राजकुमार सिंह। 'इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते' के दंभ को तोड़ने वाले काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन पर आत्ममुग्ध विपक्ष को नहीं भूलना चाहिए कि दरअसल यह परंपरागत राजनीति के लिए बड़ा और कड़ा सबक है। देश में शिक्षा की बदहाली किसी से छिपी नहीं, पर सरकारों ने वांछित कदम नहीं उठाए। इसीलिए उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में स्कूली शिक्षा को लगी नकल और पेपर लीक की बीमारी ने उच्च शिक्षा को भी जकड़ लिया। शिक्षा माफिया की चर्चा तब भी होती थी, अब भी हो रही है। यानी इस लंबी अवधि में सत्ता परिवर्तन ही होते रहे, व्यवस्था नहीं बदली।

कहने की जरूरत नहीं कि इस खेल में खलनायक राजनीतिक व्यवस्था ही है, जो देश के भविष्य से जुड़े शिक्षा सरीखे मुद्दे को भी चुनावी औजार की तरह इस्तेमाल करती रही। राजस्थान समेत कुछ राज्यों में पेपर लीक और सरकारी भर्तियों में धांधली भी बड़ा चुनावी मुद्दा बना, पर क्या सत्ता परिवर्तन के बाद सब कुछ ठीक हो गया? दरअसल उसकी कोशिश ही नहीं की गई। सिर्फ चेहरे बदलने से सत्ता ही बदलती है, व्यवस्था बदलने के लिए तो चाल और चरित्र भी बदलने पड़ते हैं। राजनीतिक नेतृत्व बदल जाने के बाद भी नौकरशाही और निहित स्वार्थ तो पुराने ही रहते हैं।

पहले पेपर लीक से भाजपा चिंतित नजर आती थी, अब कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल नजर आ रहे हैं। कांग्रेस अपने शासनकाल के पेपर लीक की जिम्मेदारियों से मुंह चुराते हुए भाजपा राज के पेपर लीक पर सवाल पूछती है तो भाजपा जवाब में उसे उसके राज के पेपर लीक गिना देती है। जाहिर है उनके लिए यह एक-दूसरे के विरुद्ध राजनीतिक हथियार भर है, देश का भविष्य माने जाने वाले युवाओं के भविष्य से सरोकार नहीं।

इसीलिए ये दल तो छोड़िए, अक्सर इनके छात्र संगठन भी ऐसे मुद्दों को लेकर सड़क पर नहीं उतरते। जिस नीट-यूजी पेपर लीक को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा, वह 2024 में भी लीक हो चुका था। सरकार ने तब भी कुछ कदम उठाए थे, पर पेपर लीक तो नहीं रुका? अब उठाए जा रहे कदमों के वांछित परिणामों के प्रति भी आश्वस्त हो पाना आसान नहीं, क्योंकि फास्ट ट्रैक कोर्ट की पहली सुनवाई में सीबीआइ वकील की अनुपस्थिति ने ही उसकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया।

प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय बनाने के लिए ही सरकार ने राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) बनाई थी, पर सबसे ज्यादा सवाल उसके ढांचे और कार्यप्रणाली को लेकर ही उठ रहे हैं। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे भर से सब कुछ ठीक हो जाएगा, ऐसी खुशफहमी किसी को नहीं होनी चाहिए, लेकिन शिक्षा मंत्रालय के मुखिया के रूप में पेपर लीक के लिए उनकी ही राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बनती थी।

अगर आंदोलन के दबाव के बजाय नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए वे इस्तीफा देते तो उनकी, सरकार की और भाजपा की भी साख बढ़ती। पिछले 12 साल में पेपर लीक की अनेक घटनाएं हुईं, पर उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद या युवा संगठन भारतीय जनता युवा मोर्चा ने युवाओं के भविष्य की चिंता करते हुए सड़क पर उतरना तो दूर, सरकार से सवाल करने तक की जहमत नहीं उठाई।

ऐसा ही आचरण संप्रग शासनकाल में उसके घटक दलों का रहा। अगर युवाओं और छात्रों के नाम पर बनाए गए संगठन भी दलगत राजनीति और चुनावी प्रबंधन के औजार भर बनकर रह जाएंगे तो उससे उत्पन्न शून्य कोई तो भरेगा ही। पेपर लीक आंदोलन पर सवार होकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश सभी विपक्षी दल करते नजर आए, पर इससे यह सच नहीं छिप जाता कि सड़क पर उतरने की पहल उस संगठन को करनी पड़ी, जो कुछ समय पहले ही विदेश में इंटरनेट मीडिया पर बनाया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी के प्रतिक्रियास्वरूप बनी सीजेपी का पेपर लीक के विरुद्ध जंतर-मंतर से शुरू होकर देश भर में फैल गया आंदोलन उस शून्य को भरने की कोशिश भी साबित हो सकती है। राजनीतिक दल और उनके छात्र एवं युवा संगठन अगर पेपर लीक जैसे मुद्दों पर मुखर और सक्रिय रहे होते तो रोजगार के लिए संघर्ष में जुटे युवाओं से लेकर अन्य लोगों को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता। बिना किसी संगठनात्मक ढांचे के चंद दिनों में इतना बड़ा और व्यापक आंदोलन खड़ा हो जाना परंपरागत राजनीति की प्रासंगिकता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है, जो सत्ता पाने और उसे बचाए रखने तक सीमित होकर रह गई है। बेशक इस आंदोलन में वामपंथी विचारों वाले संगठनों की छाप साफ दिखी, पर उनके लिए मैदान तो दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी विचारधारा ने ही छोड़ा।

असामाजिक तत्वों से किसी समझदार आदमी की सहानुभूति नहीं हो सकती, पर उन्हें पहचान कर रोकने की सामर्थ्य निश्चय ही आंदोलनकारियों से ज्यादा पुलिस के पास थी। हां, परंपरागत भारतीय संस्कृति के मद्देनजर आंदोलन के नारों और भाषणों की भाषा अवश्य चिंताजनक है, पर वही भाषा तो हमारे युवा ओटीटी और डिजिटल मीडिया से सीख रहे हैं, जिसकी परवाह न समाज को है और न ही सरकार को। इसलिए आप सहमत हों या असहमत, सीजेपी आंदोलन सभी के लिए आत्मावलोकन का मौका भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)