संजय गुप्त। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी का धरना-प्रदर्शन समाप्त हो गया, लेकिन उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई और हो रही है, वह चिंतित करने वाली है। सीजेपी के संसद मार्च में हिंसा के बाद जहां धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा, वहीं प्रधानमंत्री को नीट पेपर लीक मामले में फास्ट ट्रैक अदालत के गठन की घोषणा करने और पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन का विधेयक लाने के साथ ही परीक्षा सुधार पर नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में समिति गठन करने के साथ कई कदम उठाने पड़े।

यह एक सवाल है कि ये फैसले पहले ही क्यों नहीं लिए गए, लेकिन यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन विधेयक पर संसद में कुल मिलाकर खोखली बहस ही हुई। पक्ष-विपक्ष ने सिर्फ एक-दूसरे पर आरोप लगाए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपनी सारी ऊर्जा सरकार पर अनर्गल आरोप लगाने में खपा दी। प्रियंका गांधी ने गोमूत्र का उल्लेख कर यही बताया कि उनके पास भी उक्त विधेयक पर कहने के लिए कुछ नहीं था। चूंकि सत्तापक्ष भी विपक्ष को घेरने और उसके आरोपों का जवाब देने तक सीमित रहा, इसलिए किसी की ओर से भी शिक्षा और परीक्षा में आवश्यक सुधार को लेकर गंभीर सुझाव नहीं दिए जा सके।

पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन विधेयक पर किसी भी सांसद ने स्कूली परीक्षाओं में नकल की बढ़ती प्रवृत्ति की ओर ध्यान आकर्षित नहीं किया। क्या यह विचित्र नहीं कि किसी को यह नहीं दिखाई दिया कि नकल की यह प्रवृत्ति समाज के अंदर घर कर गई चारित्रिक कमी को रेखांकित करती है और यह प्रवृत्ति ही परीक्षाओं में सेंध लगने का कारण बनती है? इस प्रवृत्ति की ही देन है पेपर लीक माफिया। राजनीतिक दलों की तरह सीजेपी ने शिक्षा और परीक्षा में सुधार को लेकर कोई ठोस सुझाव नहीं दिया। उसने सरकार को जो पांच सूत्रीय चार्टर दिया, उसमें कहीं इसका उल्लेख नहीं कि स्कूली परीक्षाओं में नकल भी एक गंभीर समस्या है और नकल करने-कराने में छात्र, अभिभावक और शिक्षक भी शामिल रहते हैं।

लगता है सीजेपी के धरने का एकमात्र लक्ष्य सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना था। शायद इसीलिए उसने अपने समर्थकों की भीड़ में अराजक तत्वों के शामिल होने की परवाह नहीं की और न ही यह देखा कि उसके मंच का इस्तेमाल कैसे-कैसे लोग कर रहे हैं और वे कैसी भाषा बोल रहे हैं। सीजेपी के नेताओं को गाली-गलौज भी हल्का मजाक लग रहा है। वास्तव में सीजेपी के ऐसे ही रवैये के कारण उसके संसद मार्च में हिंसा हुई।

यह कहना कठिन है कि सीजेपी वालों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा है या नहीं और वे किसी दल के हितैषी हैं या नहीं, लेकिन वे जिस तरह अपने समर्थकों की भीड़ में शामिल अराजक तत्वों और यहां तक कि आपराधिक पृष्ठभूमि वालों का भी बचाव कर रहे हैं, उससे उनके संदिग्ध इरादों का ही पता चलता है। यदि वे ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया नहीं अपनाते तो संभवतः उनके संसद मार्च में हिंसा भी नहीं होती। लगता है वे संसद में हिंसा होते हुए देखना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने बिना इजाजत संसद भवन में घुसने की कोशिश की।

संसद मार्च में हिंसक भीड़ से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा जो बल प्रयोग किया गया, वह एक मुद्दा बना हुआ है। विपक्ष यह सिद्ध करने में लगा हुआ है कि सीजेपी समर्थकों की भीड़ ने कुछ नहीं किया और पुलिस ने उस पर अकारण बल प्रयोग किया, लेकिन पुलिस की एफआइआर यह संकेत कर रही है कि संसद मार्च में अराजक तत्वों के साथ राजनीतिक दलों से जुड़े आपराधिक इतिहास वाले लोग शामिल थे। इनमें हत्या, लूट के भी आरोपित हैं।

संसद मार्च में हिंसा का मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है। वह इस तथ्य की उपेक्षा करने की स्थिति में नहीं कि संसद मार्च में हिंसा में प्रदर्शनकारियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस वाले भी घायल हुए हैं। जंतर-मंतर पर तैनात जवानों को यह सुनिश्चित करना था कि सीजेपी समर्थकों की भीड़ संसद की ओर न जाने पाए। आखिर ऐसे में सीजेपी हिंसा की जिम्मेदारी से कैसे बच सकती है? यह भी विचारणीय है कि जब सीजेपी ने संसद मार्च की घोषणा की, तब दिल्ली पुलिस ने उससे बार-बार कहा कि अगर मार्च करना है तो उसकी अनुमति लो, पर वह ऐसा करने से इन्कार करती रही।

इस तरह उसका यह मार्च पूरी तरह गैर-कानूनी बन गया। पुलिस ने सख्ती तब दिखाई, जब भीड़ दो बैरिकेड तोड़ने के बाद तीसरे की ओर बढ़ी और ईंट-पत्थर चलाने लगी। जब इस पथराव की चपेट में पुलिस अफसर और जवान आए, तब उन्होंने आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। जब इससे भी बात बनती नहीं दिखी, तब रैपिड एक्शन फोर्स ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच की जरूरत जताते हुए यह भी कहा है कि असाधारण परिस्थितियों में पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि कोई यह समझ रहा है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान बेलगाम भीड़ से पिटने के लिए खड़े थे, तो यह उसकी गलती है।

सीजेपी लगातार यह अनैतिक मांग कर रही है कि उसके प्रदर्शन में जिन लोगों ने हिंसा की, उन्हें भी माफी दी जाए। ऐसा करने से एक गलत परिपाटी बन जाएगी और इसका लाभ अराजक तत्व उठाएंगे। लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन होना स्वाभाविक है, लेकिन यह ध्यान रहे कि अराजक भीड़ पर पुलिस ने न तो पहली बार लाठीचार्ज किया है और न ही आंसू गैस या पैलेट गन का इस्तेमाल। जब-जब भीड़ ने हिंसा की है, तब-तब पुलिस ने बल प्रयोग किया है और कई बार तो गोलियां भी चलाई हैं।

यह सब जानते हुए भी सीजेपी यह मांग कर रही है कि उनके समर्थकों की भीड़ में शामिल हिंसक तत्वों को बख्श दिया जाए। उन्हें यह पता होना चाहिए था कि अगर उनके समर्थक अशांति फैलाएंगे तो इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। सीजेपी का इरादा जो भी हो, शिक्षा और परीक्षा में सुधार के लिए जैसे उपायों की आवश्यकता है, उन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय वह अराजक तत्वों के साथ खड़ी होने को आतुर दिखती है। इससे वह अपने को संदिग्ध बनाने का ही काम कर रही है।

sanjay gupta sir

(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)