क्षमा शर्मा। बेबाक लेखिका तसलीमा नसरीन आखिरकार 19 साल बाद कोलकाता जा पाईं। वे अनेक बार ऐसी इच्छा प्रकट कर चुकी थीं कि बंगाल में ही रहना चाहती हैं, क्योंकि बांग्लादेश की होने के नाते बंगाल उन्हें अपना दूसरा घर लगता है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि तसलीमा को बंगाल से जाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के जमाने में कहा गया था। बुद्धदेव मार्क्सवादी क्म्युनिस्ट पार्टी सरकार के नेता थे। यह दल अपने को सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने वालों में अव्वल कहता है। तो भला क्यों तसलीमा को वहां से हटाया गया, जबकि उनसे ज्यादा कट्टरपंथियों से लड़ाई किसने की और इससे बड़ा दंड क्या होगा कि रातोंरात उन्हें बांग्लादेश छोड़कर आना पड़ा था? पेशे से डाक्टर, लेकिन लेखिका तसलीमा का कुसूर क्या था?

यही कि उन्होंने लज्जा और दो भागों में द्विखंडिता जैसी पुस्तकें लिखीं। लज्जा में उन्होंने अयोध्या ढांचे के ध्वंस के बाद की घटनाओं का उल्लेख किया कि कैसे बांग्लादेश में वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बनाया गया। उन पर हमले हुए। सैकड़ों की संख्या में मंदिर तोड़ दिए गए। हत्याएं भी की गईं। इस सबको लिखने को वहां के कट्टरपंथियों ने अपराध की तरह देखा। सरकार कट्टरपंथियों के आगे झुक गई। उन दिनों वहां बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की नेता खालिदा जिया की सरकार थी। खालिदा अपने भारत विरोधी रुख के लिए जानी जाती थीं। तसलीमा को उनके कुछ मित्रों ने वहां से निकलने में मदद की, अन्यथा आज शायद वे जिंदा भी न होतीं।

अपनी आत्मकथा द्विखंडिता में भी उन्होंने बांग्लादेश के एक बहुत बड़े वामपंथी लेखक से अपने निजी संबंधों को उजागर किया था। इस पर वे लेखक महोदय इतने नाराज हुए कि कट्टरपंथियों की उस मुहिम में शामिल हो गए, जो तसलीमा की हत्या, इस्लाम के कथित अपमान के कारण करना चाहते थे। एक लेखक का ऐसा करना शर्मनाक था, लेकिन शायद ही किसी ने इस लेखक की इस बात के लिए निंदा की कि तसलीमा से बदला लेने के लिए वे उनका साथ देने लगे, जिनका अब तक विरोध करते आए थे। तब तसलीमा न लेखिका रहीं, न ही स्त्री, न ही उनके कोई अधिकार ही। चूंकि तसलीमा ने अल्पसंख्यकों का पक्ष लिया, इसलिए इसकी सजा उन्हें बंगाल सरकार ने भी दी। तब कोलकाता छोड़कर उन्हें दिल्ली में शरण लेनी पड़ी। उनकी चुनौतियां देखी जानी चाहिए कि 1994 से अब तक वे लगातार सुरक्षा के साए में ही जी रही हैं। उनकी इसके लिए तारीफ करनी होगी कि वे अपने रुख से कभी पलटी नहीं। जब मौका मिला, कट्टरपंथियों पर हमलावर रहीं। एक बार हैदराबाद में एक कार्यक्रम में भाग लेने गईं, तो एआइएमआइएम के लोगों ने हमला कर दिया। कुछ साल पहले सलमान रुश्दी पर भी इसी तरह अमेरिका में एक मतांध लड़के ने चाकू से हमला किया और उनकी एक आंख चली गई।

पिछले कुछ दशकों में तसलीमा और रुश्दी को छोड़कर किस और लेखक ने अपने विचारों के कारण इतनी आफतें झेली हैं। वे कट्टरपंथियों से अपनी जान बचाते फिर रहे हैं। हमारे देश में जो लोग अक्सर अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर दोहरे हुए जाते हैं, वे इन दोनों लेखकों का नाम कभी भी नहीं लेते। शायद तसलीमा का अपराध यही है कि उन्होंने अपने देश के उन अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा की बात की, जो कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं। चूंकि अल्पसंख्यक कहलाने वाले ये लोग हिंदू हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि न बाहर के किसी देश में और न भारत में उनका कोई पक्ष लेने वाला है। उनके लिए बोलने वाले भी तत्काल ब्लैकलिस्ट कर दिए जाते हैं। हाल में कश्मीर में कुलगाम के एक ईंट-भट्ठे में काम करने वाले दो गरीब हिंदू होने के कारण मारे गए, लेकिन मजदूरों के लिए काम करने वाली किसी पार्टी को भी उनकी याद नहीं आई। कश्मीर में जो कुछ हिंदुओं के साथ हुआ या पंजाब में, वह सब हमारी पीढ़ी ने अपनी आंखों से देखा है। अफसोस यह है कि बात तो हम धार्मिक भेदभाव भूलने की करते हैं, पर अपने विचारों को बहुत बच-बचकर प्रकट करते हैं। तभी तो किसी के लिए हमारे पास आंसू हैं और किसी की जान जाने पर एक मौन पसरा रहता है। आखिर आंसू भी तब क्यों आएं, जब पता चले कि कौन मरा?

यदि कट्टरपन से लड़ना है, तो हर तरह के पिछड़े विचार पर सवाल उठाना होगा। यह जो चुनी हुई चुप्पियां और चुना हुआ शोर है, मजहबी कट्टरता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन का सबसे बड़ा कारण है। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, कोई भी जान गंवाए, उसकी निंदा की जानी चाहिए। किसी भी निर्दोष की जान जाए, वह दुखद, शोक और निंदा के योग्य है। ऐसा क्यों है कि हिंदुओं को चुन-चुनकर मारने पर किसी प्रकार के दुख का अहसास तक न हो। एकपक्षीय सोच ज्यादातर लेखकों में भी दिखाई देता है। वे भी नेताओं की तरह कभी चुप लगाते हैं, कभी आसमान फाड़ू शोर मचाते हैं। राजनीतिक दलों को तो चुनाव लड़ना है, लेकिन आखिर लेखकों को कौन सा चुनाव लड़ना है, जो किसी घटना पर बोलते हैं और किसी पर चुप्पी साध लेते हैं। तसलीमा न केवल लेखिका हैं, बल्कि एक स्त्री भी हैं, लेकिन सब जानते हैं कि उनकी त्रासदी को स्त्री अधिकारों की बात करने वाले लोगों ने भी अपने-अपने विमर्श से बाहर ही रखा।

(लेखिका साहित्यकार हैं)