जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में ईंट भट्ठे पर काम करने वाले छत्तीसगढ़ के दो हिंदू श्रमिकों की उनका मजहब पूछकर हत्या पहलगाम के भीषण आतंकी हमले की याद दिलाने वाली बर्बर घटना है। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में इसी तरह करीब दो दर्जन पर्यटकों को उनका मजहब पूछकर मारा गया था। यह भी ध्यान रहे कि पहलगाम की तरह कुलगाम के बर्बर हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान के उसी पालतू आतंकी संगठन टीआरएफ ने ली है, जो लश्करे तैयबा का मुखौटा संगठन है।

पाकिस्तान ने टीआरएफ को लश्करे तैयबा की मदद से तब खड़ा किया था, जब उसके सिर पर एफएटीएफ की तलवार लटक रही थी। कुलगाम की घटना यह बता रही है कि अभी टीआरएफ आतंकियों के दुस्साहस का दमन होना शेष है। टीआरएफ गैर-कश्मीरियों और खासकर हिंदुओं की हत्या करने के लिए कुख्यात रहा है। पहलगाम की घटना की भी उसने जिम्मेदारी ली थी। बाद में डर से मुकर गया था। तथ्य यह भी है कि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में उसका बचाव किया था।

लगता है पाकिस्तान पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना के हाथों हुई अपनी तबाही भूल गया है। कुलगाम में आतंकी हमला ऐसे समय किया गया, जब पाकिस्तान अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लोगों का निर्ममता से दमन करने में लगा हुआ है। हैरानी नहीं कि इस कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी जो थू-थू हो रही है, उससे ही ध्यान बंटाने के लिए उसने कुलगाम में पहलगाम की तर्ज पर आतंकी हमला कराया हो।

पाकिस्तान का दुस्साहस इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि अमेरिका ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया है। ऐसे में भारत को उस पर दबाव बनाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर कुछ नए कदम उठाने होंगे। इसके साथ ही पाकिस्तान को यह भी याद दिलाना होगा कि आपरेशन सिंदूर अभी स्थगित भर है। कुलगाम की घटना यह भी रेखांकित कर रही है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकियों को अभी भी पनाह मिल रही है और उन्हें सहयोग एवं संरक्षण देने वाले तत्व सक्रिय हैं।

आतंकियों के साथ उनके समर्थकों को भी निशाने पर लेने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक कश्मीर में शांति की सही तरह बहाली संभव नहीं। आतंकवाद का तो कोई मजहब नहीं होता, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि आतंकी मजहब की आड़ लेते हैं। कश्मीर में आतंकियों को संरक्षण मिलने का यही एक बड़ा कारण है। समस्या यह है कि कश्मीरी नेता इस सच से मुंह मोड़ना चाहते हैं।

इसकी अनदेखी न की जाए कि जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस के नेता कुलगाम की घटना पर यह बेतुका प्रश्न उठाने में लगे हुए हैं कि ऐसा तभी क्यों होता है, जब वे जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे को बहाल करने की मांग करते हैं? इस तरह के सवाल शरारतपूर्ण ही हैं।