विचार: जिहादियों को आतंकी समझने की भूल
भारतीय नेताओं ने असली समस्या से नजर बचाकर जिहादी मनोवृत्ति को यथावत छोड़ दिया है। कभी 'निष्पक्ष चुनाव', कभी 'कश्मीरियत', कभी 'हीलिंग टच', कभी 'विकास' आदि की गौण बातें करते चार दशक हो गए, किंतु कश्मीर में इक्के-दुक्के बचे हिंदुओं का भी सफाया होना बंद नहीं हुआ।
HighLights
शंकर शरण। पिछले साल अप्रैल में जिहादियों द्वारा पहलगाम में पर्यटकों से उनका मजहब पूछकर उनकी हत्या करने के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' की कार्रवाई की थी। उन जिहादियों में पाकिस्तानियों के साथ हिंदुस्तानी भी थे। इनका क्या हुआ, पता नहीं चला। बीते दिनों कश्मीर के कुलगाम में पहलगाम की तरह मजहब पूछकर दो हिंदू मजदूरों की हत्या कर दी गई। अब भारतीय नेता क्या करेंगे? क्या पुनः पाकिस्तान पर हमला करेंगे, यदि जिहादी पाकिस्तानी निकले? यदि वे भारतीय हुए, तब क्या सामान्य पुलिस कार्रवाई होगी? यह प्रश्न पिछले साल भी अनुत्तरित रहा था। इसके फलस्वरूप पुनः वैसी हत्याएं हुईं। उन हत्याओं का मूल कारण जिहाद का मतवाद था। उसे कुछ न कहने से ही वह यथावत रहता है। उस मतवाद पर कोई चोट नहीं की जाती। जिहाद की सभी गतिविधियों पर प्रतिक्रिया में यही बुनियादी भूल रही है।
भारतीय नेताओं ने असली समस्या से नजर बचाकर जिहादी मनोवृत्ति को यथावत छोड़ दिया है। कभी 'निष्पक्ष चुनाव', कभी 'कश्मीरियत', कभी 'हीलिंग टच', कभी 'विकास' आदि की गौण बातें करते चार दशक हो गए, किंतु कश्मीर में इक्के-दुक्के बचे हिंदुओं का भी सफाया होना बंद नहीं हुआ। क्यों? इस पर भारतीय नेताओं ने कभी खुलकर ईमानदारी से विचार नहीं किया। यदि किया होता तो अब तक जिहाद को ठंडा या निर्बल किया जा सकता था। इसकी उपेक्षा इसलिए भी विचित्र है कि वैसी हत्याएं करने वाले खुलकर अपना जिहाद उद्देश्य बताते रहे हैं, फिर भी उसे अनदेखा किया जाता है, जिससे उनका अपने मतवाद पर अंधविश्वास बना रहता है। जिन्हें जिहादी के बदले 'आतंकी' कहा गया, उनके हिंदुस्तानी ठिकानों पर क्या हो?
इस पर हिंदू नेता सदा से दिग्भ्रमित रहे हैं। वे सदैव 'विदेशियों' को ही दोष देते हैं, ताकि अंदरूनी जिहाद से आंख न मिलानी पड़े। इसका सामना पुलिस या फौज नहीं, अपितु साफ नजर और मनोबल को करना है। इसके अभाव में ही गत दशकों में कश्मीर में हिंदुओं का सामूहिक संहार करने, उन्हें आरे से चीर देने वाले क्षेत्रों पर उलटी कार्रवाई हुई। उन्हें तो जैसे भारी पुरस्कार मिले। कभी कहा गया कि उस 'क्षेत्र का विकास' करना है और कभी यह कि 'आतंक छोड़ने वालों को रोजगार देना' है। तदनुसार राष्ट्रीय कोष से उसी क्षेत्र को सालाना विशेष सौगातें दी गईं, जहां से चुन-चुन कर लाखों हिंदुओं को मार भगाया गया। यानी उन 'ठिकानों' जहां वैसे जिहादी हत्यारे और उनके सहयोगी रहते हैं, जिन्होंने अपने मोहल्ले, शहर और गांव से हिंदुओं को चुन-चुन कर उजाड़ दिया और उनकी संपत्ति, खेत, घर, दुकान हड़प लिए, उन्हें ही थोक भाव 'विकास' का स्पेशल पैकेज मिलता रहा। क्या यह सब आतंकी ठिकानों को पुरस्कार नहीं है?
