों को अपने में समा लिया। बाढ़ के चलते एक तो राज्य का विकास हर साल 19 साल पीछे चला जाता है तो दूसरी तरफ राज्य भूमि कटाव के कारण औसतन एक प्रतिशत की दर से जमीन खो रहा है। असम सरकार के अनुसार 1950 से अभी तक राज्य की 4,27,000 हेक्टेयर भूमि नदियों के कटाव के चलते लुप्त हो चुकी है, जो राज्य के क्षेत्रफल का 7.4 प्रतिशत है। वर्ष 2020 के बाद जिस तरह जलवायु परिवर्तन का कुप्रभाव बढ़ा है और चीन द्वारा तिब्बत में ब्रह्मपुत्र के साथ छेड़छाड़ बढ़ी है, राज्य में भूमि कटाव और तेज होता जा रहा है।

जुलाई 2019 में जल संसाधन मंत्रालय ने लोकसभा को बताया था कि 2014 से 2019 के बीच असम में भूस्खलन के कारण 86,536 लोग भूमिहीन हो गए थे। बाढ़ तो असम में सदियों से चार महीने डेरा डालती रही है, फिर भी वहां कभी नदी से डर कर लोगों का पलायन नहीं हुआ। बीते कुछ दशकों के दौरान पानी के बढ़ते भूमि कटाव ने इस राज्य में नए किस्म का विग्रह पैदा कर दिया है। असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे गांव-कस्बे साल दर साल सिकुड़ रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन के गहराते संकट के चलते जब बारिश और गर्मी के अतिरेक एवं हिमनद पर निर्भर नदियों में अनियमित और बेमौसम तेज प्रवाह के चलते तटों का घुलकर पानी में समा जाना बेहद गंभीर पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक संकट बढ़ा रहा है। सदियों पहले नदियों के साथ बहकर आई जिस मिट्टी ने कभी असम राज्य का निर्माण किया, अब वही इस राज्य को बाढ़ और भूमि कटाव से श्रापित कर रही है। ब्रह्मपुत्र और बराक और उनकी सहायक नदियों का बेहद तेज बहाव अपने किनारों की बस्तियों-खेतों को जिस तरह उजाड़ रहा है, उससे राज्य में कई तरह के संकट उपज रहे हैं, जिसमें विस्थापन और भूमिहीन हो जाना बहुत मार्मिक है।

जमीन का कटाव अपने साथ पलायन और सड़क, पुल, सरकारी भवनों आदि के नुकसान सहित कई त्रासदियां लेकर आता है। असम की लगभग 25 लाख आबादी ऐसे गांवों में रहती है, जहां हर साल नदी उनके घर के करीब आ रही है। ऐसे इलाकों को यहां ‘चार’ कहते हैं। चार अर्थात कछार यानी जहां तक नदी का अधिकतम विस्तार होता है। इनमें से कई नदियों के बीच के द्वीप भी हैं। हर बार जमीन का कटाव रोकना, मुआवजा, पुनर्वास चुनावी मुद्दा भी होते हैं, लेकिन यहां बसने वाले किस तरह उपेक्षित हैं, इसकी बानगी यहां का साक्षरता आंकड़ा है, जो महज 19 प्रतिशत है। यहां की आबादी का 67 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे है।

तिनसुखिया से धुबरी तक नदी के किनारे जमीन कटाव, घर-खेत की बर्बादी, विस्थापन, गरीबी और अनिश्चितता की बेहद दयनीय तस्वीर है। कहीं लोगों के पास जमीन के कागजात हैं तो जमीन नहीं। कहीं बाढ़-कटाव में उनके दस्तावेज बह गए और वे नागरिकता रजिस्टर में ‘डी’ श्रेणी में आ गए। इसके चलते आपसी विवाद, सामाजिक टकराव भी गहरे तक दर्द दे रहा है। सोनितपुर जिले में 2,711 लोगों की जमीन नदी में समा गई तो मोरीगांव में 18,425, माजुली में 10,500, कामरूप में 9,337 लोग अपनी भूमि से हाथ धो बैठे। बेशक असम की भौगोलिक स्थिति जटिल है और यहां आने वाली तेज बाढ़ का असली कारण उसके पड़ोसी राज्यों से आने वाला तेज बहाव हैं।

भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि असम में नदी के कटाव को रोकने के लिए बनाए गए अधिकांश तटबंध जर्जर हैं और कई जगह पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। एक मोटा अनुमान है कि राज्य में लगभग 4,448 किलोमीटर नदी तटों पर पक्के तटबंध बनाए गए थे, ताकि बाढ़ के समय जमीन के कटाव को रोका जा सके, लेकिन आज इनमें से आधे भी नहीं बचे हैं। वर्षों से इनकी मरम्मत नहीं हुई। नदियों ने अपना रास्ता भी खूब बदला है। भूमि कटाव का बड़ा कारण राज्य के जंगलों और आर्द्र भूमि पर हुए अतिक्रमण भी हैं। सभी जानते हैं कि पेड़ मिट्टी का क्षरण रोकते हैं और बरसात को भी सीधे धरती पर गिरने से बचाते हैं। आर्द्र भूमि पानी की मात्रा को बड़े स्तर पर नदी के जल-विस्तार को सोखते थे। दुर्भाग्य है कि ऐसे स्थानों पर अतिक्रमण का रोग ग्रामीण स्तर पर संक्रमित हो गया और तभी नदी को अपने ही किनारे काटने के अलावा कोई रास्ता नही दिखा।

आज जरूरत है कि असम की नदियों में ड्रेजिंग के जरिये गहराई को बढ़ाया जाए। इसके किनारे से रेत उत्खनन पर रोक लगे। सघन वन भी कटाव रोकने में मददगार होंगे। अमेरिका की मिसीसिपी नदी भी ऐसे ही भूमि कटाव करती थी। वहां 1989 में तटबंध को अलग तरीके से बनाया गया और उसके साथ खेती के प्रयोग किए गए। आज वहां नदी-कटाव पूरी तरह नियंत्रित हैं। आने वाले दिनों में कम समय में अत्यधिक और तेज बरसात होना ही है। ऐसे में असम के अस्तित्व को बचाने के लिए उसके तटों की सुरक्षा के लिए दूरगामी योजना अनिवार्य है, जो यहां के जल और जन दोनों को बचा सके।

(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं)