विचार: गुलाम जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी बर्बरता
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल भारत और पाकिस्तान के पारंपरिक विवाद की दृष्टि से ही इस मुद्दे को नहीं देखना चाहिए। गुलाम जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच एवं वहां के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान आवश्यक है।
HighLights
गुलाम जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी दमन के खिलाफ व्यापक विरोध
चुनावों में धांधली, आर्थिक उपेक्षा से जनता में असंतोष
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने हिंसा पर गहरी चिंता जताई
डॉ. आनंद कुमार। पाकिस्तान दुनिया के सामने खुद को कश्मीरियों के अधिकारों का सबसे बड़ा हिमायती बताता रहा है। वह यही बेसुरा राग अलापता आया है कि भारत जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन करता आ रहा है, लेकिन आज पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में वहां के लोगों का जिस निर्ममता से दमन हो रहा है वह दर्शाता है कि पाकिस्तान की कश्मीर नीति का उद्देश्य कभी कश्मीरियों का हित नहीं, बल्कि इस मुद्दे का राजनीतिक और कूटनीतिक इस्तेमाल करना था। गुलाम जम्मू-कश्मीर में जारी आंदोलन कोई एकाएक पैदा हुई स्थिति नहीं है। यह वर्षों से बढ़ते राजनीतिक असंतोष, आर्थिक उपेक्षा और इस्लामाबाद के बढ़ते हस्तक्षेप का ही परिणाम है।
पाकिस्तान इस क्षेत्र पर अपना शिकंजा कसे रखने के लिए चुनावी व्यवस्था का दुरुपयोग करता रहा है। यहां विधानसभा की 12 सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो विभाजन के बाद सीमा पार चले गए। मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के ये विस्थापित आज पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में रहते हैं। स्थानीय लोगों की एक शिकायत यह भी है कि इन सीटों पर अपने मनमाने रवैये से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान चुनाव परिणामों को प्रभावित करता है, जिसमें स्थानीय जनता की आवाज और हितों को उपेक्षित किया जाता है। यही कारण है कि चुनाव सुधार की मांग धीरे-धीरे राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक न्याय और अधिक स्वायत्तता के व्यापक आंदोलन में बदल गई। इस आंदोलन का नेतृत्व ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी जेएएसी कर रही है। उसके नेताओं से संवाद के बजाय पाकिस्तानी शासकों ने उन्हें कुचलना शुरू कर दिया, जिससे लोगों में आक्रोश और बढ़ गया।
इसी बीच हुए विधानसभा चुनावों से विवाद और गहरा गया। पहले चुनाव एक चरण में होने थे, लेकिन सुरक्षा का हवाला देकर तीन चरणों में कराए गए। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी से लेकर जेएएसी ने चुनावों को अविश्वसनीय बताते हुए उनके बहिष्कार का आह्वान किया। चुनाव लड़ने वाले दलों ने भी एक-दूसरे पर मतपेटियां लूटने और वोटों में हेरफेर के आरोप लगाए। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या गुलाम जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक संस्थाएं वास्तव में जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती हैं या केवल इस्लामाबाद की राजनीतिक जरूरतों को पूरा करने का जरिया बनी हुई हैं।
सबसे चिंताजनक बात प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई हिंसा है। सुरक्षा बलों ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाईं, जिससे बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई। सुबूत मिटाने के लिए शवों को अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों से हटाया गया। इस पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने उचित ही चिंता जताई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इंटरनेट सेवाओं की बहाली, हिंसा की निष्पक्ष जांच और पत्रकारों तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को क्षेत्र में जाने की अनुमति देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त का भी यही रुख है। स्पष्ट है कि यह मामला अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक विषय नहीं, बल्कि मानवाधिकारों से जुड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।
प्रदर्शनकारियों की भावनाओं को समझने या उनका समाधान निकालने के बजाय पाकिस्तानी सत्ताधीशों ने पूरे आंदोलन को भारत प्रायोजित बताने की कोशिश की। यह पाकिस्तानी शासकों की पुरानी आदत है। इसी आदत से मजबूर पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने प्रदर्शनकारियों को भारत की तरह 'दुश्मन' बताया। यह बयान पाकिस्तान के उस दोहरे चरित्र को ही उजागर करता है, जिसमें वह भारत के कश्मीरियों के अधिकारों की बात करता है, लेकिन अपने यहां मौलिक अधिकार मांगने वालों को ही दुश्मन घोषित कर देता है। यदि लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग करने वाले नागरिकों के लिए यही रवैया अपनाया जाएगा, तो यहां उसका दावा स्वत: समाप्त हो जाता है।
चूंकि इस बार प्रदर्शनकारियों की मांगें चुनावी सुधार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, बेहतर शासन और आर्थिक अवसरों से जुड़ी हैं, इसलिए उन्हें केवल भारत विरोधी प्रचार के सहारे दबाया नहीं जा सकता। भारत ने भी इस घटनाक्रम पर कड़ी और उचित प्रतिक्रिया दी है। नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले पर ध्यान देने की अपील की है। विभाजन के समय भारत आकर बस चुके शरणार्थियों ने भी गुलाम जम्मू-कश्मीर में प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता दिखाते हुए 1994 में भारतीय संसद द्वारा पारित उस प्रस्ताव की भी याद दिलाई, जिसमें समूचे जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया गया था।
गुलाम जम्मू-कश्मीर का घटनाक्रम पाकिस्तान की कश्मीर नीति की बुनियादी विफलता को ही उजागर करता है। पाकिस्तान दशकों से जम्मू-कश्मीर में भारत के रुख-रवैये पर तो सवाल उठाता रहा, लेकिन अपने यहां लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने और सुशासन स्थापित करने की दिशा में उसने कोई गंभीर प्रयास नहीं किए। किसी भी सरकार की वैधता केवल प्रचार से नहीं बनती, बल्कि जनता के विश्वास, पारदर्शी प्रशासन और लोकतांत्रिक भागीदारी से बनती है। दमन, चुनावी हस्तक्षेप और असहमति को दबाने की नीति लंबे समय तक नहीं चल सकती।
गुलाम जम्मू-कश्मीर का आंदोलन दर्शाता है कि वहां के लोग पाकिस्तानी शासन व्यवस्था से संतुष्ट नहीं। वे सम्मानजनक जीवन, निष्पक्ष चुनाव, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक अवसर और जवाबदेह शासन चाहते हैं। इन मांगों का उत्तर यदि गोलियों, गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी से दिया जाएगा तो असंतोष निश्चित ही गहराएगा। यह पाकिस्तान की कश्मीर नीति के लिए भी निर्णायक मोड़ है कि कश्मीर पर उसके नैरेटिव को सबसे गहरी चोट भारत से नहीं, बल्कि गुलाम जम्मू-कश्मीर के लोगों से ही मिल रही है, जो अपने अधिकारों, सम्मान और लोकतांत्रिक भविष्य के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब केवल भारत और पाकिस्तान के पारंपरिक विवाद की दृष्टि से ही इस मुद्दे को नहीं देखना चाहिए। गुलाम जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच एवं वहां के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान आवश्यक है।
(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)










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