दिव्य कुमार सोती। गत दिनों उत्तर प्रदेश में भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सोनौली बार्डर चेक पाइंट के पास से एक संदिग्ध अमेरिकी नागरिक जार्डन ब्राउन को सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ द्वारा हिरासत में लिया गया। ब्राउन ने वैध पासपोर्ट और वीजा के बिना ही समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश किया था और दक्षिण भारत में काफी समय बिताने के बाद उत्तर प्रदेश पहुंचा, जहां से वह अवैध तरीके से सीमा पार कर नेपाल में घुसने वाला था। इसमें चौंकाने वाले कई पहलू हैं।

अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत का रहने वाला ब्राउन कई वर्षों तक अमेरिकी नौसेना के विशेष कमांडो दस्ते नेवी सील्स में काम कर चुका है। यह वही खुफिया कमांडो दस्ता है, जिसने कभी पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। ब्राउन के पास अमेरिकी नागरिक होने के बावजूद अमेरिकी पासपोर्ट नहीं था, परंतु एक नकली चीनी पासपोर्ट उसके पास से बरामद हुआ। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि अमेरिका सेना के विशेष खुफिया कमांडो दस्ते में रह चुका व्यक्ति बिना अनुमति के भारत में किसी जासूस या आतंकी की तरह घुसपैठ कर सीमावर्ती क्षेत्र में क्या कर रहा था?

ब्राउन का मामला अपवाद नहीं है। गत मार्च में ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा एक अमेरिकी मैथ्यू वैन डाइक और छह यूक्रेनी नागरिकों को कोलकाता और पूर्वोत्तर से गिरफ्तार किया गया था। ये सब मिलकर यूरोप से ड्रोनों को भारत में लाकर म्यांमार और पूर्वोत्तर में सक्रिय आतंकी संगठनों को उड़ाने और उनके माध्यम से हवाई हमले करने की ट्रेनिंग दे रहे थे। इनमें से कई लोग पूर्वोत्तर के उन क्षेत्रों में घुसपैठ कर चुके थे, जिनमें प्रवेश के लिए विदेशी नागरिकों को सरकार से विशेष परमिट प्राप्त करना आवश्यक होता है। ब्राउन की तरह ही डाइक का भी अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठानों से पुराना नाता रहा है।

जब पश्चिमी देशों ने लीबिया में कर्नल गद्दाफी के तख्तापलट की ठानी तो डाइक एक युद्ध पत्रकार से गुरिल्ला लड़ाका बन गया और अमेरिकी समर्थन से गद्दाफी सरकार के विरुद्ध युद्धरत गुट में शामिल हो गया। पश्चिम एशिया के कई सशस्त्र संघर्षों में हिस्सा लेने के बाद डाइक ने 2018 में सन्स आफ लिबर्टी इंटरनेशनल नामक संस्था की स्थापना की, जो अमेरिकी हितों को साधने वाले गुरिल्ला और आतंकी संगठनों को दुनिया भर में प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सलाह देने का काम करती है। यह संस्था ब्लैक वाटर जैसे निजी भाड़े के लड़ाके और विभिन्न युद्धक सेवाएं मुहैया कराने वाले अमेरिका के कारपोरेट रक्षा तंत्र का हिस्सा है। यह सुनियोजित साठगांठ बहुत कुछ कहती है।

अमेरिकी और पश्चिमी नागरिकों के भारत की सुरक्षा के विरुद्ध काम करने का यह कोई पहला या दूसरा मामला नहीं है। याद रहे कि अहमदाबाद सीरियल बम धमाकों से पांच मिनट पहले इंडियन मुजाहिदीन के आतंकियों द्वारा कई न्यूज चैनलों को ईमेल भेजे गए थे, जिसमें इन बम धमाकों की पहले धमकी और फिर जिम्मेदारी भी ली गई थी। बाद में इस ईमेल को आश्चर्यजनक रूप से भारत में रह रहे एक अमेरिकी नागरिक और अमेरिकी कट्टरपंथी चर्च से जुड़े कैनेथ हेवुड नामक व्यक्ति के लैपटाप तक ट्रेस किया गया। उस मामले की जांच कर रहे एक विवादित पुलिस अधिकारी द्वारा हेवुड को आनन-फानन में क्लीन चिट दे दी गई थी।

