विचार: अभद्रता के महिमामंडन की कोशिश
हाल ही में सार्वजनिक विमर्श में अभद्र भाषा के महिमामंडन पर लेख चर्चा करता है, विशेषकर जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री को लेकर
HighLights
सार्वजनिक विमर्श में गालियों का महिमामंडन एक गंभीर मुद्दा।
प्रेमचंद ने भाषा की शुद्धता को नैतिक स्थिति से जोड़ा।
गालियों को उचित ठहराना पुनरुत्थानवादी सोच का प्रमाण।
उमेश चतुर्वेदी। गाली इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में हैं। जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर दी गईं खुलेआम गंदी गालियां इसका बहाना बनी है। हैरत की बात है कि इसमें कई प्रोफेसर और पत्रकार भी शामिल हो गए हैं और इन गालियों को उचित ठहराने की दौड़ का हिस्सा बन गए हैं। इसे लड़कियों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति बताया जा रहा है तो कई गालीबाजों को नई गालियां रचने का सुझाव दिया जा रहा है।
उनके हिसाब से सारी गालियां पुरुषों द्वारा रची गई हैं, लिहाजा लड़कियों को नई तरह की गालियों की रचना करनी चाहिए। समाज का एक बड़ा तबका इसका विरोध भी कर रहा है। उसका कहना है कि गालियां भले ही समाज में सदा से चली आ रही हैं, लेकिन कम से कम उनकी सार्वजनिक स्वीकृति नहीं रही है।
गालियों के समर्थकों में सबसे बड़ी संख्या खुद को क्रांतिकारी मानने वाले वामपंथी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ भारत में वामपंथी विचारधारा के लिहाज से गठित हुआ था। उसके पहले अध्यक्ष उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे। गाली विमर्श के संदर्भ में प्रेमचंद ने लिखा है, 'हर जाति के बोलचाल का ढंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिंदुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा।
बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजुबानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गंदे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं, शायद ही किसी सभ्य जाति की जबान से निकलते हों।'
इसमें दो राय नहीं कि हर सफल आंदोलन के बाद आंदोलनकारी नायक और विजेता के रूप में उभरते हैं। इस लिहाज से काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नेता जंतर-मंतर आंदोलन के फिलहाल के विजेता तो हैं हीं। इस तर्क से उनका साथ देने वाला समूह भी उसी वर्ग का माना जाएगा। इतिहास हमेशा विजेताओं का ही गुणगान करता है। चूंकि सीजेपी के नेता एक तबके के हीरो हैं, इसलिए उनकी ओर से दी गई गालियों को उनके गुणों के रूप में देखने की कोशिश हो रही है।
तर्क दिया जा रहा है कि भारतीय समाज में शादी-ब्याह और मुंडन-जनेऊ आदि के मौके पर प्यार से गालियां दी जातीं हैं। लिहाजा जंतर-मंतर की गालियां भी उन्हीं गालियों की तरह स्नेह की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है? गालीबाजों का बचाव करने वाले क्या ऐसी ही गालियां अपने ही बच्चों के मुख से अपने ही घरों में सुनना पसंद करेंगे? गंभीरता से विचार करेंगे तो इसका जवाब 'नहीं' है।
हर समाज में गालियां किसी न किसी रूप में रही हैं, लेकिन वे कभी सार्वजनिक स्वीकार्यता और विमर्श का विषय नहीं रही हैं। गालियां कभी यथार्थ नहीं होतीं। हिंदी साहित्य में यथार्थवाद की अभिव्यक्ति के लिए गालियों के प्रयोग की शुरुआत हुई, लेकिन आधुनिक यथार्थवादी चिंतन से पहले के साहित्य में कभी गालियों का प्रयोग नहीं होता दिखता। तर्क दिया जा रहा है कि जेन-जी की यही भाषा है। वे ऐसे ही खुद को अभिव्यक्त करते हैं।
ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या जेन-जी परीक्षा में भी गालियों को अपने जवाब में शामिल करते हैं? और क्या वह स्वीकार्य होगा? सवाल यह भी है कि जो पत्रकार इसका समर्थन कर रहे हैं, क्या वे अपने अखबारों और अपने स्टूडियो में उन गालियों के इस्तेमाल को तैयार होंगे? निश्चित तौर पर इन सभी सवालों का जवाब 'नहीं' में है। फिर यह सवाल क्यों न उठे कि गालियों का महिमामंडन क्यों?
कुछ लोगों का कहना है कि जेन-जी ऐसे ही सोचते हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि समूचे देश का जेन-जी एक जैसा नहीं है। जरूरी नहीं कि दिल्ली और चंडीगढ़ के जेन-जी की तरह मुंबई और बेंगलुरु का जेन-जी भी सोचता हो। जेन-जी का एक हिस्सा भले ही गालियां देने में फख्र महसूस कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी उनका एक बड़ा हिस्सा संस्कारी है और उसे गालियां बकने से परहेज है।
मार्क्सवादी हिंदी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने एक जगह लिखा है कि गालियों को वैध ठहराने की कोशिश पुनरुत्थानवादी सोच की खूबी है। वह पुराने असभ्य रूपों, भाषाई प्रयोगों, आदतों और संस्कारों को बनाए रखता है। मार्क्सवादी राष्ट्रीय विचारधारा को पुनरुत्थानवादी ही मानते हैं, तो क्या मान लें कि गालियों को उचित ठहराने वाले मार्क्सवादी भी अब पुनरुत्थानवादी हो गए हैं? गालियां हमेशा से गलत और असभ्य मानी जाती रही हैं।
महाभारत में शिशुपाल का प्रकरण आता है। उसकी सौ गालियों को श्रीकृष्ण बर्दाश्त करते हैं, लेकिन शिशुपाल जब सौ की सीमा पार करता है तो उसका वध कर देते हैं। जाहिर है कि कृष्ण के दौर में भी गालियां असभ्यता की निशानी थीं। उनका महिमामंडन नहीं होता था। मध्यकाल में जरूर गालियों के मुख्यधारा का हिस्सा बनने के संकेत मिलते हैं।
फिर भी उनकी सार्वजनिक स्वीकार्यता नहीं दिखती। ऐसे में प्रश्न यह है कि भारतीय समाज प्रधानमंत्री को सार्वजनिक तौर पर दी जाने वाली गालियों और असभ्यता को क्यों स्वीकार करे? नई पीढ़ी को असभ्य-अभद्र बनाने की प्रक्रिया को बढ़ावा क्यों दिया जाए? सभ्यता के साथ मर्यादित शब्दों में कड़ी से कड़ी आलोचना करने और कठोर बातें बोलने के लिए उन्हें योग्य क्यों न बनाया जाए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)










-1785518677121_v.jpg)