अंग्रेज शासक उलटा करते थे। जिस क्षेत्र में बार-बार गर्हित अपराध हो रहे हों, उन पर वे सामूहिक जुर्माना लगाते थे, ताकि पूरे क्षेत्र के लोगों की चिंता उन अपराधों को रोकने में हो। उस नीति का सही परिणाम भी आता था। इसलिए भी पूरे ब्रिटिश शासन काल में जिहाद ने सिर नहीं उठाया, लेकिन हमारे शासकों ने उलटे उन्हीं क्षेत्रों को विशेष सुविधा, अनुदान आदि देने की नीति बनाई, जहां हिंसा, अलगाव तथा दूसरे समुदाय पर उत्पीड़न आदि होता हो। बंगाल, कश्मीर, केरल, असम आदि अनगिन जगहों पर हिंदुओं को पहचान-पहचान कर मारने या अपमानित करने वाली घटनाओं पर पहली कार्रवाई यह होती है कि मामले की लीपापोती की जाए। फिर जैसे-तैसे कुछ कार्रवाई। नतीजतन भारत के अनेक इलाकों में घर, मोहल्ले, गांव हिंदुओं से धीरे-धीरे खाली होते जाते हैं। यह सिलसिला दशकों से जारी है। हर आकलन इसकी पुष्टि करेगा कि ब्रिटिश राज में हिंदू अधिक सुरक्षित थे।
ऑपरेशन सिंदूर में यह भी नहीं देखा गया कि अमेरिका-यूरोप तो वैसे सैकड़ों 'विदेशी आतंकी ठिकानों' पर सैकड़ों बार, लाखों बम बरसा चुके हैं। पाकिस्तान पर ही अमेरिका ने सैकड़ों ड्रोन हमले किए, ठीक आतंकियों को ठिकाने लगाने के नाम पर। इसका परिणाम क्या निकला? एक हिंदुस्तानी मौलाना ने दिल्ली में ही फख्र से कहा था: 'एक ओसामा मरेगा, तो सौ पैदा होंगे।' उन मौलाना ने सही कहा था। ओसामा के बाद भी कश्मीर से केरल तक छोटे-छोटे ओसामाओं ने काफिरों को खत्म किया है। परिणाम भी वही होता रहा, जो वे चाहते हैं। वे हजारों जिहादी मरवा कर भी एक छोटी बस्ती अपने मतवाद के कब्जे में लेना फायदे का सौदा समझते हैं। इसी कीमत पर उन्होंने दुनिया भर में सैकड़ों छोटे-बड़े स्थानों को काफिरों से खाली कराया है, जैसे कश्मीर को कराया। अपनी बड़ी जनसंख्या, फौज, धन और भरपूर विकास के बावजूद हिंदू असहाय है।
वह जिहादियों के नजरिये से मामले को समझने में असमर्थ है। उसके नेता 'विकास' से, 'टेररिज्म को टूरिज्म से' खत्म करने का प्रचार करते हैं, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। मिसाइलों, बमों से ऐसे 'आतंकी' खत्म नहीं होते, क्योंकि वे जिहादी हैं। दुनिया को काफिरों से खाली कराने के विचार से भरे मतांध मिशनरी। उन्हें आतंकी कहना अपने को भ्रमित करना है। जिहाद एक विचार है और विचार तोपों से खत्म नहीं होते। उस विचार का पालन दर्जनों तरह के शांतिपूर्ण तरीकों से भी होता रहा है। आतंक फैलाकर भी और बेवकूफ बनाकर भी। दोनों का उद्देश्य और नतीजा काफिरों का खात्मा या उन्हें छल-बल से अपने पंथ में मिलाना रहा है। जिहाद की नजर नतीजे पर है। तरीके पर नहीं।
बुद्धिजीवी उसे पहचानने से भी इनकार करते हैं। वे जिहाद को 'आतंक' कहते हैं। इस तरह रोग को गलत नाम देकर गलत इलाज करते हैं। नतीजतन रोग लाइलाज बना रहता है। वे जिहाद को विचारणीय विषय ही नहीं मानते। इसीलिए गैर-मुस्लिम और खासकर हिंदू जिहाद नहीं देखते, उस पर नहीं बोलते और उसका अर्थ नहीं समझते। वे 'आतंक' देखते हैं, जिहाद नहीं। इसीलिए जिहाद सहजता से इंच-इंच बढ़ रहा है। प्रायः शांतिपूर्वक और काफिरों के सहयोग से, क्योंकि काफिर एक विचार को तोप या रिश्वत से खत्म करना चाहता है। इसी कारण जिहाद सैकड़ों छोटी-बड़ी बस्तियां नि:शब्द रूप से क्रमशः अपने कब्जे में ले रहा है।
(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)










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