क्लीन चिट देने का एक अजीब कारण यह बताया गया था कि आतंकियों ने हेवुड का वाईफाई कनेक्शन हैक कर लिया था। हालांकि हेवुड इंटरनेट तकनीक से अनजान नहीं था और 20 सालों से एक फर्म चलाता था, जिसमें भारतीयों को अमेरिकी कंपनियों में नौकरियों के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। ऐसे में हैक होने वाली बात हजम नहीं होती। तब ऐसी बातें सामने आई थीं कि हेवुड सीआइए से जुड़ा था और सिमी और इंडियन मुजाहिदीन के माड्यूल संचालित कर रहा था। फिर भी इस मामले को रफा-दफा कर दिया गया।

हेवुड प्रकरण के करीब तीन साल बाद ही मुंबई में 26/11 आतंकी हमले हुए और उनमें भी एक अमेरिकी नागरिक डेविड कोलमैन हेडली की भूमिका सामने आई। हेडली अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का वर्षों तक मुखबिर रहा, जो 26/11 का मुख्य साजिशकर्ता भी बना। कोई अमेरिका से पूछे कि भारत में अमेरिकी खुफिया गतिविधियों के वे कौनसे राज हेडली के पास हैं कि उस पर उचित कार्रवाई के आसार नहीं दिखते। क्या कारण है कि 166 लोगों की हत्या का जिम्मेदार होने के बाद भी उसे वहां न तो मृत्युदंड दिया जाएगा और न ही जीवन के अंत तक कैद में रखा जाएगा और न ही भारत को प्रत्यर्पित किया जाएगा।

ऐसा ही मामला अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए के एजेंट रोसिआना मिन्चयू का है, जो 2005 में भारत के सबसे बड़े जासूसी कांडों में से एक नेवी वार रूम लीक केस उजागर होने के बाद से गायब है। वर्ष 2018 में अमेरिकी ईसाई मिशनरी जान एलेन चाऊ को अंडमान निकोबार के आदिवासियों ने तब मार डाला था, जब वह उनके क्षेत्र में घुसपैठ का प्रयास कर रहा था। स्मरण रहे कि यह वह संरक्षित क्षेत्र है, जिसमें भारतीय प्रशासनिक अधिकारी और सेना भी प्रवेश नहीं करते हैं। पिछली सदी के अंतिम दशक के दौरान जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की आग को हवा देने में अमेरिकी राजनयिक राबिन राफेल की भूमिका तो भुलाए नहीं भूली जा सकती। हुर्रियत के विस्तार में राफेल का बहुत बड़ा हाथ रहा है।

इतना सब कुछ स्पष्ट होने के बाद भी आज तक अमेरिकी नागरिक अपनी तमाम भारत विरोधी गतिविधियों के बावजूद बचते चले आए हैं। कोई बड़ी घटना होने से पहले इन्हें कभी पकड़ा नहीं जाता था और बाद में पकड़े भी गए तो सरकार बड़े आराम से उन्हें बच निकलने देती थी। ऐसे में ब्राउन और डाइक के मामले में गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और भारतीय सुरक्षा एजेंसियां सभी बधाई के पात्र हैं कि इस बार एहतियात बरतते हुए अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से जुड़े लोगों को किसी बड़ी घटना को अंजाम देने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया है। ये मामले भारतीय मीडिया और आम भारतीयों के लिए भी सीख है कि भारत के शत्रु सिर्फ पाकिस्तानी या चीनी ही नहीं होते हैं।

(लेखक काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)