डॉ. जगदीप सिंह। गत दिनों गुजरात विधानसभा में विस्तृत चर्चा के बाद ‘गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल, 2026’ को बहुमत से पारित कर दिया गया। इस कदम के साथ गुजरात, उत्तराखंड के बाद दूसरा ऐसा राज्य बन गया है, जहां व्यक्तिगत मामलों में धर्म-आधारित अलग-अलग कानूनों के स्थान पर एकसमान कानूनी ढांचा लागू किया गया है। विधेयक के अनुसार विवाह समारोह धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जा सकते हैं, किंतु उनका पंजीकरण अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने की स्थिति में दस हजार रुपये तक का जुर्माना निर्धारित किया गया है। विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है।

बहुविवाह को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया है तथा पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह अमान्य माना जाएगा। तलाक के आधारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिनमें क्रूरता, परित्याग, व्यभिचार, मतांतरण और मानसिक विकार शामिल हैं। साथ ही आपसी सहमति से तलाक का प्रविधान भी रखा गया है, किंतु विवाह के एक वर्ष के भीतर तलाक की अनुमति नहीं दी जाएगी। लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता देते हुए उसके पंजीकरण को अनिवार्य किया गया है।

यदि किसी पक्ष की आयु नाबालिग पाई जाती है, तो उसके माता-पिता को सूचित किया जाएगा। लिव-इन संबंध से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा दिया जाएगा तथा महिला साथी को भरण-पोषण का अधिकार प्रदान किया गया है। बच्चों के पालन-पोषण में माता-पिता, दोनों की समान जिम्मेदारी सुनिश्चित की गई है। साथ ही उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे में पूर्ण लैंगिक समानता लागू की गई है, जिससे विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के कारण उपजी असमानताओं को समाप्त करने का प्रयास किया गया है।

यह कानून पूरे गुजरात में लागू होगा और गुजरात के वे मूल निवासी, जो राज्य के बाहर रहते हैं, उन पर भी प्रभावी रहेगा। इसके अंतर्गत वे व्यक्ति भी शामिल किए गए हैं, जो पिछले दस वर्षों से लगातार गुजरात में निवास कर रहे हैं या राज्य अथवा केंद्र सरकार की सेवा में कार्यरत हैं। हालांकि अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को इस कानून से छूट प्रदान की गई है, ताकि उनकी पारंपरिक प्रथाओं और सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

इसमें जबरन विवाह पर दंड का प्रविधान किया गया है, साथ ही हलाला जैसी कुप्रथाओं को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है। इस कानून के लागू होने का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव लैंगिक न्याय के क्षेत्र में दिखाई देगा। महिलाओं को अब सभी समुदायों में संपत्ति, उत्तराधिकार और भरण-पोषण के मामलों में समान अधिकार प्राप्त होंगे। लिव-इन संबंधों में आर्थिक सुरक्षा मिलने से उनकी स्थिति अधिक सुदृढ़ होगी और बच्चों के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। पंथ के आधार पर कानूनी
भेदभाव समाप्त होने से सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा।

अंतर्धार्मिक विवाह अधिक सुगम होंगे और संपत्ति से जुड़े विवादों में जटिलताएं भी कम होने की संभावना है। कानूनी प्रक्रिया में भी उल्लेखनीय सरलीकरण आएगा। अदालतों पर बोझ कम होगा, क्योंकि अब विवादों का निपटारा एक ही कानूनी ढांचे के अंतर्गत किया जा सकेगा। इससे न्याय वितरण अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनेगा। पारिवारिक मामलों में मुकदमों की संख्या घटने से सामाजिक स्थिरता को भी बल मिलेगा। आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो संपत्ति संबंधी विवादों में कमी आने से व्यापार और निवेश का परिवेश भी अधिक अनुकूल होगा।

अब इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार को कई ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, एक सुदृढ़ डिजिटल पंजीकरण प्रणाली विकसित करनी होगी। साथ ही ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता अभियान चलाना होगा। प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति और न्यायिक कर्मचारियों को नए प्रविधानों से अवगत कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसको चरणबद्ध तरीके से लागू करने से संभावित चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना किया जा सकेगा। जनता के बीच विश्वास निर्माण के लिए निरंतर संवाद और सहभागिता भी अनिवार्य होगी।

राजनीतिक दृष्टि से यह निर्णय अन्य राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है और केंद्र सरकार पर राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का दबाव भी बढ़ा सकता है। गुजरात विधानसभा का यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है, जहां विविधता का सम्मान करते हुए समानता को प्राथमिकता दी गई है। यदि इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो एक प्रगतिशील राज्य के रूप में गुजरात की पहचान और पुख्ता होगी। यह कानून पंथ से ऊपर उठकर प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

इससे महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ होगी, सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा और राष्ट्रीय एकता को नई मजबूती प्राप्त होगी। निःसंदेह गुजरात का यह कदम इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज होगा, क्योंकि यह लंबे समय से चल रही बहस को ठोस कार्रवाई में परिवर्तित करने का उदाहरण है। समानता अब केवल संवैधानिक आदर्श तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वास्तविकता की दिशा में अग्रसर होती दिखाई दे रही है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है।

(लेखक राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)